- महेंद्र प्रताप सिंह
लखनऊ.
यह यूपी में द्रविड़ राजनीति का उदय है? या फिर एक नेता के प्रति जनता का उमड़ा स्नेह। रात्रि के 11 बजे हैं। राजधानी की सडक़ों पर युवाओं का हुजूम है। कोई रो रहा है। कोई मरने-मारने पर उतारू है। कहीं जिंदाबाद के नारे लग रहे हैं तो कहीं मुर्दाबाद के। सपा मुख्यालय, मुख्यमंत्री आवास और मुलायम-शिवपाल का घर छावनी में तब्दील हो गया है। सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को पार्टी से निकाल दिया है। लेकिन, जनता ने उन्हें अपने दिलों में बिठा लिया है। दलगत राजनीति से ऊपर उठकर लोग कह रहे हैं अखिलेश सही हैं। सबकी जुबान पर यही सवाल। क्या सही बात के लिए लडऩा गलत है। आखिर मुलायम चाहते क्या हैं? सवाल दर सवाल। चुनाव के ठीक पहले पार्टी टूटने का उतना गम लोगों को नहीं जितना बेटे को पार्टी से बाहर निकालने का है।
अखिलेश यादव घर के बाहर जुटे युवाओं को समझा रहे हैं। संयम बरतने की अपील कर रहे हैं। कह रहे हैं किसी के प्रति अपशब्द न कहें। सुबह सबसे मिलने और घर जाने की बात कह रहे हैं। लेकिन, हुजूम है कि उमड़ा चला आ रहा है। आखिर अखिलेश में ऐसा क्या जादू है? वह हार कर भी जीत गए हैं। यूपी की राजनीति में शायद ही ऐसा कभी हुआ हो जब एक नेता के प्रति इतना प्यार उमड़ा हो। याद कीजिए 2 जून 1992 की घटना को। तब गेस्ट हाउस कांड हुआ था। बसपा सुप्रीमो मायावती के साथ बदसलूकी की गई थी। तब भी जनता में आक्रोश था। लेकिन, इतना तीव्र नहीं। अखिलेश समर्थक ऐसे रो रहे हैं जैसे अखिलेश नेता नहीं मानो जननायक हों।
खास बात यह है कि मुलायम सिंह यादव और शिवपाल समर्थकों की फौज गायब है। दोनों नेताओं के घरों की चौकसी बढ़ा दी गई है। खुद डीजीपी दोनों भाइयों के घरों की सुरक्षा का जायजा ले रहे हैं। लखनऊ ही नहीं, लखनऊ के बाहर अन्य जिलों से भी इसी तरह की खबरें आ रही हैं। अखिलेश के समर्थन में कहीं किसी ने आत्मदाह की कोशिश की तो किसी ने हाथ की नसें काट लीं हैं। चुनाव में उतरने के पूर्व जब युवक अखिलेश के लिए इस कदर उन्मादा है तो चुनाव में क्या हश्र होगा इसका अंदाजा अभी से लगाया जा सकता है। लखनऊ में आज की रात शिमला की रात से भी ज्यादा सर्द है। ओस की बूंदे आसुंओं में घुल रही हैं। लेकिन, युवाओं के जोशीले नारों की गरमी ने सर्द रात के फाहों में भी गरमाहट ला दी है। उम्मीद की जा सकती है चुनावों तक यह गरमी कायम रहेगी। इस गरमी की तपिश को भाजपा,बसपा और कांग्रेस भी महसूस कर रही हैं। उन्हें ठंड में पसीना छूट रहा है। अखिलेश का यही जलवा कायम रहा तो आगे क्या होगा।