आईआईटी और एनआईटी को छोड़ दें तो निजी इंजीनियरिंग कॉलेजों में दाखिला लेने वाले छात्रों की तादाद में बीते दो साल से सालाना एक लाख की दर से कमी दर्ज की गई है...
कोटा. एक दौर था जब साइंस में रूचि रखने वाले हर बच्चे का सपना बड़ा होकर इंजीनियर बनने का होता था। यही वजह रही कि 90 के दशक के बाद देश में इंजीनियरिंग कॉलेजों की संख्या बेहद तेजी से बढ़ी थी। आलम ये था कि कम उम्र में कोर्स के तीसरे साल में ही उनको आसानी से नौकरियां मिल जाती थीं। लेकिन मौजूदा समय में विद्यार्थी घटते रोजगार और पढ़ाई के गिरते स्तर की वजह से भविष्य के लिए दूसरी राहें तलाश रहे हैं। राजस्थान समेत देश के विभिन्न राज्यों में स्थित इंजीनियरिंग कॉलेजों की खाली पड़ी लाखों सीटें इस बात का ठोस सबूत है। आईआईटी और एनआईटी को छोड़ दें तो निजी इंजीनियरिंग कॉलेजों में दाखिला लेने वाले छात्रों की तादाद में बीते दो साल से सालाना एक लाख की दर से कमी दर्ज की गई है।
92 फीसदी रोजगार के लिए प्रशिक्षित नहीं
देश के राष्ट्रीय कौशल विकास निगम के अनुसार सिविल, मैकेनिकल और इलेक्ट्रिक इंजीनियरिंग जैसे कोर सेक्टर के 92 प्रतिशत इंजीनियर और डिप्लोमाधारी रोजगार के लिए प्रशिक्षित नहीं हैं। कॉलेजों में पठन-पाठन और आधारभूत ढांचे में गिरावट इसकी बड़ी वजह है। हाल ही केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने लोकसभा में इस बारे में जानकारी देते हुए बताया था कि एआईसीटीई ने 2016 से अब तक, यानी करीब तीन सालों में देशभर के 128 ऐसे इंजीनियरिंग कॉलेजों पर ताला जड़ा है मानकों पर खरे नहीं उतर पाए हैं ।
1. शैक्षणिक सत्र 2016-17 के दौरान देशभर के कुल 55 इंजीनियरिंग कॉलेज बंद हुए।
2 .शैक्षणिक सत्र 2017-18 के दौरान देश में 47 इंजीनियरिंग कॉलेज बंद हुए।
4. शैक्षणिक सत्र 2018-19 में 5.एआईसीटीई ने कुल 26 इंजीनियरिंग कॉलेजों पर ताला लगाया।
राज्य 2016-17 में बंद कॉलेजों की संख्या 2017-18 2018-19
प्रदेश में हर साल आवेदनों में आई कमी
2012-13 48847
2013-14 56318
2014-15 42322
2015-16 37071
2016-17 32383
2017-18 29142
2018-19 27456