कोटा

Holi Special: हिरोईन के गालों पर विलेन ने लगाया प्यार का रंग तो हीरो के मन उठी होलिका दहन की चिंगारी…

रंग तो केवल एक बहाना है। होली के केन्द्र में रंग कभी रहे ही नहीं, रही है हमेशा केवल नायिका। सारे गीत, सारे रसिया, सारे फाग उसी को समर्पित हैं।
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Mar 20, 2019
Holi festival
Holi Special: हिरोईन के गालों पर विलेन ने लगाया प्यार का रंग तो हीरो के मन उठी होलिका दहन की चिंगारी...

कोटा. लीजिए, होली फिर आ गई। बलखाती, इठलाती, मदमाती, फागुन के बयार उड़ाती होली। लोग कहते हैं कि होली रंगों का त्यौहार है, मिलने-मिलाने का त्यौहार है, लेकिन मैंने देखा - ऐसा कुछ नहीं है। रंग तो केवल एक बहाना है। होली के केन्द्र में रंग कभी रहे ही नहीं, रही है हमेशा केवल नायिका। सारे गीत, सारे रसिया, सारे फाग उसी को समर्पित हैं।

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होली आती है और नाना प्रकार के नायकों के जीवन में मधुरता घोल जाती है। भांति -भांति के नायक साल भर से प्रतीक्षारत हैं। वो बस गा रहे है कि न कोई उम्र की सीमा हो, न जन्म का हो बंधन, जब प्यार करे कोई तो देखे केवल मन। नाना प्रकार के नायक हैं तो दादा प्रकार के नायक भी। होली में सभी प्रफुल्लित है। वे अपने दांतों का सेट चमकाते हैं।

चश्मा साफ करते हैं। नाना प्रकार की गोलियां एडवांस में खाकर तैयार। आखिर दिल का मामला है। साल भर से अनुपयोगी दिल, होली पर क्षणिक उपयोग के लिए तैयार है। दिल धड़क रहा है पर परवाह किसे है। हर हाल में दिल को खतरा है। नायिका के लिए अबीर लगाऐंगे तो भी दिल खुशी में जोरों से धड़केगा, न लगा पाए तो गम में धड़केगा।


'होरी खेलो रे राधा के संग होरी खेलो। मन पुलकित है। अब मन पुलकित रंग की वजह से नहीं हैं वरन, नायिका के संग होली खेलने से है। पिचकारी की गीली होली मन को नहीं सुहाती। ये क्या हम वर्षभर से प्रतीक्षा में है, नायिका के संग होली खेलने को और ये निगोड़ी पिचकारी है कि दूरियां बढ़ा रही है। अरे नयनों की पिचकारियों से तो हमने वर्षभर होली खेली। अब तो असली होली खेल ही लेने दो।

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हर नायक स्वंभू नायक है, लेकिन दूसरे नायक नहीं, खलनायक प्रतीत हो रहे है। नायिका के कपोलों पर अबीर मलना तो हमारा कॅापीराइट है। फिर ये दूसरे कैसे प्रयासरत है। यह दृश्य देखकर नायक के मन में होलिका-दहन हो रहा है। मन में उठने वाला धुंआ नायिका अनुभव कर रही है। मुस्करा रही, इठला रही, बल खा रही है। नायक होली खेलने को तैयार है। रंग-गुलाल जेब में रखे है। मन में सपने हैं।


वो अबीर उड़ा रहा है। ढोल के थाप पर नृत्य कर रहा है, तो आप क्यूं खलनायक से बंद कक्ष में छुपे बैठे है। होली के उदारवाद का फायदा उठाइए। बाहर फागोत्सव शुरू हो चुका है। निकलिए, थिरकिए, देखिए, आपकी नायिका गुलाल लेकर निकल पड़ी है। हम तो ईश्वर से प्रार्थना ही कर सकते हैं और शेष .... शेष तो ईश्वर पर छोड़ दीजिए। वो सब ठीक करेगा।

-शरद उपाध्याय, व्यंग्यकार

Updated on:
20 Mar 2019 04:59 pm
Published on:
20 Mar 2019 04:59 pm