
कोटा . मुबारक हो कोटा... सुना है अब तुम्हारा वक्त बदलने लगा है... 12 अंकों के बीच 110 साल से फंसी दो सूइयों को परे धकेल तुम डिजिटल हो चुके हो... जिन धरोहरों को तुम अपनी थाती बताते नहीं थकते थे, उनकी कब्रों पर कदम रखकर 'स्मार्ट बन रहे हो... सुनो! तुम्हारे बुजुर्गों के सुनहरे दौर की तीन सूइयां अब भी साबूत बची हैं... हो सके तो उन्हें टूटने से बचा लो... जिन घंटाघरों ने चार पीढिय़ों का वक्त बदला... उनकी घडिय़ों को फिर से चला दो।
Read More: रेलवे चीफ मैनेजर ने एसएसई को लताड़ा, कहा- नाच के दिखाओ, नहीं तो पड़ेंगे दो थप्पड़, अपमान से आहत अधिकारी बोले-आत्महत्या कर लूंगा
साल 1908... नागदा से मथुरा तक के सफर को आसान बनाने के लिए कोटा के तत्कालीन महाराव उम्मेद सिंह द्वितीय ने अंग्रेजों की मदद से रेलवे लाइन बिछवाई। ट्रेनों के ठहराव के लिए कोटा में जंक्शन बना। यह वो दौर था जब आम लोगों के पास घडिय़ां नहीं होती थीं। ऐसे में ट्रेन के आने और जाने का पता चल सके, इसके लिए इंग्लैंड से घड़ी मंगाकर जंक्शन के मुख्य द्वार के ऊपर लगवाई गई।
इस घड़ी से जुड़े घंटे को ट्रेन के टाइम टेबल के साथ ऐसे सेट किया गया था कि ट्रेन के आने और जाने से पहले बजने लगते थे। वहीं वक्त बताने के लिए 12 रोमन अक्षर काटकर डायल पर चिपकाए गए थे। इसमें हर सात दिन बाद चाबी भरी जाती थी। 80 साल की उम्र में जब यह मैकेनिकल घड़ी खराब हुई तो इसमें इलेक्ट्रिकल मशीन लगा दी गई, लेकिन वैभव ज्यों का त्यों बरकरार रहा।
Big News: हाड़ौती के इन किसानों के लिए किसी काम का नहीं ये सरकारी फरमान
बदल गया वक्त
नियमित सर्विस न होने के कारण यह घड़ी दिसंबर 2017 में बंद हो गई। घड़ीसाजों ने मरम्मत में एक लाख रुपए का खर्च बताया तो रेलवे प्रशासन ने ऐतिहासिक घड़ी को हटाकर इस महीने उसी जगह डिजिटल वॉच लगा दी। कल्चरल रिसर्चर डॉ. मदन मीणा ये कहते हुए रोष जताते हैं कि 'रेलवे ने ऐतिहासिक इमारत के मुकुट में लगा हीरा ही हटा दिया।