
ललितपुर. क्षेत्रपाल जैन मंदिर में विराजमान राष्ट्र संत आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज ने अक्षय तृतीया महापर्व के अवसर पर धर्मसभा को संबोधित करते हुए अपनी मंगल वाणी में कहा कि भव्यात्माओं! भगवान ऋषभदेव का जब छह माह का योग पूर्ण हो गया वे यतियों-मुनियों की आहार विधि बतलाने के उद्देश्य से शरीर की स्थिति के लिये निर्दोष आहार हेतु निकल पड़े। महामेरू भगवान ऋषभदेव ईर्यापथ से गमन कर रहे हैं, अनेकों ग्राम नगर शहर आदि में पहुंच रहे हैं। उन्हें देखकर मुनियों की चर्या को न जानने वाली प्रजा बड़े उमंग से साथ सन्मुख आकर उन्हें प्रणाम करती है। उनमें से कितने ही लोग कहने लगते हैं कि हे देव! प्रसन्न होइये और कहिये क्या काम है ? हम सब आपके किंकर हैं, कितने ही भगवान के पीछे-पीछे हो लेते हैं।
अन्य कितने ही लोग बहुमूल्य रत्न लाकर भगवान के सामने रख देते हैं और कहते हैं कि हे नाथ! प्रसन्न होइये, तुच्छ भेंट स्वीकार कीजिये, कितने ही सुन्दरी और तरुणी कन्याओं को सामने करके कहते हैं प्रभो! आप इन्हें स्वीकार कीजिये, कितने ही लोग वस्त्र, भोजन, माला आदि अलंकार ले-लेकर उपस्थित हो जाते हैं, कितने ही लोग प्रार्थना करते हैं कि प्रभो! आप आसन पर विराजिये, भोजन कीजिये इत्यादि इन सभी निमित्तों से प्रभु की चर्या में क्षण भर के लिए विघ्न पड़ जाता है पुनः वे आगे बढ़ जाते हैं। इस प्रकार से जगत को आश्चर्य में डालने वाली गूढ़ चर्या से विहार करते हुए भगवान के छह माह व्यतीत हो जाते हैं। परन्तु किसी को भी दिगम्बर मुनि की आहार विधि मालूम न होने से उनका आहार नहीं हो पा रहा था।
आचार्यश्री आगे कहते हैं कि अक्षय तृतीया पर्व वैशाख शुक्ला तृतीया को मनाया जाता है। जैन परंपरा में इस दिन गृहस्थ श्रावक भ हुई थी। प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव जो 6 माह की साधना के बाद प्रथम आहार हेतु निकले थे परंतु किसी को आहार दान की क्रिया का ज्ञान न होने से उन्हें 6 माह तक आहार नहीं मिला।
हस्तिनापुर में जब ऋषभदेव आहार चर्या हेतु निकले तब वहां के राजा श्रेयांस को पूर्वभव का स्मरण होने से आहार विधि का ज्ञान हुआ, तब उन्होंने विधिपूर्वक ऋषभदेव को आहारदान दिया और यह परंपरा प्रारंभ हुई। प्रथम आहार इक्षुरस (गन्ने का रस ) से हुआ।
उन्होंने कहा कि गृहस्थ की शोभा दान और पूजन से है।यूं तो सभी अपने-अपने रसोईघर में भोजन करते हैं पर उसमें रसोईघर की शोभा नहीं है, जिस दिन दिगम्बर मुनिराज के आहार हो जाते हैं उस दिन रसोईघर पवित्र हो जाता है। जिस दिन दाता मुनिराज के हाथों में आहार देता है उस दिन वह अपने जीवन को धन्य कर लेता है।
आगे उन्होंने कहा कि दान हमेशा हर्षित भाव से देना चाहिये। श्रद्धा, भक्ति, तुष्टि, विवेक, क्षमा, अलुब्धता आदि सात गुणों से युक्त होकर दान देना चाहिये।जैन दर्शन में चार प्रकार का दान बताया गया है - आहार दान, औषधि दान, ज्ञानदान, अभयदान। करुणादान भी बताया गया है। गृहस्थ श्रावक को चाहिए कि इन सभी को शक्ति के अनुसार प्रत्येक दान दे।
आहार दान देने उमड़े श्रद्धालुगण
अक्षय तृतीया का जैन परंपरा में विशेष महत्व होने के कारण आज आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज और मुनि श्री ज्ञेय सागर जी महाराज को आहार दान करने के लिए श्रावक-श्राविकाएं श्रद्धा-भक्ति पूर्वक उमड़ पड़े। चौका लगाने वाले सभी भक्त चाहते थे कि आज इस महान पर्व के अवसर पर आचार्यश्री का आहार हमारे घर पर हो। सभी ने पूरी श्रद्धा के साथ आचार्यश्री के आहार के लिए पड़गाहन किया और आहार के लिए निवेदन किया। नवधा भक्ति पूर्वक आचार्य श्री ज्ञानसागर मुनिराज और मुनि श्री ज्ञेय सागर महाराज को विनय पूर्वक आहारदान श्रावक और श्राविकाओं ने दिया। भक्तों ने आहार देकर पुण्य संचय किया गया।अक्षय तृतीया पर्व को दृष्टिगत रखते हुए विशेष रूप से इक्षुरस (गन्ने का रस ) आहार में दिया गया। आहारदान करने वाले सभी श्रावकों ने इस पुण्यदायी अवसर को पाकर अपने को सौभाग्यशाली माना। जैन मंदिरों में इस पर्व पर विशेष पूजन-अर्चन किया गया। श्रद्धालुओं ने व्रत-उपवास रखे।