
Vinod Tawde UP Prabhari: उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा ने प्रदेश प्रभारी के रूप में विनोद तावड़े की नियुक्ति कर दी है। लेकिन तावड़े की नियुक्ति के साथ भाजपा की चुनावी तैयारी शुरू नहीं हो रही है। पिछले कई महीनों से पार्टी ने संगठन, बूथ नेटवर्क, सामाजिक समीकरण और सहयोगी दलों के स्तर पर जो काम शुरू किया है, अब उस पूरी प्रक्रिया को केंद्रीय चुनावी रणनीति से जोड़ने की जिम्मेदारी तावड़े के सामने होगी। भाजपा ने तावड़े को प्रदेश प्रभारी और जगदीश ईश्वरभाई पटेल को सह-प्रभारी बनाया है। नियुक्ति तत्काल प्रभाव से लागू है।
इस समय भाजपा की यूपी तैयारी को चार स्तरों पर देखा जा सकता है। पहला संगठन का पुनर्गठन, दूसरा बूथ नेटवर्क की जांच, तीसरा लोकसभा में चुनावी नुकसान वाले क्षेत्रों की पहचान और चौथा सामाजिक व गठबंधन समीकरणों की दोबारा जमावट। तावड़े का प्रवेश इसी तैयार ढांचे के बीच हुआ है।
लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा की यूपी रणनीति में बूथ स्तर की गतिविधियां बढ़ी हैं। पार्टी ने प्रदेश के बूथ नेटवर्क की वास्तविक स्थिति जानने के लिए संगठनात्मक ऑडिट शुरू किया। यूपी के 1918 मंडलों में बाहरी और अनुभवी कार्यकर्ताओं को भेजकर बूथ समितियों की सक्रियता और उनके सामाजिक प्रतिनिधित्व की जांच की गई।
फिर जुलाई में सभी 403 विधानसभा क्षेत्रों में बूथ स्तर का सम्मेलन कराया गया। पार्टी के करीब 1.77 लाख बूथों में से लगभग 18 हजार बूथ अध्यक्ष इस अभ्यास में मौजूद नहीं थे या उनकी संगठनात्मक सक्रियता पर सवाल सामने आए। पार्टी ने ऐसे बूथ पदाधिकारियों की अलग से समीक्षा की प्रक्रिया शुरू की। यानी तावड़े के आने से पहले ही भाजपा के सामने बूथ संगठन की एक वास्तविक स्थिति सामने आ चुकी है। अब चुनावी प्रबंधन का अगला चरण यह होगा कि जहां संगठन कागज पर मौजूद है, वहां उसकी चुनावी सक्रियता कितनी है और जहां कमी मिली है, उसे चुनाव से पहले कैसे पूरा किया जाए।
भाजपा की मौजूदा तैयारी में विधानसभा क्षेत्रवार अंतर पर जोर है। पार्टी ने पहले ही चुनौतीपूर्ण विधानसभा क्षेत्रों के लिए अलग बूथ केंद्रित रणनीति पर काम शुरू किया है। इसमें स्थानीय मुद्दों को बूथ स्तर के राजनीतिक संवाद से जोड़ने की तैयारी है। पिछले लोकसभा चुनाव के विधानसभावार आंकड़े भी इसी दिशा में महत्वपूर्ण हैं। कुल 403 विधानसभा क्षेत्रों में लोकसभा चुनाव के दौरान विपक्षी दल 224 क्षेत्रों में आगे रहे थे, जबकि एनडीए घटक 174 में बढ़त पर थे। भाजपा अकेले 162 विधानसभा क्षेत्रों में आगे रही। यह विधानसभा चुनाव का परिणाम नहीं है, लेकिन 2027 के लिए सीटवार राजनीतिक स्थिति समझने का महत्वपूर्ण आधार है।
पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 255 विधानसभा सीटें जीती थीं और उसे 41.29 प्रतिशत वोट मिले थे। सपा 111 सीटों और 32.06 प्रतिशत वोट के साथ दूसरे स्थान पर थी। इसलिए 2027 की तैयारी में भाजपा के सामने केवल 255 जीती हुई सीटों को बचाने का सवाल नहीं है। लोकसभा चुनाव के दौरान जिन विधानसभा क्षेत्रों में विपक्ष आगे निकला, उनमें से कितने क्षेत्रों में विधानसभा चुनाव तक स्थिति बदली जा सकती है।
तावड़े के आने से पहले प्रदेश भाजपा ने अपना संगठनात्मक ढांचा भी बदला है। जून में प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने 46 पदाधिकारियों की नई टीम घोषित की थी। इसमें 19 उपाध्यक्ष, आठ महामंत्री और 19 मंत्री शामिल हैं। यह टीम 2027 विधानसभा चुनाव की संगठनात्मक तैयारियों में काम करेगी। नई टीम में क्षेत्रीय और सामाजिक प्रतिनिधित्व के साथ नए चेहरों को भी जगह दी गई है। इसका मतलब यह है कि प्रदेश स्तर पर संगठन का पुनर्गठन पहले ही किया जा चुका है। अब केंद्रीय स्तर से आए प्रभारी की भूमिका इस संगठन को चुनावी लक्ष्य के हिसाब से सक्रिय करने की होगी। अर्थात एक तरफ पंकज चौधरी के नेतृत्व में प्रदेश संगठन, दूसरी तरफ संगठन महामंत्री धर्मपाल सिंह की जमीनी मशीनरी और अब इनके ऊपर केंद्रीय स्तर का राजनीतिक समन्वय, यह तीन स्तर वाली संरचना 2027 की तैयारी का आधार बनेगी।
भाजपा की बूथ तैयारी केवल पदाधिकारियों की मौजूदगी तक सीमित नहीं है। पार्टी ने बूथ समितियों को चुनावी संचार की स्थानीय इकाई के रूप में इस्तेमाल करने की योजना पर भी काम शुरू किया है। प्रदेश में करीब 1.6 लाख बूथ समितियों के जरिए स्थानीय मुद्दों और सरकार की योजनाओं को मतदाताओं तक ले जाने की तैयारी की जा रही है। इसका राजनीतिक महत्व यह है कि अबकी बार चुनाव राज्यव्यापी नैरेटिव के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर भी लड़ा जाएगा।
एक ही सरकार के प्रति अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों में मतदाता की प्रतिक्रिया अलग हो सकती है। इसी वजह से भाजपा की तैयारी में बूथ और विधानसभा क्षेत्र का फीडबैक महत्वपूर्ण होता जा रहा है। तावड़े के सामने इसी फीडबैक को प्रदेश और केंद्रीय नेतृत्व की चुनावी रणनीति से जोड़ने की जिम्मेदारी होगी।
भाजपा की संगठनात्मक तैयारी के साथ सामाजिक समीकरण भी उसके एजेंडे में है। पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा के मुकाबले सपा को मिली बढ़त ने विपक्ष के सामाजिक गठबंधन को राजनीतिक चर्चा के केंद्र में ला दिया। अब भाजपा के लिए गैर-यादव ओबीसी, दलित और अन्य सामाजिक समूहों के बीच अपनी पकड़ बनाए रखना महत्वपूर्ण होगा। प्रदेश भाजपा की नई टीम में सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन पर जोर दिया गया है। संगठन में विभिन्न क्षेत्रों और सामाजिक समूहों के नेताओं को शामिल किया गया है। अब इसी प्रतिनिधित्व को चुनावी समर्थन में बदलने की चुनौती संगठन के सामने होगी। तावड़े की भूमिका यहां केवल सामाजिक समीकरण तय करने की नहीं, बल्कि किस क्षेत्र में कौन सा सामाजिक समीकरण वास्तविक चुनावी असर डाल रहा है, इसकी राजनीतिक निगरानी की होगी।
2024 के बाद सपा ने पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक सामाजिक समूहों के गठजोड़ को अपनी चुनावी रणनीति का प्रमुख आधार बनाया है। भाजपा के लिए चुनौती यह होगी कि लोकसभा चुनाव में बने इस सामाजिक समीकरण का असर विधानसभा चुनाव में कितना कायम रहता है। लोकसभा और विधानसभा चुनाव में मतदाता के मुद्दे और उम्मीदवार दोनों बदलते हैं। ऐसे में 2024 के वोट पैटर्न को सीधे 2027 का परिणाम मानकर नहीं चला जा सकता। भाजपा इसी वजह से बूथ स्तर पर सामाजिक स्थिति और स्थानीय राजनीतिक समीकरणों की जानकारी जुटा रही है।
एनडीए के सहयोगी दलों के साथ तालमेल भी भाजपा की रणनीति का हिस्सा है। जुलाई में भाजपा अध्यक्ष नितिन नबीन ने अपना दल (एस), राष्ट्रीय लोक दल, निषाद पार्टी और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी सहित सहयोगी दलों के नेताओं के साथ बैठक की थी। सहयोगी दलों ने संगठनात्मक समन्वय बेहतर करने और अपने पारंपरिक प्रभाव क्षेत्रों से बाहर भी सीटों पर दावेदारी की बात रखी थी। नबीन ने सहयोगियों से तत्काल विशिष्ट सीटों की मांग पर जोर देने के बजाय उन क्षेत्रों पर ध्यान देने को कहा था जहां एनडीए को 2022 में नुकसान हुआ था। भाजपा और सहयोगियों के बीच केवल सीटों का बंटवारा नहीं, बल्कि किस सीट पर किस दल का संगठन और सामाजिक आधार चुनावी रूप से ज्यादा प्रभावी है, यह भी महत्वपूर्ण होगा।
तावड़े की नियुक्ति से पहले भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने उत्तर प्रदेश के सांसदों के साथ अलग-अलग बैठकें शुरू की थीं। इन बैठकों में जातीय समीकरण और कार्यकर्ताओं के मनोबल सहित जमीनी राजनीतिक स्थिति पर फीडबैक लिया गया। इस प्रक्रिया का अगला हिस्सा प्रदेश प्रभारी की नियुक्ति है।
अब दिल्ली से लिया जा रहा राजनीतिक फीडबैक, प्रदेश संगठन की रिपोर्ट और बूथ स्तर पर जुटाई जा रही जानकारी, इन तीनों को एक साथ चुनावी रणनीति में शामिल करना होगा। यही कारण है कि तावड़े की नियुक्ति को अलग-थलग संगठनात्मक फैसला नहीं, बल्कि भाजपा की यूपी चुनावी तैयारी के क्रम में अगला कदम माना जा रहा है।
पहला: लोकसभा चुनाव में कमजोर हुए विधानसभा क्षेत्रों की अलग-अलग श्रेणियां तैयार करना।
दूसरा: बूथ समितियों के ऑडिट में सामने आई कमियों को चुनाव से पहले दूर करना।
तीसरा: गैर-यादव ओबीसी और दलित सहित उन सामाजिक समूहों की स्थिति की विधानसभा क्षेत्रवार समीक्षा करना, जिनके वोट में 2024 में बदलाव दिखाई दिया।
चौथा: सरकार, प्रदेश संगठन, स्थानीय नेताओं और बूथ कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय को चुनावी लक्ष्य से जोड़ना।
पांचवां: एनडीए सहयोगियों के साथ सीट बंटवारे से पहले क्षेत्रवार संगठन और वोट ट्रांसफर की स्थिति को समझना।
भाजपा की मौजूदा गतिविधियों को एक साथ देखें तो पार्टी की चुनावी तैयारी 2022 से 2027 की सीधी पुनरावृत्ति के बजाय 2024 के परिणाम से पीछे की ओर जाकर कमजोर कड़ियां तलाशने पर केंद्रित है। पिछले लोकसभा चुनाव में जहां भाजपा का प्रदर्शन कमजोर हुआ, वहां बूथ संगठन की जांच हो रही है। जहां सामाजिक समीकरण बदले, वहां संगठन में प्रतिनिधित्व बढ़ाया गया है। जहां सहयोगी दलों की भूमिका है, वहां चुनाव से पहले तालमेल की बातचीत शुरू हो चुकी है। और जहां केंद्रीय नेतृत्व को जमीनी स्थिति जाननी है, वहां सांसदों से सीधे फीडबैक लिया जा रहा है। अब इन सभी गतिविधियों के ऊपर उत्तर प्रदेश के प्रभारी के रूप में तावड़े की भूमिका होगी।