कोटा

जिन्दगी की पाठशाला : कुदरत ने रोशनी छीनी, जब्जे से निकाली उजली राह

छह साल की उम्र में उपचार के लिए राशि नहीं होने से आंखों की रोशनी गंवाने वाले किशन करीब 20 साल से गांव में किराने की दुकान चला रहे हैं।
2 min read
Jul 10, 2019
kota
ग्राहक को सामान सौंपते नेत्रहीन किशनलाल।

कोटा/ रामगंजमंडी.

जिन्दगी में अचानक छाए अंधेरे से हार न मानकर संघर्ष किया जाए तो उजली राह जरूर निकलती है, समीपवर्ती अमरपुरा गांव के किशनलाल (50) इसे बखूबी रेखांकित कर रहे हैं। छह साल की उम्र में उपचार के लिए राशि नहीं होने से आंखों की रोशनी गंवाने वाले किशन करीब 20 साल से गांव में किराने की दुकान चला रहे हैं। आंखें गंवाने का दर्द मन में होने के बावजूद उन्हें संतोष है कि वे स्वयं व्यवसाय करके अपना गुजर-बसर कर रहे हैं। किशन बताते हैं कि वे बचपन से नेत्रहीन नहीं थे। करीब 6 साल की उम्र में उनकी आंखें आई थी। परिजन चिकित्सक के पास जाने में उस समय घबराते थे। लंबे समय तक सूजन आती रही तो मां झालावाड़ उपचार कराने पहुंची। चिकित्सक ने आंख में दवा डालने को दी, इसे वे आंख में डालते रहे। एक आंख के हीरे से जब पानी ज्यादा बहने लगा तो मां झालावाड़ के एक चिकित्सक के पास लेकर गई। चिकित्सक ने 200 रुपए मांगे, इतनी राशि मां के पास नहीं थी। उपचार नहीं हुआ। समय के साथ आंखें चली गई। अंधता के कारण किशन की शादी नहीं हुई। परिवार में तीन भाई हैं, साथ रहते हैं। करीब 20 साल पहले उन्होनें गांव में छोटी दुकान लगाने की बात भाइयों से की। उन्होंने सामान दिला दिया। लेकिन, शंका थी कि ग्राहक से वे लेनदेन कैसे करेंगे। कुछ दिन भाइयों ने सहयोग किया। समय के साथ इसमें अभ्यस्त हो गए। रामगंजमंडी से सामान खरीदने के लिए उनके साथ भाई व भतीजे जाते हंै।

ऐसा है मैनेजमेंट फंडा
रुपयों का लेन देन: 'चिल्लरÓ को स्पर्श व नोट को लम्बाई से पहचानते हैं। नए नोट आने पर परिजनों से शंका दूर कर लेते हैं।
सामान देना: दुकान में कौनसी सामग्री कितने कदम पर रखी हुई है उसके अनुसार व चलकर सामान लाते हैं और ग्राहक को सौंप देते हैं। दुकान में रोजमर्रा जरूरत की चीजें हैं।
सावधानी: वे तौलकर देने वाली वस्तुएं दुकान में नहीं रखते।
अनुभव: किशन कहते हैं कि 20 साल में कोई ग्राहक उन्हें गच्चा देकर गया हो। दुकान से वह अपना खर्च स्वयं निकाल लेते हैं।

Published on:
10 Jul 2019 07:00 am