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क्या था तत्कालीन CM अखिलेश यादव के समय में हुआ 2013 का वो ‘कांड’? मामला HC पहुंचा और फिर क्या हुआ

UP Politics: जानिए, तत्कालीन CM अखिलेश यादव के समय में हुआ 2013 का 'कांड' क्या था? इस बारे में मंत्री ओपी राजभर ने भी जिक्र किया है।

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लखनऊ

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Harshul Mehra

May 19, 2026

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सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव (Photo: IANS)

UP Politics: उत्तर प्रदेश सरकार में पंचायती राज मंत्री ओपी राजभर ने सोमवार को बड़ा बयान दिया। इस दौरान उन्होंने समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव पर जमकर निशाना साधा। ओपी राजभर ने अपने बयान में 2013 के एक कांड का जिक्र किया। आपको बताते हैं ये पूरा मामला आखिर है क्या?

पहले पढ़िए ओपी राजभर का बयान

ओपी राजभरने सोमवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' पर पोस्ट किया, "लगता है कि अखिलेश यादव का हाल एकदम ठीक नहीं है। हम उनसे सवाल पूछते हैं और वो साधु संतों को गोली देते हैं। हम अपनी बात का जवाब देते हैं और वो साधु-संतों को इसमें घसीटते हैं। आप और आपके लोग बात-बात पर साधु-संतों को गाली देना बंद करें। अभी तो कम दुर्गति हुई है, आगे आप लोगों को बड़ा श्राप भोगना पड़ेगा।"

2013 के कांड का किया जिक्र

मंत्री ओपी राजभर ने पोस्ट में आगे लिखा, "अखिलेश यादव, अब तो आप विपक्ष में हैं, ज्यादातर फ्री ही रहते होंगे। पुराने दिनों को याद कीजिए और 2013 के उस वाले कांड का पर्दाफाश कर दीजिए कि कैसे आपने उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष पद पर एक ऐसे व्यक्ति को बिठा दिया था, जो हत्या के प्रयास के मामले में आरोपी था। हैरान करने वाली बात ये है कि ये काम आपने 80 से अधिक योग्य उम्मीदवारों के साथ छल करके किया था। मगर, आपकी इस ढीठता भरी नियुक्ति को 14 अक्टूबर 2015 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की बेंच ने 'अवैध', 'मनमाना' और संविधान के अनुच्छेद 316 का उल्लंघन बता दिया था।"

क्या है 2013 वाला कांड?

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, साल 2013 में उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (Uttar Pradesh Public Service Commission) के अध्यक्ष पद पर अनिल कुमार यादव (Anil Kumar Yadav) की नियुक्ति को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हुआ था। उस समय राज्य में अखिलेश यादव ( Akhilesh Yadav) की सरकार थी। अप्रैल 2013 में अनिल कुमार यादव को यूपी लोक सेवा आयोग (UPPSC) का चेयरमैन बनाया गया था। बाद में उनकी नियुक्ति को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।

याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया था कि अनिल यादव पर पहले से कई आपराधिक मामले दर्ज थे, जिनमें आईपीसी की धारा 307 (हत्या के प्रयास) और गोण्डा एक्ट के मामले भी शामिल थे। जिसके बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अक्टूबर 2015 में उनकी नियुक्ति रद्द कर दी थी। कोर्ट ने कहा था कि नियुक्ति प्रक्रिया पर गंभीर सवाल हैं और अनिल यादव इस पद पर बने रहने के योग्य नहीं हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, अनिल यादव ने अदालत में कहा था कि जिन आपराधिक मामलों का जिक्र किया जा रहा है, उनमें उन्हें बरी किया जा चुका है। हालांकि हाईकोर्ट ने साफ किया कि वह आपराधिक आरोपों के मेरिट पर नहीं, बल्कि नियुक्ति प्रक्रिया और तथ्यों को छिपाने के आधार पर फैसला दे रहा है।