
कोटा/झालावाड़.मुझे पढ़ाने के लिए उन्होंने अस्पतालों में पोंछा तक लगाया... हॉस्टलों में रोटियां भी बनाईं, लेकिन किस्मत को उनका साथ मंजूर नहीं था... 5 साल पहले भगवान ने उन्हें मुझसे छीन लिया... मां तो चली गई, लेकिन जाते-जाते कामयाबी हासिल करने के सपने दे गई... इसलिए मैं न तो डॉक्टर बनना चाहता हूं और ना ही इंजीनियर... मेरा सिर्फ एक ही लक्ष्य है सिविल सर्विस एग्जाम क्वालिफाइ करके कलक्टर बनूं। झालावाड़ जिले का रटलाई गांव के निवासी राजेंद्र थैले बनाकर अपने परिवार का पालन-पोषण करते थे, लेकिन उनकी कमाई इतनी नहीं थी कि अपने बेटे सौरभ को अच्छे स्कूल में पढ़ा सकें। जबकि उनकी पत्नी रेखा का एक ही ख्वाब था कि बेटा पढ़लिख कर कलक्टर बने। इस ख्वाब को पूरा करने के लिए रेखा रटलाई से कोटा आ गईं और यहां दिन में अस्पतालों में पोंछा लगाने तक का काम किया। अच्छे स्कूल में सौरभ की पढ़ाई के लिए फिर भी रुपए कम पड़े तो हॉस्टलों में खाना बनाना भी शुरू कर दिया। दिन रात की मेहनत की, लेकिन किस्मत को ये मंजूर नहीं था, लिवर फेल होने से उनकी मौत हो गई।
रेखा की मौत के बाद राजेंद्र ने तमाम कोशिशें की, लेकिन उनकी माली हालत नहीं सुधर सकी। आखिरकार सौरभ के नाना सत्यनारायण और उसकी नानी धनकंवर उसे लेकर गंदीफली आ गए। आंगनबाड़ी सहायिका नानी ने अपने जीवन की सारी जमा पूंजी सौरभ की पढ़ाई पर लगा दी। निजी स्कूल में चार साल पढ़ाया।
सरकारी स्कूल बना सहारा
कक्षा 11 में सौरभ का दाखिला गंदीफली के उच्च माध्यमिक विद्यालय में करा दिया। सरकारी स्कूल की पढ़ाई को लेकर सौरभ के मन में शंका थी, जिसे शिक्षकों ने दूर किया और उसकी कमजोरियों को दूर कर सफलता की राह दिखाई। 1 जून को घोषित 12 वीं बोर्ड कला संकाय में 500 में से 446 अंक हासिल कर उसने न सिर्फ स्कूल टॉप किया, बल्कि डिस्ट्रिक्ट मैरिट में भी जगह बनाई।
अब बनना चाहता है आईएएस
अब सौरभ राजकीय महाविद्यालय में दाखिला लेकर सिविल सर्विसेज एग्जाम क्वालिफाई करना चाहता है। सौरभ ने बताया कि मां तो चली गई, लेकिन अपना सपना मुझे दे गई। मैं उसे पूरा करके दिखाऊंगा।