
कोटा. कहानी की शुरुआत होती है । 2009 से भाजपा 2008 का विधान सभा चुनाव हार गई थी । ठीक अभी की तरह ही वसुंधरा राजे के नेतृत्व पर पार्टी के भीतर ही सवाल उठ रहे थे लेकिन देर सवेरे मामला ठंडा हो गया उसके बाद आए लोकसभा चुनाव। इन चुनावों में भाजपा की और से लालकृष्ण आडवाणी पीएम इन वेटिंग बनाए गए थे । टिकट वितरण में वसुंधरा राजे झालावाड़ से अपने बेटे दुष्यंत को टिकट दिलाने में कामयाब हो जाती है लेकिन झालावाड़ बारां के साथ ही प्रदेश की बाकी 25 सीटों पर प्रचार की जिम्मेदारी वसुंधरा राजे पर ही थी लेकिन माहौल ऐसा बनाया गया की अगर दुष्यंत चुनाव हार गए तो इसे राजे की प्रतिष्ठा से जोड़ा जाएगा ।
Election 2019 : नए दौर के नए नेता लेकिन चुनाव जीतने के लिए अपना रहे बरसों पुराने टोटके..
कांग्रेस के चक्रव्यूह में फंसी भाजपा
2018 के चुनावों में कांग्रेस को 99 पर रोकने और भाजपा के 73 जितने का श्रेय वसुंधरा को ही दिया गया साथ ही मानवेन्द्र को झालावाड़ भेजकर राजे को घर में घेरने की जो रणनीति कांग्रेस ने अपनाई थी वो कारगर नहीं रही लेकिन 2009 के लोकसभा चुनावों में भाजपा, कांग्रेस के चक्रव्यूह में फंस गई थी । दरअसल 2009 के चुनावों में कांग्रेस ने झालावाड़ -बारां सीट से हाड़ौती के दिग्गज नेता प्रमोद जैन भाया की पत्नी उर्मिला जैन भाया को टिकट दिया था। भाया बेशक अपनी पत्नी को चुनाव नहीं जीता पाए हो लेकिन उन्होंने इतनी दमदारी से चुनाव लड़ा और राजे का ज्यादा समय झालावाड़-बारां सीट पर प्रचार में बीत गया और वे ज्यादा समय बाकी जगह नहीं दे पाई। नतीजन भाजपा महज 4 सीटों पर ही चुनाव जीत सकी और कांग्रेस ने 20 सीटों पर बाज़ी मार ली । कांग्रेस ने भाया को उनकी मेहनत का पारितोषिक उन्हें कैबिनेट मंत्री बनाकर दे दिया ।
मानवेन्द्र 2. 0
विधानसभा चुनावों में भले ही कांग्रेस जीत गयी हो लेकिन हालात 2009 जैसे कतई नहीं है । कांग्रेस जानती है की इन चुनावों में भाजपा की हार के बावज़ूद वसुंधरा राजे का कद नहीं घटा है ऐसे में उन्हें हल्के में नहीं लिया जा सकता यही वजह है कांग्रेस राजे का गढ़ में दोबारा उर्मिला जैन भाया को टिकट देने पर विचार कर रही है ।कांग्रेस अपनी रणनीति में कितनी कामयाब होती है यह तो वक्त ही बताएगा लेकिन झालावाड़ जिले में 4 -0 और संसदीय सीट पर 5 -3 का आंकड़ा बहुत कुछ कह रहा है ।