
कोटा. सोचकर बताइए कि आखिरी बार आपने बच्चे को छत पर ले जाकर सितारे कब गिने थे... चलिए अब तो छत ही नहीं रही तो सितारे क्या गिनना, लेकिन उसे सुलाते समय कब कहानी सुनाई थी यह तो याद होगा... चलो मान लिया दोनों घर और दफ्तर में उलझे रहते हैं, जिदंगी में और भी 36 काम हैं, लेकिन यह तो याद होगा कि अपने हाथों से उसे खाना कब खिलाया था या फिर दिन कैसा गुजरा, दोस्तों के साथ मस्ती की या फिर कौन से टीचर उसे क्यों पसंद हैं... पूछा है कभी? नहीं, तो आपकी पेरेंटिंग में चूक हो रही है। और यदि हां, तो बच्चे के लिए आप से बेस्ट मम्मी पापा दूसरे नहीं हो सकते। ( parenting Day Special )
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बढ़ रही है मुसीबत
न्यू मेडिकल कॉलेज से लेकर प्राइवेट प्रेक्टिस कर रहे क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट के सामने ऐसे बच्चों की भीड़ लगने लगी है जो टेक्नोलॉजी एडिक्शन के शिकार हो चुके हैं और सामाजिक जीवन में या तो बेहद उत्पाती हैं या फिर बेहद पिछड़े। न्यू मेडिकल कॉलेज की क्लीनिकल सॉइकोलॉजिस्ट पूर्ति शर्मा बताती हैं कि आइडियल पेरेंटिंग अब एक नई समस्या हो गई है। सफलता की ख्वाहिशों ने बच्चे को 'इंटेलीजेंसीÓ के मुकाबले में झोंक कर न सिर्फ उसका बचपन छीन लिया है, बल्कि खुद को तकनीकी तौर पर अपडेट कर अपने भावनात्मक लगाव भी दांव पर लगा दिया है। नतीजतन, आपका उसके किसी सामान से हाथ लगाना तक पसंद नहीं है। घर के बजाय बाहरी लोगों के साथ ज्यादा कंफर्टेबल होने लगे हैं। खास तौर पर सोशल मीडिया।
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अजीज दोस्त बनें
शर्मा सलाह देती हैं कि बच्चे कच्चे घड़े की तरह होते हैं। सही आकार देने के लिए ऊपर से चोट देना जरूरी है, लेकिन नीचे हाथ लगाकर। ताकि कच्ची मिट्टी बिखरने की बजाय एकदम सही आकार ले सके। सबसे पहले बच्चों के दोस्त बनें। इतने अजीज कि बुरे से बुरा होने पर भी वह आपसे कुछ भी न छिपा पाएं। लोगों के बीच घुलना-मिलना सिखाएं। हर वक्त पढ़ाई पर जोर न दें। हर चीज के लिए समय नियत करें, ताकि समय की कीमत समझ सके और व्यवस्थित जीवन जीने की आदत पड़ सके। उसे पानी, पेड़ और खाना बचाने की सीख दें, ताकि वह चीजों का महत्व और उनकी कीमत समझ सके। बच्चे के सामने लड़ाई झगड़ा तो दूर बहस तक न करें, क्योंकि वह 90 फीसदी व्यवहार आपको देखकर ही सीखता है।
मुसीबत में न झिझकें
बच्चे के साथ-साथ उसका पसंदीदा कार्टून जरूर देखें, ताकि पता चल सके कि वह कहीं ऐसे कैरेक्टर को पसंद तो नहीं करने लगा है जो उसके लिए नकारात्मक हो। ऐसा लगते ही उस चैनल को तुरंत ब्लॉक कर दें। बच्चा सोशल मीडिया से जुड़ा है तो खुद उसके एकाउंट से जरूर जुड़ें, ताकि उसकी हर गतिविधि पर नजर रह सके। इंटरनेट देना आसान है, लेकिन वह क्या देख रहा है यह मुश्किल इसीलिए कोशिश करें कि वह जब भी नेट एक्सिस करे आप साथ में मौजूद हों। इन सभी सावधानियों के बावजूद भी कुछ अटपटा लगे तो क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट की सलाह लेने में बिल्कुल भी न झिझकें। वह उसका व्यवहार जांच कर आपको सही दिशा दिखा सकता है, ताकि आप बेस्ट पेरेंट्स बन सकें।