
उत्तर प्रदेश के आगामी चुनावी परिदृश्य पर बात करते हुए सुप्रिया श्रीनेत ने दावा किया कि इस बार मुकाबला सीधे प्रदेश की जनता और भाजपा के बीच है। उन्होंने विश्वास जताते हुए कहा कि जनता ने मन बना लिया है और इस बार उत्तर प्रदेश में भाजपा की विदाई तय है।
सुप्रिया श्रीनेत ने कहा कि जब राहुल गांधी ने जन आंदोलन चलाया था, तभी उन्होंने देश में सामाजिक-आर्थिक और जातिगत सर्वे की मांग उठाई थी। उन्होंने आरोप लगाया कि मौजूदा सरकार जाति जनगणना के पीछे एक सुनियोजित षड्यंत्र रच रही है, जो पिछड़े, अति-पिछड़े और वंचित वर्गों के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि सर्वे में पूछे जा रहे ओपन-एंडेड सवाल की वजह से एक ही जाति को अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न नामों से जाना जाता है, जिससे सटीक आंकड़े जुटाना मुश्किल हो जाएगा। उन्होंने मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी द्वारा प्रधानमंत्री मोदी को लिखे गए पत्र का हवाला देते हुए कहा कि सरकार को इस पर गंभीरता से ध्यान देना चाहिए, ताकि सर्वे से पिछड़ों, अति-पिछड़ों, आदिवासियों और दलितों को वास्तविक लाभ मिल सके।
अभिनेत्री से सांसद बनीं कंगना रनौत की हालिया टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए सुप्रिया श्रीनेत ने मंगलवार को समाचार एजेंसी आईएएनएस से बातचीत में कहा कि जनता द्वारा चुने जाने के बाद एक सांसद को देश के अहम मुद्दों पर बात करनी चाहिए, न कि युवाओं को 'जेनरेशन गटर' जैसे शब्दों से संबोधित करना चाहिए। उन्होंने कंगना पर किसानों को लेकर की गई पूर्व टिप्पणियों का भी जिक्र किया।
श्रीनेत ने कहा कि अब कंगना को अन्य अभिनेत्रियों के पहनावे पर ऐतराज है, जिसे उन्होंने घोर पितृसत्तात्मक सोच करार दिया। उन्होंने कहा कि किसी महिला के पहनावे, उसकी बातचीत, उसके रिश्तों और उसकी जीवनशैली पर टिप्पणी करना पितृसत्ता की मानसिकता को ही दर्शाता है। उन्होंने अफसोस जताया कि खुद फिल्म इंडस्ट्री और राजनीति में सशक्त पहचान बनाने वाली कंगना रनौत ही अन्य अभिनेत्रियों पर ऐसी टिप्पणियां कर रही हैं, जबकि राहुल गांधी लगातार इसी सोच को खत्म करने की बात करते आए हैं।
शिक्षा व्यवस्था पर बोलते हुए सुप्रिया श्रीनेत ने कहा कि धार्मिक आस्था का अपना महत्व है और उस पर खर्च होना चाहिए, लेकिन इसके साथ ही सरकारी स्कूलों की बदहाल स्थिति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने बताया कि देश में करीब 1.5 लाख सरकारी स्कूलों में लड़कियों के लिए शौचालय तक नहीं हैं, जबकि लगभग 90 हजार स्कूल ऐसे हैं जो एक ही कमरे में महज एक शिक्षक के भरोसे चलाए जा रहे हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि जब स्कूल भवन जर्जर हो रहे हैं और बच्चे खुले आसमान के नीचे पढ़ने को मजबूर हैं, तो ऐसे में देश कैसे आगे बढ़ेगा।
उन्होंने चेताया कि आने वाले समय में जेन-अल्फा पीढ़ी और भी तीखे सवाल पूछेगी—स्कूलों में पंखे न होने, खेल सुविधाओं की कमी और सड़कों की बदहाली को लेकर। उन्होंने सरकारों से पूछा कि क्या शिक्षा और स्वास्थ्य उनकी प्राथमिकता सूची में नहीं हैं।