
कोटा . सियासत नारों के बिना सूनी है। चुनाव के दौरान एक से बढ़कर एक नारे गढ़े जाते हैं। कई मर्तबा जनमानस पर यह अपना इतना असर छोड़ जाते हैं कि जीत और हार का सबब तक बन जाते हैं, लेकिन सोशल मीडिया के बढ़ते चलन ने नए नारे गढऩे की कला को ही निगल लिया है। यही वजह है कि 2018 के विधानसभा चुनावों में महज 20 दिन बाकी बचे हैं, लेकिन अभी तक लोगों के कानों तक एक भी ऐसा नारा नहीं पहुंचा है, जो उनकी दिलो-दिमाग पर छा सके।
70 का दशक...जब हाड़ौती की मिट्टी ने दाऊदयाल जोशी जैसे जमीन से जुड़े नेताओं को जन्मा। वे भले ही एक भी बार मंत्री न बन सके हों, लेकिन कोटा की जनता ने उन्हें तीन बार विधायक और फिर लगातार तीन बार सांसद चुनकर अपनी पसंद का खुला इजहार किया। उनकी लोकप्रियता का आलम यह था कि जनता ने उनके लिए एक नारा तक गढ़ दिया...
हाड़ौती का एक ही लाल दाऊदयाल दाऊदयाल। इस नारे की लोकप्रियता को आप इस तरह समझ सकते हैं कि करीब पांच दशक बाद भी यह चुनावी नारा बच्चे-बच्चे की जुबान पर चढ़ा हुआ है। यह बात और है कि अब दाऊदयाल जोशी की जगह अपनी सहूलियत से लोग नाम बदल लेते हैं।
नहीं गढ़ा ऐसा नारा
साहित्यकार ओम नागर कहते हैं कि हाड़ौती में बेहद कम चुनावी नारे गढ़े गए। राष्ट्रीय परिदृश्य पर तैरने वाले या फिर उत्तर प्रदेश जैसे सक्रिय सियासी सूबे के उधार लिए गए नामों में उलटफेर करके ज्यादातर काम चलाया जाता रहा। 1996 का नारा अबकी बारी, अटल बिहारी और 2014 के नारे अबकी बार, मोदी सरकार और अच्छे दिन आएंगे अब भी आम आदमी को लुभाते हैं। अच्छे दिन का नारा जितना सुखद रहा, उतना ही मुसीबत का सबब भी बना।
प्रदेश बदला नारा नहीं
वहीं कांग्रेस ने यूपी में दिए नारे '27 साल यूपी बेहाल को यहां '5 साल राजस्थान बदहाल करके इस्तेमाल करने की कोशिश की जा रही है। जवाब में भाजपा कार्यकर्ता उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के दिए गए नारे 'काम बोलता है का इस्तेमाल करने से कतई गुरेज नहीं कर रहे, लेकिन इनमें बीते चुनावों जैसा जादू नजर नहीं आ रहा।