
निलम्बित व लाइन हाजिर तक हो चुके पुलिसकर्मी
कोटा . हाड़ौती में पिछले एक पखवाड़े में पुलिस (Rajasthan police ) का क्रूर चेहरा उजागर हुआ है। दो जनों की मौत और गेंडोली थाने में युवक को पीटने की घटना ने पुलिस की लापरवाही उजागर कर दी है। ( Prisoner's death in police custody) एक के बाद एक पुलिस की मनमानी करने की शिकायतों ने व्यवस्था व पुलिसिया अनुशासन ( police Dicipline ) की पोल खोलकर रख दी है।
यूं तो पुलिस को आरोपी को हिरासत में लेने पर प्रारंभिक पूछताछ करने के बाद 24 घंटे में न्यायालय में पेश करने का अधिकार है, लेकिन थानों में आरोपियों की गिरफ्तारी से लेकर उसे कई दिनों तक रखने की बात किसी से छिपी हुई नहीं है। पुलिस हिरासत ( police custody ) में कई दिन रखने की शिकायतें दबी जुबान से आरोपी व उनके परिजन कहते रहते हैं, लेकिन पुलिस के हाथ में जांच का अधिकार होने से कोई भी खुलकर सामने नहीं आता। खाकी भी आरोपी व परिजनों को डराकर मनमाफिक कहानी बनाकर पेश करती है, लेकिन हिरासत में रिमांड मिले बिना ही आरोपियों की निर्ममता से पिटाई से जान जाने, पुलिस के डर से थाने में जहर खाकर जान देने व थाने में मारपीट करने जैसे मामले पुलिस की मनमानी को बयां कर रहे हैं।
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पुलिस की हिरासत में मौत
कोटा शहर के महावीर नगर थाने में हनुमान महावर को पुलिस ने 22 अगस्त को शांतिभंग में हिरासत में लिया था। 23 को पुलिस हिरासत में उसकी मौत हो गई। परिजनों ने आरोप लगाया कि उसने बेटी से बलात्कार के मामले में कार्रवाई के लिए एफआईआर दी थी। इस मामले में पुलिस समझौते का दबाव बना रही थी। जनविरोध के बाद सीआई को लाइन हाजिर और बाद में निलम्बित किया गया, वहीं 21 पुलिसकर्मियों को लाइन भेज दिया।
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इतना मारा कि चमड़ी ही उधड़ गई
बूंदी के गेण्डोली थानाधिकारी ने 25 अगस्त को बजरंग दल इकाई अध्यक्ष महावीर को श्यामपुरिया से हिरासत में लिया और पांच दिन तक थाने के लॉकअप में बंद रखकर बेदर्दी से पीटा। पुलिस ने उसे भैंसखेड़ा में भगवान चारभुजा की मूर्ति चोरी करने के आरोप में पकड़ा था। इस मामले में थानाधिकारी समेत पांच पुलिसकर्मियों को लाइन हाजिर कर खानापूर्ति कर की गई है।
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खाकी के खौफ से खाया जहर
बारां जिले के मांगरोल थाने में पुलिस हिरासत में युवक रावल जावल गांव निवासी गिरिराज इतना खौफ में आ गया कि उसने 4 सितम्बर को जहर खा लिया, जिससे कुछ ही घंटों बाद देर रात उसकी मौत हो गई। इस मामले में पुलिस ने थानाधिकारी समेत तीन पुलिसकर्मियों को निलम्बित कर दिया, जबकि थाने के 25 पुलिसकर्मियों को लाइन हाजिर किया गया। जनप्रतिनिधियों व लोगों के विरोध के बाद दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज किया गया है।
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मामला बढ़ा तो की कार्रवाई
पुलिस तीनों ही मामलों में घटना के तुरंत बाद कार्रवाई करने के बजाए इसे टालने व दोषी पुलिसकर्मियों को बचाने में जुटी नजर आई। यहां तक की अधिकारियों ने दोषी पुलिसकर्मियों को बचाने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा दी, लेकिन लोगों व जनप्रतिनिधियों के कड़े विरोध के चलते पुलिस को कार्रवाई करनी पड़ी।
प्रावधान के
बावजूद कार्रवाई की कछुआ चाल
पुलिस हिरासत में मौत के मामले में तुरंत प्रभाव से पुलिस निरीक्षक को निलम्बित करने व थाने को लाइन हाजिर करने का प्रावधान है, लेकिन महावीर नगर में हनुमान महावर की मौत का मामला हो या बारां जिले के मांगरोल में पुलिस हिरासत युवक के जहर खाकर जान देने या फिर बूंदी जिले के गेण्डोली थाने में बजरंग दल इकाई अध्यक्ष से पूछताछ के नाम पर मारपीट ने खाकी की क्रूरता की सभी हदें पार कर दी। किसी भी मामले में पुलिस के उच्चाधिकारियों ने त्वरित कार्रवाई नहीं की। मामले में राजनीतिक हस्तक्षेप, लोगों के जबरदस्त विरोध के बाद दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई हुई।
पुलिस हिरासत बन गई आफत
पुलिस हिरासत में अपराधी परेशान हो या न हो, लेकिन साधारण मामलों में पहुंचे लोगों के साथ पिटाई व क्रूरता की जा रही है। पुलिस थानों में समझौतों, मामले को दबाने के लिए आरोपी पक्ष की ओर से भी मामला दर्ज कर फरियादी पर दबाव बनाना आम होता जा रहा है। इस पर अधिकारियों से शिकायतों पर कार्रवाई नहीं होने से अपराधियों की जगह आमजन में पुलिस का खौफ है। ऐसे में आमजन पुलिस से जुडऩा तो दूर थानों की चौखट तक नहीं चढऩा चाहता।
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सबको सम्मान से जीने का अधिकार
पुलिस अभिरक्षा में किसी भी व्यक्ति की मौत को सुप्रीम कोर्ट ने अत्यंत गंभीरता से लेने के लिए समय-समय पर कहा है, क्योंकि यह सभ्य समाज के विरुद्ध जघन्य अपराध है। भारतीय संविधान में प्रत्येक व्यक्ति को सम्मान के साथ जीवन जीने का अधिकार प्राप्त है। किसी व्यक्ति के अभिरक्षा में जाने मात्र से यह अधिकार समाप्त नहीं हो जाता है। यदि किसी व्यक्ति को अभिरक्षा में रहते हुए प्रताडि़त किया गया है और ऐसे व्यक्ति की मौत अभिरक्षा में रहते हुए हो गई है तो राज्य का दायित्व है कि उसके आश्रित परिजन को क्षतिपूर्ति राशि अदा करे। राज्य द्वारा क्षतिपूर्ति रकम नहीं देने पर आश्रित व्यक्ति इस सम्बन्ध में राज्य के विरुद्ध नियमानुसार सक्षम न्यायालय में आवेदन कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट एवं अनेक उच्च न्यायालयों ने अनेकों प्रकरण में ऐसी क्षतिपूर्ति राशि मृतक के आश्रितजन को राज्य से दिलवाई है। राज्य को अधिकार होता है कि ऐसी अदा की गई राशि सम्बन्धित अधिकारी आदि से वसूल कर सके। सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय दिलीप के बसु बनाम बंगाल राज्य 2015 एआईआर 2887 में कहा है कि मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम के प्रावधान के अनुसार अभिरक्षा में मौत के प्रकरण का विचारण शीघ्र हो। इसलिए विशेष न्यायालय का गठन किया जाना चाहिए। साथ ही, पुलिस थानों में सीसीटीवी कैमरे भी लगाए जाने चाहिए।
विवेक नन्दवाना, एडवोकेट