
विनीत सिंह. कोटा . मां चर्मण्यवती की हत्या के आरोप में राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (आरएसपीसीबी) ने नगर निगम और नगर विकास न्यास के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज कराया है। जल प्रदूषण निवारण एंव नियंत्रण अधिनियम 1974 के तहत सजा तय करने के लिए कोटा की चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट कोर्ट ने मामले की सुनवाई भी शुरू कर दी है।
चम्बल को प्रदूषण से मुक्ति दिलाने के लिए वर्ष 2008 में राष्ट्रीय नदी जल संरक्षण योजना (एनआरसीपी) से जोड़ा गया। उस वक्त शहर के 22 नालों से 288 एमएलडी सीवरेज सीधे चम्बल में फेंका जा रहा था। इसे रोकने के लिए केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय और राज्य सरकार ने 27 अक्टूबर 2009 को सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) लगाने और पूरे शहर में सीवरेज लाइन डालने के लिए 149 करोड़ रुपए जारी किए, लेकिन नौ साल बाद भी यह काम पूरा नहीं हो सका है। जिसके चलते इस समय 36 बड़े नाले रोजाना 439.878 एमएलडी सीवरेज सीधे नदी में गिराकर मां चर्मण्यवती को तिल-तिल कर मार रहे हैं।
हर बार बोला झूठ
बावजूद इसके यूआईटी ने अगस्त 2016 में राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) की भोपाल बेंच को शपथ पत्र दे दिया कि कोटा के सभी 22 नालों को टेप कर उनसे निकलने वाला गंदा पानी चम्बल में गिरने से रोक दिया है। मई 2017 में जब राजस्थान पत्रिका ने इस हलफनामे की पोल खोली तो एनजीटी ने प्रकाशित समाचार का स्वत: संज्ञान लेते हुए पांच सदस्यी सीवरेज फ्लो मेजरमेंट कमेटी का गठन किया। जिसकी जांच में खुलासा हुआ कि चम्बल में अब 22 नहीं 34 बड़े नाले सीधे गिर रहे हैं।
एसटीपी में भी किया खेल
जल प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण अधिनियम 1974 के तहत सीवरेज प्लांट लगाने और उसके संचालन के लिए पहले प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से सहमति लेनी होती है, लेकिन नगर निगम और यूआईटी ने धाकडख़ेड़ी स्थित 30 एमएलडी के एसटीपी को लगाने के लिए पीसीबी से कभी किसी तरह की अनुमति ही नहीं ली। वहीं साजीदेहड़ा स्थित 20 एमएलडी के एसटीपी को स्थापित करने के यूआईटी ने सहमति ली, लेकिन जल अधिनियम के मानकों पर खरा न उतर पाने के कारण पीसीबी ने इसके संचालन का आवेदन रिफ्यूज कर दिया।
कानून का खुला उलंघन
आरएसपीसीबी और एनजीटी की 10 साल की कोशिशों के बाद भी जब नगर निगम और यूआईटी चम्बल को बचाने के लिए गंभीर नहीं हुए तो प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने दोनों निकायों के खिलाफ जल प्रदूषण निवारण एंव नियंत्रण अधिनियम 1974 की धारा 24 और 26 के उलंघन का दोषी मानते हुए इसी अधिनियम की धारा 44 के तहत कोटा सीजेएम कोर्ट में आपराधिक मुकदमा दर्ज करा दिया।