Monday Mega Story: सरकारी अस्पतालों के बाहर दर्जनों निजी एम्बुलेंस खड़ी रहती हैं। मुख्य द्वार के दोनों ओर इन्होंने ही कब्जा कर रखा है। रैफर रोगी, जांच के लिए जाने वाले मरीज या डेड बॉडी को देखते ही ये लोग परिजनों पर लपक पड़ते हैं।
आशीष जोशी
प्रदेश में सरकारी एम्बुलेंसों की तो नियमित जांच हो रही है, लेकिन निजी एम्बुलेंस जीवनदायिनी है या नहीं…इसे जांचने का कोई प्रावधान ही नहीं है। कोटा में निजी एम्बुलेंस में ऑक्सीजन नहीं मिलने से एक वृद्धा की मौत के मामले के बाद पत्रिका ने पूरे प्रदेश में पड़ताल की तो पता चला कि खुद सरकार ने इन्हें खुला छोड़ रखा है।
राज्य के लगभग सभी सीएमएचओ ने कहा कि निजी एम्बुलेंसों को जांचना उनके अधिकार क्षेत्र में ही नहीं है। परिवहन विभाग एम्बुलेंस का पंजीयन करता है और संचालन की स्वीकृति भी वही देता है। उसके बाद विभाग केवल इनके वाहनों की फिटनेस चैक करता है। अंदर जीवनरक्षक उपकरणों की जांच कोई नहीं कर रहा। यहां तक कि प्रदेश के अधिकांश जिलों में इनकी दरें भी तय नहीं होने से खुलेआम मरीजों और उनके परिजनों को लूटा जा रहा है। जबकि एम्बुलेंस श्रेणी में पंजीकृत ये वाहन सरकार की ओर से टैक्स फ्री है।
भीलवाड़ा, बांसवाड़ा, बाड़मेर, बारां जैसलमेर और भरतपुर समेत अधिकांश जिलों में निजी एम्बुलेंस की दरें ही तय नहीं है। कई जिलों में कोरोनाकाल में दरें तय हुई, लेकिन अब रेट में मनमानी चल रही है।
सरकारी अस्पतालों के बाहर दर्जनों निजी एम्बुलेंस खड़ी रहती हैं। मुख्य द्वार के दोनों ओर इन्होंने ही कब्जा कर रखा है। रैफर रोगी, जांच के लिए जाने वाले मरीज या डेड बॉडी को देखते ही ये लोग परिजनों पर लपक पड़ते हैं। कई बार झगड़ा भी करते हैं।
निजी एम्बुलेंस संचालक तय किराए से अधिक वसूल रहे हैं तो पीड़ित आरटीओ के पास शिकायत कर सकते हैं। नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।
राजेन्द्र सिंह शेखावत, आरटीओ प्रथम जयपुर
हम केवल सरकारी एम्बुलेंस की जांच करते हैं। निजी एम्बुलेंस हमारे नियंत्रण से बाहर है। केवल शुरुआत में रजिस्ट्रेशन के दौरान सुविधाएं देखते हैं। उसके बाद इन्हें हम नहीं देखते।
डॉ विजय सिंह फौजदार, सीएमएचओ, जयपुर प्रथम
हम निजी एम्बुलेंस नहीं जांचते। इस संबंध में हमारे पास कोई गाइड लाइन नहीं है।
एसएस शेखावत, सीएमएचओ, जोधपुर शहर
सरकारी एम्बुलेंस की जिम्मेदारी हमारी है। इनमें 104, 108 के साथ ही नेशनल हाईवे की कुल 70 एम्बुलेंस हैं। निजी एम्बुलेंस हमारे अंडर में नहीं आतीं।
गौरव कपूर, सीएमएचओ भरतपुर
जयपुर: कोविड के दौरान रेट लिस्ट जारी की थी, लेकिन अब कहीं भी यह सार्वजनिक नहीं है।
जोधपुर: निजी एम्बुलेंस की केवल मोटर वाहन अधिनियम के तहत ही जांच की जाती है।
कोटा: कोविड के समय दरें तय हुई, लेकिन अब पालना नहीं हो रही। स्वास्थ्य विभाग नहीं करता जांच।
सीकर: चिकित्सा विभाग की ओर से एम्बुलेंस 108 या 104 का ही निरीक्षण किया जाता है।
अजमेर: स्वास्थ्य विभाग की ओर से जांच की व्यवस्था नहीं। दो महीने पहले परिवहन विभाग की ओर से जेएलएन अस्पताल के पास से इन्हें हटाया गया।
दौसा: केवल सरकारी एम्बुलेंस की प्रतिमाह जांच। निजी की मनमानी रेट, कोई दर तय नहीं।
भरतपुर: अनाधिकृत गैस किट लगाकर एम्बुलेंस पर कार्रवाई।
श्रीगंगानगर: निजी एम्बुलेंस जांच की कोई व्यवस्था नहीं है।
बारां: निजी एम्बुलेंस बारां से कोटा (80 किमी) के लिए 2 से 3 हजार तक ले रहे हैं। पिछले माह 8 एम्बुलेंस पर कार्रवाई की।
बाड़मेर: वाहनों की फिटनेस के अलावा किसी तरह की जांच नहीं। कोई दर तय नहीं है।