Shahabad Pump Storage Project: राज्य सरकार की ओर से पंप स्टोरेज परियोजना को मंजूरी मिलने के बाद स्थानीय वनवासी समुदाय और पर्यावरण कार्यकर्ताओं का विरोध तेज हो गया है।
Patrika Ground Report: बारां जिले के शाहाबाद का घना जंगल इन दिनों विकास और पर्यावरण के टकराव का नया केंद्र बन गया है। राज्य सरकार की ओर से पंप स्टोरेज परियोजना को मंजूरी मिलने के बाद स्थानीय वनवासी समुदाय और पर्यावरण कार्यकर्ताओं का विरोध तेज हो गया है। जहां सरकार इसे ऊर्जा उत्पादन और स्थिरता की दिशा में बड़ा कदम बता रही है, वहीं जमीनी स्तर पर इसे जंगल और जीवन पर खतरे के रूप में देखा जा रहा है।
पर्यावरण कार्यकर्ता डिजिटल प्लेटफार्म पर ऑनलाइन याचिका से व्यापक जनसमर्थन जुटा रहे हैं। पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में सक्रिय संस्था ‘हम लोग’ ने ‘सेव शाहबाद’ नाम से लाइव याचिका शुरू की है। यह याचिका परियोजना के खिलाफ जनमत तैयार कर रही है। अब तक सैंकड़ों लोग याचिका से जुड़ चुके हैं। याचिका में बताया गया है कि शाहबाद का वन क्षेत्र जैव विविधता से भरपूर है। जहां दुर्लभ वन्यजीव और वनस्पतियां मौजूद हैं। परियोजना के तहत बड़े जलाशयों का निर्माण, जमीन का अधिग्रहण और हजारों पेड़ों की कटाई इस पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को गंभीर नुकसान पहुंचाएगी।
पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर इस परियोजना पर रोक लगाने की मांग भी की है। पत्र में कहा गया है कि विकास के नाम पर आदिवासी समुदायों के अधिकारों और पर्यावरणीय संतुलन की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए। वैकल्पिक स्थानों पर विचार करने की भी मांग उठाई है।
स्थानीय वनवासी समुदाय का कहना है कि उन्हें इस परियोजना के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं दी गई और ना ही उनकी सहमति ली गई। गांव-गांव में बैठकें और विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। लोगों का आरोप है कि यह परियोजना उनके जल, जंगल और जमीन पर सीधा हमला है, जिससे उनकी आजीविका प्रभावित होगी।
624.17 हेक्टेयर जमीन चिह्नित शाहपुर पंप स्टोरेज परियोजना के लिए
407 हेक्टेयर से अधिक वन भूमि है इसमें
1.2 लाख से अधिक पेड़ काटे जाने की आशंका
450 तरह के औषधीय पौधों से समृद्ध है यह जंगल
वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, यहां तेंदुए, स्लॉथ बीयर और गिद्ध जैसे अनुसूची-1 वन्यजीव मौजूद हैं। यह प्रस्तावित कुनो-गांधी सागर वन्यजीव कॉरिडोर के भीतर स्थित है। जो 17,000 वर्ग किलोमीटर का एक भू-भाग है। जिसे भारत में चीतों के दीर्घकालिक अस्तित्व के लिए आवश्यक माना गया है। चीतों को पहले ही कुनो से राजस्थान की ओर आते हुए देखा जा रहा है।
पर्यावरण कार्यकर्ताओं के अनुसार, वनवासियों के लिए यह जंगल सिर्फ जमीन नहीं, बल्कि जीवन है। आसपास के गांवों में लगभग ढाई हजार लोग रहते हैं। इनमें से लगभग 400 लोग सहरिया जनजाति से हैं। उनकी 80% से अधिक आय महुआ, तेंदू और आंवला जैसे वन उत्पादों से आती है। अगर जंगल नष्ट हो गया, तो उनका घर, भोजन, आय, संस्कृति और पहचान भी नष्ट हो जाएगी। यह वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत गंभीर चिंता है, जो इन समुदायों के आवास और अधिकारों की रक्षा करता है।
इस परियोजना को ‘हरित ऊर्जा’ के रूप में प्रचारित किया जा रहा है, लेकिन वास्तविकता कुछ और ही बयां करती है। यह क्षेत्र सूखाग्रस्त है और यहां जल का कोई मजबूत बारहमासी स्रोत नहीं है। मौसमी कुनो नदी से पानी पंप करना पड़ेगा। विशाल जलाशयों को प्रतिवर्ष 8 से अधिक महीनों तक अत्यधिक वाष्पीकरण का सामना करना होगा। यह वन वर्तमान में कार्बन अवशोषण और प्राकृतिक जलवायु बफर के रूप में कार्य करता है। क्षेत्र के गुढ़ा बांध (बूंदी), बिसलपुर बांध (टोंक) और गैर-वन भूमि जैसे अन्य विकल्प देखे जा सकते हैं।
डॉ. सुधीर गुप्ता, संयोजक, हम लोग