लखनऊ

अयोध्या विवादः सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले के साक्षी नहीं बन पाएंगे ये अहम वादकारी

आपको रूबरू करवाते हैं इस पाठ्यक्रम के मुख्य किरदारों से जिन्होंने दिन-रात तो एक किए, लेकिन अंतिम सुनवाई में वो इसके साक्षी नहीं बन पाएंगे.

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Dec 05, 2017
Ayodhya Leaders

अयोध्या. अयोध्या में विवादित ढांचे का मामला आज अपने आखिरी मुकाम पर है। दशकों तक चले आ रहे इस घमासान में कई वादकारी आए, लेकिन वो अपने अंतिम समय तक इस मामले को सुलझा नहीं पाए। आज 5 दिस्बर, 2017 को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष एक बार फिर मामले की सुनवाई शुरू कर दी गई है, लेकिन इसके मुख्य किरदार, जिन्होंने अपने जीवन के अहम वर्ष इस मामले को सुलझाने के लिए निकाल दिए, वो इस सुनवाई के गवाह नहीं बन पाएंगे।

आपको बता दें, कि सबसे पहली दफा 22-23 दिसंबर 1949 की रात रामलला के प्राकट्य के साथ विवादित ढांचे का विवाद स्थानीय अदालत में पहुंचा था। और अब आपको रूबरू करवाते हैं इस पाठ्यक्रम के मुख्य किरदारों से जिन्होंने दिन-रात तो एक किए, लेकिन अंतिम सुनवाई में वो इसके साक्षी नहीं बन पाएंगे-

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महंत परमहंस- वर्ष था 1949, जब पहली दफा रामलला के दर्शन एवं पूजन की इजाजत हेतु महंत रामचंद्रदास परमहंस ने स्थानीय अदालत में वाद दाखिल किया था। परमहंस का निधन 20 जुलाई 2003 को हुआ था।

Paramhans IMAGE CREDIT: Patrika

हाशिम अंसारी - जहां परमहंस ने मंदिर की पैरवी की तो उसी वक्त विवादित स्थल से महज डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर कोटिया मोहल्ला के रहने वाले हाशिम अंसारी ने कथित मस्जिद से रामलला की मूर्ति हटाए जाने की मांग उठाई। अंसारी ही ऐसे अकेले व्यक्ति थे जो न सिर्फ वर्ष 1949 में बाबरी मस्जिद में मूर्तियां रखे जाने के गवाह थे, बल्कि उन्होंने विवादित स्थल से जुड़े तमाम घटनाक्रम को भी ख़ुद देखा था। विवादित स्थल का ताला खोले जाने से लेकर छह दिसंबर 1992 में ढांचा गिराए जाने व 2010 सितंबर में विवादित ज़मीन को तीन हिस्सों में तकसीम करने का इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला भी इस क्रम में शामिल है। अंसारी ने जुलाई 2016 में अंतिम सांस ली थी।

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परमहंस-अंसारी ने पेश की दोस्ती की मिसाल-
परमहंस और अंसारी भले ही क्रमशः मंदिर और मस्जिद के पक्षकार थे, लेकिन इससे दोनों की दोस्ती में कभी कोई दरार नहीं आई थी। शुरुआत में जब मंदिर-मस्जिद की गूंज अयोध्या फैजाबाद में सुनाई देती थी तब इन दोनों की दोस्ती के किस्से भी सुर्खियां बटोरते थे। कहा जाता है कि वे पेशी पर हाज़िरी के लिए भी एक साथ एक ही रिक्शे पर सवार होकर अदालत जाया करते थे। उनकी दोस्ती की डोर तब भी अटूट रही, जब इस विवाद में विहिप ने प्रवेश किया और विवाद जनांदोलन के रूप में राष्ट्रव्यापी हो गया था।

1984 के दौर में विवाद अदालत की परिधि से इतर की ओर चल पड़ा था और परमहंस-हाशिम में साथ कचहरी जाने का क्रम भी टूट चुका था, लेकिन बावजूद इसके दोनों के बीच की दोस्ती अटूट बनी रही। दोस्ती की मिसाल के साथ वे मंदिर-मस्जिद विवाद के प्रतीक के रूप में भी स्थापित हुए। पर अफसोस जीतेजी वो इस मसले को सुलझा नहीं पाए।

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अशोक सिंघल- विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के नेता अशोक सिंघल को राम मंदिर आंदोलन का मुख्य शिल्पी बताया जाता है। सिंघल 1980 के दशक में मंदिर आंदोलन का पर्याय बन गए थे। 1985 में सिंघल ने राम जानकी रथ यात्रा निकाली और विवादित स्थल का ताला खोलने की मांग की थी। फैज़ाबाद की अदालत द्वारा ताला खोलने के आदेश दिए जाने के बाद सिंघल ने राम मंदिर निर्माण की मुहिम शुरू की थी। अफसोस सिंघल भी मामले की अंतिम सुनवाई के साक्षी नहीं बन पाएंगे। सिंघल का नवम्बर 2015 में देहांत हो चुका है।

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महंत भास्कर दास- इस विवाद में एक और महत्वपूर्ण चेहरा थे महंत भास्कर दास। जिन दिनों रामलला का प्राकट्य हुआ, भास्करदास विवादित स्थल से लगे रामचबूतरा के पुजारी थे और उस निर्मोही अखाड़ा के मौके पर मौजूद प्रतिनिधि थे, जिसने 1959 में विवादित स्थल पर मालिकाना हक के लिए अदालत में वाद दाखिल किया। वे अदालत की परिधि में मसले के हल के प्रतीक बने रहे। उतार-चढ़ाव के बीच वे मंदिर-मस्जिद विवाद के क्षितिज पर संयत रहे। इसी वर्ष अगस्त माह में उन्होंने अंतिम सांस ली।

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Updated on:
05 Dec 2017 10:54 pm
Published on:
05 Dec 2017 05:09 pm
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