उत्तर प्रदेश पुलिस की गलती योगी आदित्यनाथ सरकार पर भारी पड़ गई। पुलिस की एक गलती की वजह से इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार पर जुर्माना लगा दिया।
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने उत्तर प्रदेश पुलिस की एक गलती की वजह से योगी आदित्यनाथ सरकार पर बड़ा जुर्माना लगाया है। UP पुलिस द्वारा गिरफ्तारी का कारण नहीं बताने पर हाई कोर्ट ने योगी सरकार पर 10 लाख रुपए का जुर्माना लगाया है। इसके साथ ही पीड़ित को तुरंत रिहा करने का आदेश दिया है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने पुलिस द्वारा गिरफ्तारी का कारण न बताकर गिरफ्तार करने को गैरकानूनी करार दिया है। जेल में बंद उन्नाव के रहने वाले मुदित की याचिका पर हाई कोर्ट ने यह आदेश दिया है। कोर्ट ने आरोपी को तुरंत रिहा करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को स्वीकार कर लिया है।
दरअसल, पुलिस ने लिखित आधार दिखाए बिना मुदित को गिरफ्तार किया था। जांच के दौरान कोर्ट ने पाया कि पुलिस ने गिरफ्तारी के समय याची को कोई दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराया था। पीड़ित की याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने 10 लाख रुपए का जुर्माना लगाया है। इसके साथ ही कोर्ट ने गिरफ्तारी के समय आधार न दिखाने को सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन माना है।
हाई कोर्ट ने 10 लाख रुपए का जुर्माना भरने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार को 4 हफ्तों का समय दिया है। कोर्ट के आदेश पर यह रकम 4 हफ्तों में याचिकाकर्ता को मुहैया कराएगी। कोर्ट ने इस मामले में दोषी अधिकारियों से वसूली करने के लिए सरकार को छूट दी है। जस्टिस प्रमोद कुमार श्रीवास्तव और जस्टिस अब्दुल मोईन की पीठ ने उन्नाव में गिरफ्तार हुए मनोज कुमार के बेटे मुदित की याचिका पर यह फैसला सुनाया है।
मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि अफसरों के लिए यह जरूरी है कि गिरफ्तार करते समय उसके आधार लिखित में दिए जाने चाहिए। बता दें कि 27 जनवरी को मनोज कुमार को असीवन थाना पुलिस ने एक मुकदमे में गिरफ्तार किया था। पुलिस द्वारा गिरफ्तारी के कारण की जगह सिर्फ FIR नंबर दर्ज किया गया था। इसके बाद 28 जनवरी को मजिस्ट्रेट ने रिमांड मंजूर की थी।
याचिकाकर्ता द्वारा अपनी हिरासत और गिरफ्तारी को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। याची ने कहा कि उसे गिरफ्तार करते हुए कारण लिखित में नहीं बताए गए हैं, जो कि एक जरूरी संविधानिक सुरक्षा का उल्लंघन है। इस पर हाईकोर्ट ने याचिका को स्वीकार करते हुए रिमांड आदेश को रद्द किया। कोर्ट ने कहा कि अगर व्यक्ति किसी अलग मामले में वांछित नहीं है तो उसे तुरंत रिहा किया जाए।