लखनऊ

अटल के 10 अटल फैसले जिसने दिखाई इंडिया को प्रोग्रेसिव पाथ

अटल बिहारी वाजपेयी अगर आज जिंदा होते तो वो 99 साल हो गए होते। वह अब नहीं हैं, भारतीय राजनीति में उनकी कमी हमेशा खलेगी। एक पॉलिटिशियन के रूप में वाजपेयी जी ने हर वो मुकाम हासिल किया जहां पहुंचना एक नेता का एक ड्रीम होता है। वो पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री थे जिन्होंने अपना टेन्योर पूरा किया था।

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Dec 25, 2022
अटल कुल 3 बार प्रधानमंत्री रहे, पहला 13 दिन तक, फिर 13 महीने तक और उसके बाद 1999 से लेकर 2004 तक का टेन्योर उन्होंने पूरा किया। उन्होंने यह साबित किया कि देश में गठबंधन की सरकारों को भी सही तरीके से चलाया जा सकता है।

भारतीय जनता पार्टी यानी बीजेपी को 2 सीट से लेकर इसी पार्टी के लीडरशिप में सरकार तक पहुंचाना अटल जी की एक उपलब्धि है। इंडियन पॉलिटिक्स में यह उनके स्वीकार्यता को दिखाती है।

अटल कुल 3 बार प्रधानमंत्री रहे, पहला 13 दिन तक, फिर 13 महीने तक और उसके बाद 1999 से लेकर 2004 तक का टेन्योर उन्होंने पूरा किया। उन्होंने यह साबित किया कि देश में गठबंधन की सरकारों को भी सही तरीके से चलाया जा सकता है।

वाजपेयी की जब स्थिर सरकार के मुखिया बने तो उन्होंने कई ऐसे बड़े फैसले लिए जिसने इंडिया की पॉलिटिक्स को हमेशा के लिए बदल दिया। बीजेपी ने मेजॉरिटी हासिल करके सरकार बनाई। इसकी एक समय में किसी ने कल्पना भी नहीं की थी।

आज अटल बिहारी वाजपेयी का बर्थडे है। आज हम आपको अटल के 10 ऐसे अटल फैसले के बारे में बताएंगे जिसने इंडिया के फ्यूचर की नींव रखी थी।

1. सरकार बनने के 3 महीने के बाद ही पोखरण में न्यूक्लियर टेस्ट, वर्ल्ड को इंडिया के न्यूक्लियर पावर की दिखाई ताकत

साल 1998, अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में बीजेपी की सरकार बने सिर्फ 3 महीने ही हुए थे। मई की 11 और 13 तारीख को राजस्थान के पोखरण में भारत ने नुक्लियर टेस्ट का सक्सेसफुल टेस्ट किया।

1974 के बाद इंडिया का दूसरा नुक्लियर टेस्ट था। पहला नुक्लियर टेस्ट फेल हो गया था। इस टेस्ट ने वर्ल्ड में इंडिया को नुक्लियर स्टेट के रूप में पहचान दी। लेकिन, कई आलोचक अटल सरकार के इस फैसले को क्रिटिसाइज भी करते हैं। क्योंकि इसके बाद पाकिस्तान ने भी नुक्लियर टेस्ट किया था।

इस टेस्ट पर अमेरिका इंटेलिजेंस एजेंसी CIA की नजर थी। उनकी सैटेलाइट को चकमा देते हुए इंडिया टेस्ट करने में सफल रहा। अटल ने अपने इस अटल फैसले से दुनिया को भारत की ताकत का एहसास कराया। पूर्व प्रेसिडेंट अब्दुल कलाम ने लीड किया था, बाद में अटल ने कहा था कि हम परमाणु का इस्तेमाल नहीं करेंगे।

इंडिया के नुक्लियर टेस्ट के बाद वेस्टर्न कंट्रीज जैसे ब्रिटेन,कनाडा और अमरीका ने इंडिया पर इकोनॉमिक बैन लगा दिया था। वाजपेयी की डिप्लोमेटिक पॉलिसी एंड स्ट्रेटेजी पर जबरदस्त पकड़ थी। इसके रिजल्ट के रूप में 2011 तक अधिकतर कंट्रीज ने बैन हटा लिया था।

प्रसिध्द लेखिका अरुंधति राय आउटलुक के 5 अगस्त, 1998 के एडिशन में इंडिया के नुक्लियर टेस्ट की आलोचना करते हुए लिखती हैं कि ''अगर परमाणु युद्ध होता है तो यह एक देश का दूसरे देश के खिलाफ युद्ध नहीं होगा, हमारा दुश्मन ना तो चीन होगा ना ही अमरीका। हमारी दुश्मन पृथ्वी होगी।

उसके तत्व- क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा, ये सब हमारे खिलाफ हो जाएंगे। उनका गुस्सा हमारे लिए बेहद खतरनाक होगा।''

विश्व हिन्दू परिषद् यानी विहिप ने पोखरण के बालू को पुरे देश में प्रसाद के रूप में बांटने की मांग की थी।

2. पोटा एक्ट को लागु किया, 2 साल के अंदर 800 लोग जेल में बंद हो गए

साल 1998 से लेकर 2004 तक अटल की सरकार रही, ऐसा पहली बार था जब कोई गैर कोंग्रेसी पार्टी की सरकार ने अपना कार्यकाल पूरा किया हो।

सरकार बने अभी ढाई साल ही हुए थे। 13 दिसंबर 2001 को लोकतंत्र के मंदिर यानी संसद पर 5 आतंकवादियों ने हमला कर दिया। इसको इंडियन पार्लियामेंट्री हिस्ट्री का ब्लैक डे कहा जाता है।

हमले में किसी पॉलिटिकल लीडर को तो कोई नुकसान नहीं हुआ, लेकिन देश के 9 बहादुर जवान शहीद हो गए थे। बाद में पांचों आतंकवादी भी मारे गए थे। इससे पहले इसी साल 9 सितंबर को अमरीका के वर्ल्ड ट्रेड टॉवर पर सबसे खतरनाक अटैक हुआ था।

इन्हीं सब खतरों को देखते हुए देश में इंटर्नल सिक्योरिटी के लिए एक ऐसे कानून की मांग उठने लगी जो स्ट्रक्चरल रूप से काफी सख्त हो। अटल सरकार ने प्रिवेंशन ऑफ टेररिज्म एक्ट यानी पोटा कानून बनाया। पोटा कानून टाडा के मुकाबले बेहद ही कड़ा कानून था।

पोटा कानून बनते ही कंट्रोवर्सी में आ गया। सरकार पर आरोप लगने लगे कि इसके जरिए वो अपने विरोधियों को निशाना बना रही है। सिर्फ 2 साल के अंदर ही इस कानून के तहत 800 लोगों को जेल भेज दिया गया। करीब 4 हजार लोगों पर FIR लिखी गई।

AIADMK के नेता वाइको को भी पोटा कानून के तहत अरेस्ट कर लिया गया था। इन दो सालों में ही अटल गवर्नमेंट ने 32 संगठनों पर बैन लगाया था। कांग्रेस की यूपीए सरकार के आने के बाद 2004 में इस कानून को रद्द कर दिया गया था।

3. जातिगत जनगणना पर लगाया रोक, एचडी देवगौड़ा गवर्नमेंट ने दी थी मंजूरी

अटल की सरकार बनने से पहले साल 1999 एचडी देवगौड़ा गवर्नमेंट ने जातिवार जनगणना कराने की मंजूरी दे दी थी।साल 2001 में इसी के तहत जनगणना होनी थी। मंडल कमीशन के रेकमेंडेशन को लागु करने के लिए पहली बार साल 2001 में जातिवार जनगणना कराने की मंजूरी मिली थी।

मंडल कमीशन के रेकमेंडेशन को ठीक ढंग से लागू किया जा रहा है या नहीं इसे देखने के लिए जातिगत जनगणना कराए जाने की मांग जोर पकड़ रही थी।

ज्यूडिशियल सिस्टम की ओर से बार बार फैक्चुअल डाटा को जुटाने की बात कही जा रही थी ताकि कोई इफेक्टिव वर्किंग सिस्टम बनाई जा सके।

तत्कालीन रजिस्टार जनरल ने भी जातिगत जनगणना की मंजूरी दे दी थी। लेकिन वाजपेयी सरकार ने इस फैसले को पलट दिया। जिसके चलते जातिवार जनगणना आज तक नहीं हो पाई।

इसको लेकर समाज का बहुजन तबका और उसके नेता वाजपेयी की आलोचना करते रहे हैं, उनके मुताबिक वाजपेयी के फैसले से आबादी के हिसाब से हक की कैंपेन को धक्का पहुंचा।

4. डिजिटल रेवोलुशन का सेकंड फेज

इंडिया में डिजिटल कम्युनिकेशन रेवोलुशन को जन्म देने वालों में भले ही राजीव गांधी और सैम पित्रोदा का नाम आता हो। लेकिन, हर घर तक इस टेक्नोलॉजी को पहुंचाने का काम अटल सरकार ने ही किया था। अटल विहारी वाजपेयी ही थे जिन्होंने साल 1999 में भारत संचार निगम लिमिटेड यानी BSNL के एकाधिकार को एंड करते हुए नई टेलीकॉम पॉलिसी को स्टार्ट किया था।

इस नए बदलाव के पीछे बीजेपी के दिग्गज नेता प्रमोद महाजन का दिमाग था। रेवेन्यू शेयरिंग मॉडल के ऊपर फैसला लेकर कम पैसे में लोगों को सस्ती मोबाइल फोन कॉल करने की फैसिलिटी प्रोवाइड कराया। मोबाइल का दौर शुरू हो चुका था। इस टेलीकॉम पॉलिसी ने इंडिया को नए 2G रेवोलुशन के दौर को जन्म दिया था।

5. प्राइमरी एजुकेशन के ट्रांसफॉर्म के लिए सर्व शिक्षा अभियान, थीम लाइन ‘सब पढ़ें-सब बढ़ें’ को अटल जी ने खुद लिखा था

साल 2000-2001 में अटल सरकार ने 14 साल तक के बच्चों को फ्री एजुकेशन देने का कैंपेन स्टार्ट किया। यह रेवोलुशनरी डिसीजन साबित हुआ। जिसके चलते बीच में पढ़ाई छोड़ देने वाले बच्चों के नंबर में कमी दर्ज की गई। साल 2000 तक 40% बच्चे ड्रॉप आउट्स होते थे, साल 2005 आते-आते उनके नंबर 10% के पास पहुंच गई थी।

अटल बिहारी वाजपेयी को इस कैंपेन से इतना लगाव था कि उन्होंने इस स्कीम को प्रमोट करने वाली थीम लाइन ‘स्कूल चले हम’ को खुद ही लिखा था।

6. लाहौर बस यात्रा के बाद ही पाकिस्तान ने पीठ में छुरा घोंपा

अटल बिहारी वाजपेयी जब तक प्रधानमंत्री रहे उन्होंने इंडो-पाक रिलेशन को सुधारने की तेजी से प्रयास किया। बात फरवरी महीने 1999 की है। दिल्ली-लाहौर बस सर्विस स्टार्ट हुई। फर्स्ट बस ट्रिप से वे खुद लाहौर गए और पाकिस्तानी प्राइम मिनिस्टर नवाज शरीफ के साथ मिलकर लाहौर डॉक्यूमेंट पर साइन किए। उन्होंने जब यह फैसला लिया था उस वक्त उनका दूसरा कार्यकाल चल रहा था।

अटल ने अपनी इस लाहौर यात्रा के दौरान मीनार-ए-पाकिस्तान को भी विजिट किया था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी RSS हमेशा से पाकिस्तान के अस्तित्व से इंकार करता था और अखंड भारत की बात करता था। वाजपेयी का मीनार-ए-पाकिस्तान जाना एक तरह से पाकिस्तान की संप्रभुता को संघ की ओर से भी एक्सेप्ट किए जाने का संकेत माना गया।

अटल से पहले तक, भारत का कोई कांग्रेसी प्रधानमंत्री भी मीनार-ए-पाकिस्तान जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाए थे।

क्या है मीनार-ए-पाकिस्तान…

मीनार-ए पाकिस्तान लाहौर में है, यह पाकिस्तान का राष्ट्रीय स्मारक है। यहीं पर पाकिस्तान को बनाने का प्रस्ताव 23 मार्च, 1940 को पास किया गया था।

मीनार-ए-पाकिस्तान जाकर वाजपेयी ने कहा था, “मुझे काफी कुछ कहा गया है लेकिन मुझे उसमें कोई लॉजिक नजर नहीं आता। इसलिए मैं यहां आना चाहता था। मैं कहना चाहता हूं कि पाकिस्तान के अस्तित्व को मेरे स्टांप की जरूरत नहीं है, मुझसे अगर भारत में सवाल पूछे गए तो मैं वहां भी जवाब दूंगा।”

जब नवाज शरीफ ने कहा, “वाजपेयी जी पाकिस्तान में भी चुनाव लड़े तो जीत जाएंगे”...

सीनियर जर्नलिस्ट किंग्शुक नाग ने अटल बिहारी वाजपेयी पर लिखी पुस्तक आल सीजंड मैन में लिखा है, ‘उनसे तत्कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने कहा था कि अब तो वाजपेयी जी पाकिस्तान में भी चुनाव लड़े तो जीत जाएंगे।

पीस के बदले वॉर, पाकिस्तान ने पीठ में छुरा घोंपा…

लाहौर यात्रा के तुरंत बाद पाकिस्तानी सैनिकों ने कारगिल में भारतीय सीमा में घुसपैठ कर दिया। पाकिस्तानी फौज को सबक सिखाना जरुरी था।दोस्ती के हाथ को वो खून से रंगना चाहता था। भारत-पाक में युद्ध छिड़ गया। कुल 2 महीने तक चलने वाले इस युध्द में भारत के 527 सैनिक शहीद हुए थे।

यह फर्स्ट टाइम था जब भारतीय सैनिकों ने पाकिस्तानियों को उनके घर में घुसकर मारा था। इसमें पाकिस्तान की तरफ से 1500 से अधिक सैनिक मारे गए थे।

कंधार विमान हाइजैक, जब खूंखार आतंकी मसूद अजहर को छोड़ना पड़ा था…

घटना 24 दिसंबर 1999 की है। कारगिल युद्ध खत्म होने के 5 महीने बाद ही पाकिस्तान में मौजूद चरमपंथी संगठन हरकत-उल-मुजाहिदीन के आतंकियों ने IC-814 विमान का अपहरण कर लिया। काठमांडू से दिल्ली आ रहे इस जहाज में पायलट और स्टाफ समेत कुल 176 पैसेंजर मौजूद थे। भारतीय सीमा में इस जहाज को हाईजैक किया गया था।

आतंकी इस जहाज को अफगानिस्तान के कंधार ले गए। बदले में आतंकियों ने तीन चरमपंथी आतंकी अहमद ओमार सईद शेख, अहमद जरगर और मौलाना मसूद अजहर को छोड़ने की मांग की।

भारत ने अपने नागरिकों के बदले में इन तीनों आतंकियों को छोड़ने का फैसला किया।

तत्कालीन विदेश मंत्री जसवंत सिंह तीनों आतंकियों को लेकर कंधार गए और पैसेंजर्स को छुड़ाया...

इस पुरे इंसिडेंट को करीब से देखने वाले इंडियन इंटेलिजेंस एजेंसी RAW के एक्स हेड एएस दुल्लत ने एक इंटरव्यू में कहा, “दिल्ली में सरकार के स्तर पर इस मामले को ठीक ढंग से हैंडल नहीं किया गया था।”

पाकिस्तान से धोखा खाने के बावजूद अटल ने युद्ध के बदले शांति को अधिक तवज्जो दिया। वक्त बदला पाकिस्तान की सत्ता परवेज मुशर्रफ के हाथों में आ गई। यहां भी बड़ा दिल दिखाते हुए वाजपेयी ने पाकिस्तान से बातचीत की पेशकश की। उनका कहना था कि आप दोस्त बदल सकते हैं पड़ोसी नहीं।

आगरा में दोनों नेताओं के बीच हाई प्रोफाइल मुलाकात हुई लेकिन मिलिट्री पावर के नशे में मस्त परवेज मुशर्रफ को शांति की बात कहां ठीक लगनी थी। रिजल्ट में बातचीत पूरी तरह से नाकाम हो गई।

नीचे इमेज में दाईं तरफ मसूद अजहर है और बीच में तत्कालीन विदेश मंत्री जसवंत सिंह

7. कंस्टीटूशनल रिव्यु कमेटी बनाना, प्रेसिडेंट ने उठाया था फैसले पर सवाल

साल: 2000, तारीख: 26 जनवरी, मौका था देश के 50 वें गणतंत्र दिवस का। देश के नाम दिए गए भाषण में तत्कालीन राष्ट्रपति आरके नारायणन ने कंस्टीटूशन को रिव्यु करने के डिसीजन पर कहा, “जब संशोधन की व्यवस्था है ही तो फिर समीक्षा क्यों होनी चाहिए।”

इंडिया के 20वीं सदी में दस्तक देने के बाद अटल सरकार ने संविधान में संशोधन की जरुरत पर विचार करने के लिए 1 फरवरी, साल 2000 में कंस्टीटूशन रिव्यु के लिए नेशनल कमिशन का गठन किया। विपक्षी दलों समेत तत्कालीन राष्ट्रपति आरके नारायणन ने इसकी आलोचना की थी।

अटल अपने मजबूत इरादे और अटल फैसले के लिए जाने जाते थे। उन्होंने आयोग का गठन किया और उनको 6 महीने का वक्त दिया। उस समय इस बात पर डाउट था कि जिस संविधान को तैयार करने में लगभग तीन साल का वक्त लगा, उसकी समीक्षा महज छह महीने में कैसे हो सकेगी?

सुप्रीम कोर्ट के भूतपूर्व मुख्य न्यायाधीश एम एन वेंकटचलाइया के अगुवाई वाले कमीशन ने 249 सिफारिशें की थीं, लेकिन इस आयोग और उनकी रेकमेंडेशन का मास लेवल पर विरोध हुआ था, जिसके बाद वाजपेयी सरकार संविधान को संशोधित करने के काम को आगे नहीं बढ़ा पाई।

8. जब मोदी को राजधर्म का पालन करने को कहा, बोले- अगर हिंदुओं को जलाया नहीं जाता तो गुजरात में दंगे नहीं होते

साल 2002, अटल सरकार अपना आधा कार्यकाल पूरा कर चुकी थी। फरवरी के ठंड वाले मौसम में गुजरात में नफरत और हिंसा की आग भड़क उठी। 26 फरवरी से गुजरात दंगे की आग में धू -धू कर जल रह था। दंगा भड़कने के एक हफ्ते तक प्रधानमंत्री की तरफ से कोई बयान नहीं आया। विरोधी इसको लगातार मुद्दा बना रहे थे। अटल की आलोचना शुरू हो चुकी थी।

अटल का पहला बयान एक हफ्ते बाद यानी 3 मार्च को आया और उन्होंने कहा, “गोधरा से अहमदाबाद तक जिस तरह से लोगों को जिंदा जलाया जा रहा है वो देश के माथे पर दाग है।” लेकिन उन्होंने इसे रोकने के लिए कड़े और प्रभावी कदम नहीं उठाए थे।

एक महीने बाद यानी 4 अप्रैल, 2002 को वाजपेयी अहमदाबाद गए उन्होंने नरेंद्र मोदी जो उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री थे उनसे कहा, “मोदी को राजधर्म का पालन करना चाहिए।”

विरोधी यह सवाल उठाते रहे कि वो खुद राजधर्म का पालन क्यों नहीं कर पाए। उन्होंने बाद में कई मौकों पर कहा की वो चाहते थे कि मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर इस्तीफा दे दें। साल 2004 में NDTV के लिए राजदीप सरदेसाई को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि 'अगर हिंदुओं को जलाया नहीं जाता तो गुजरात में दंगे नहीं होते।’

9.प्राइवेटाइजेशन का प्रमोशन, डिसइनवेस्टमेंट की शुरुआत

अटल सरकार ने 1999 में अपनी सरकार में विनिवेश मंत्रालय के तौर पर एक अलग और मैजिकल मंत्रालय का गठन किया था। इसके पहले मंत्री अरुण शौरी बनाए गए। शौरी के मंत्रालय ने वाजपेयी जी के नेतृत्व में भारत एल्यूमिनियम कंपनी यानी बाल्को, हिंदुस्तान जिंक, इंडियन पेट्रोकेमिकल्स कॉर्पोरेशन लिमिटेड और विदेश संचार निगम लिमिटेड जैसी सरकारी कंपनियों को बेचने की प्रक्रिया शुरू की थी।

अटल सरकार से पहले देश में बीमा सेक्टर सरकारी कंपनियों के पास ही था, लेकिन वाजपेयी सरकार ने इसमें विदेशी निवेश के दरवाजे खोले। उन्होंने बीमा कंपनियों में विदेशी निवेश की बार को 26% तक किया था, जिसे 2015 में नरेंद्र मोदी सरकार ने बढ़ाकर 49% तक कर दिया।

गवर्नमेंट एम्प्लॉईज के लिए पेंशन की स्कीम को वाजपेयी सरकार ने ही खत्म किया था। लेकिन उन्होंने सांसद, विधायक और नेताओं को मिलने वाले पेंशन की सुविधा को चेंज नहीं किया था।

10. मिशन चंद्रयान की शुरुआत, आजादी के 56 साल बाद देश को मिशन चांद का सपना दिखाया

देश के 56 वें इंडिपेंडेंस डे यानी 15 अगस्त 2003 को लाल किले की प्राचीर से देश की जनता को संबोधित करते हुए अटल बिहारी वाजपेयी ने 'चंद्रयान 1' की घोषणा की थी। चंद्रयान 1 भारत का पहला चंद्र मिशन था। इसे 22 अक्टूबर 2008 को श्रीहरिकोटा से लॉन्च किया था।

वाजपेयी के दूरदर्शी सोच का ही नतीजा था कि भारत ने अपने स्पेस मिशन को चांद तक पहुंचाया।

Updated on:
25 Dec 2022 07:16 am
Published on:
25 Dec 2022 07:14 am
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