कोटा

Parenting Day: ‘आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस’ का तोहफा देकर बच्चों को रोबोट बना रहे पेरेंट्स, कोटा के ये केस बयां कर रहे कड़वी हकीकत

National parenting Day 2019 : बच्‍चों की हर डिमांड पूरी करने के बावजूद हमारी पेरेंटिंग पर सवाल क्यों?
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Jul 28, 2019
National parenting Day
Parenting Day: 'आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस' का तोहफा देकर बच्चों को रोबोट बना रहे पेरेंट्स, कोटा के ये केस बयां कर रहे कड़वी हकीकत

कोटा. स्मार्ट क्लास वाला स्कूल, मोबाइलऔर लैपटॉपसे लैस कबर्ड, इंटरनेट से दुनिया पर पकड़ और हर तरह का स्टडी मैटेरियल एवेलेबल कराया है... स्पोट्र्स एकेडमी या डांस क्लास में भी दाखिला करा दिया है। कॉलोनी या सोसाइटी में किसके बच्चे के पास है वो सब जो हमने दिया है उसे... हर डिमांड पूरी की है, तो फिर हमारी पेरेंटिंग पर सवाल क्यों? तो जनाब, इसका सीधा जवाब है कि आप ऐसा करके अपने बच्चे की नहीं, बल्कि अपने लिए खुशियां खरीद रहे हैं। रोबोट फिल्म का डॉ. वसीगरन बनकर उसे चित्तीबनाने पर तुले हैं। 'आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस का तोहफा देकर उसे इंसान बनाने की बजाय रोबोट में तब्दील कर रहे हैं।

केस-1 पर्सनेलिटी डिसआर्डर का तोहफा
मुकेश (बदला हुआ नाम) उम्र 12 साल। पढ़ाई में अच्छे अच्छों के कान कतर दे। दुनिया की कोई ऐसी इन्वेंशन नहीं, जिसकी उसे खबर न हो। गेमिंग का मास्टर, लैपटॉप और मोबाइल तो ऐसे चलाता है मानो अभिमन्यु की तरह सीखकर आया हो। लेकिन, दोस्ती के नाम पर पसीने छूट जाते हैं। घर में चार मेहमान आ जाएं तो कमरे में दुबक कर बैठ जाता है और तो और क्लास में जब प्रजेंटेशन की बात आती है तो बगलें झांकने लगता है या फिर हकलाने लगता है। आप कुछ भी कर लीजिए लेकिन सोशल इन्वॉल्मेंट की बात आते ही हाथ खड़े कर देता है। माता-पिता दोनों नौकरीपेशा थे, अच्छे पढ़े-लिखे भी इसीलिए उसे क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट के पास ले गए। तीन चार दौर की काउंसलिंग हुई तो पता चला कि बच्चा परफॉर्मेंस एन्जाइटी का शिकार होने के बाद अब पर्सनेलिटी डिसऑर्डर से ग्रसित हो चुका है। यह तोहफा भी किसी और ने नहीं बल्कि इंटेलीजेंसी के मुकाबले में झौंकने वाले अभिभावकों ने ही दिया है। तकनीक के वरदान ने उसका बचपन समाज से ऐसा काटा कि कम्युनिकेशन स्किल्स सीखता ही कब?

केस-2 सहूलियत देकर छीना साझीदार
साक्षी (बदला हुआ नाम) उम्र 14 साल... बेहद चिड़चिड़ी, बात बात पर रोना, घर में किसी से बात करना तो दूर परिजनों पर ही यकीन न करना उसकी बड़ी समस्या बन चुके थे। काउंसलर्स ने उसका मन टटोलना शुरू किया तो बड़ी मुश्किल से खुली, लेकिन जब बोलना शुरू किया तो सभी भौचक रह गए। बोली, उन्होंने बड़े अंग्रेजी स्कूल में दाखिला दिलाया, मंहगी ट्यूशन भी लगवाई। हर हफ्ते पिक्चर भी दिखाते हैं।

मोबाइल और कम्प्यूटर के साथ इंटरनेट भी दिया है, लेकिन एक ताने के साथ कि फलाने की बेटी ने ढिमकी जगह टॉप किया है, अब तुम भी करके दिखाना... जब उन्हें अपनी बच्ची कमतर लगती है तो फिर वह दूसरे बच्चों से तौलते ही क्यों हैं? दब्बू बना दिया उन्होंने, मैं क्या चाहती हूं यह पूछना तो दूर दिन कैसा गुजरा इस बारे में भी बात नहीं करते। ड्रेसिंग सेंस तक नहीं सिखाया उन्होंने कि मुझ पर क्या अच्छा लगता है और क्या नहीं? बस कॉम्पटीशन ही उनके दिमाग में घूमता है। उनसे बेहतर तो सोशल मीडिया के दोस्त हैं जो मेरा हर दुख दर्द साझा करते हैं।

सहूलियत के साथ जिम्मेदारी दें
शर्मा सलाह देती हैं कि बच्चों को सहूलियत दीजिए, लेकिन टीवी, मोबाइल या लैपटॉप का एडिक्ट मत बनाइए। अव्वल आने का बोझ लादने के बजाय उन्हें जिम्मेदारी का अहसास कराएं। स्कूल बैग कबर्ड में रखना, जूते, मोजे या और दूसरा सामान ही नहीं खिलोने तक संभालकर रखने की आदत डलवाएं। बैड से लेकर रूम की साफ-सफाई, घर की चीजों की देखभाल करने की जिम्मेदारी का अहसास कराएं। और, उनसे बात करें। हर अच्छे-बुरे मसले पर बात करें। और, इसी दौरान पढ़ाई की अहमियत समझाएं। जिम्मेदारी का अहसास उसमें लगाव पैदा करेगा और जब वह आपकी खुशियों से खुश और दुखों से दुखी होने लगेगा तो पढ़ाई क्या चीज है जिंदगी के हर मोड़ पर अव्वल आने लगेगा।

Published on:
28 Jul 2019 10:00 am