नए दौर की में कविता में आए बदलाव पर कैसे धड़कती हैं वीर रस के कवियों की धड़कनें, करते हैं जानने की कोशिश।
नई करवट ले रहे देश में साहित्य सृजन की दशा और दिशा की टोह लेने को 'राजस्थान पत्रिका' ने बिताए कुछ पल कोटा दशहरा मेले में शनिवार रात अखिल भारतीय कवि सम्मेलन में शिरकत करने आए ख्यातनाम कवियों में से चुनिन्दा के साथ।
'रौद्र' में बदल गया 'वीर' रस
वीर या ओज रस की कविताओं में काफी बदलाव आ गया है। बड़ा यह कि अब 'ओज' का स्थान 'रौद्र' ने ले लिया है। गुस्सा है, पीड़ा है जो मंच से बोलती है। इसे कविता की गिरावट भी कह सकते हैं। यह कहना है। कवि सम्मेलन में ही शिकरत करने आए ओज रस के ख्यातनाम कवि विनीत चौहान का। उन्होंने भी 'पत्रिका' से साहित्य जगत के पड़ाव साझा किए। वे पीड़ा के साथ कहते हैं, अब कविताओं में साहित्य को नहीं मनोरंजन को ढूंढा जा रहा है, रचनाकार, कवि भी वही लिख रहा है जो लोगों को रास आ रहा है।
वक्त के साथ बदली कविता
कविता का रूप 'सत्यम शिवम् सुंदरम' जैसा होना चाहिए लेकिन वक्त के साथ कविताएं बदल गई हैं। कारण दिनभर की ऊब के बाद व्यक्ति मनोरंजन के कुछ पल चाहता है, वह इन कविताओं में मिल जाता है। कवि विनीत का मानना है कि जब तक देश में भ्रष्टाचार, आतंकवाद रहेगा और नेता रहेंगे, इसी तरह की कविताओं का दौर रहेगा। लेकिन वे नसीहत भरे अंदाज में कहते हैं कि कविता का अपना मर्म और कवि का धर्म होता है, इसे कवि समझे। कविता जब मूकाभिनय व नाटक बनती है तो दर्द होता है।
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जिसने चंबल पार की समझो तर गया...
चौहान ने बताया कि उनका कोटा से गहरा नाता है। यहां के श्रोता कवियों की परीक्षा लेते हैं जो सफल हो जाता है, वह तर जाता है। जिसने चंबल पार कर ली, समझो सब कुछ पार कर लिया।
न जाने कहां खो गए रस
देवास से आए कवि शशिकांत ने भी कुछ पल 'पत्रिका' को दिए। आरटीडीसी की होटल में कवि सम्मेलन की तैयारी के दौरान संक्षिप्त बातचीत में शशिकांत यादव ने कहा कि जैसे हिन्दी का सरलीकरण हो रहा है, वैसे ही कविताओं का सरलीकरण हो रहा है। कविता वही है जो सीधे सपाट शब्दों में श्रोताओं पर छाप छोड़ सके।
प्रयोग का दौर चल रहा
वीर रस के कवि शशिकांत ने कहा कि आज प्रयोग का दौर है और इसमें कविताएं भी परवान चढ़ रही है। वे मानते हैं कि प्रयोग जरूरी भी हैं। कुल नौ रस हैं लेकिन कविताओं में सिर्फ तीन रस रह गए हैं। आज के दौर में हास्य, वीर और शृंगार रस की कविताएं ही ज्यादा हो रही हैं। इनको सुनने वाले, चाहने वाले ज्यादा हैं। बाकी रस मानो कविताओं से गुम ही हो गए। न ही इनके वाचन करने वाले दिख रहे न ही श्रोता। वक्त की मांग के अनुरूप ही कविताएं लिखी और पढ़ी जा रही हैं। शशिकांत ने दशहरे की जमकर तारीफ की। उन्होंने कहा की कोटा का दशहरा में अखिल भारतीय कवि सम्मेलन में शिरकत करना अपने आप में गौरव की बात है।