लखनऊ

Recall: जब आजाद भारत में पुलिस के खिलाफ उतारनी पड़ी थी सेना, इंदिरा गांधी को हटाना पड़ा था अपना सीएम

1973 में लखनऊ विश्वविद्यालय परिसर को पीएसी से खाली कराए जाने और वहां सेना को बुलाए जाने के बीच सुरक्षा के लिए किसी को रखा ही नहीं गया। इस दौरान प्रदर्शनकारियों ने परिसर को खाक कर दिया।

3 min read
Jan 22, 2026
यह एआई से बनाई गई प्रतीकात्मक तस्वीर है।

उत्तर प्रदेश के सातवें मुख्यमंत्री पंडित कमलापति त्रिपाठी इंदिरा गांधी के बड़े वफादार थे। 1969 में जब कांग्रेस टूटी तो वह इंदिरा के नेतृत्व वाली कांग्रेस (आर) में ही रहे। इसका शिला उन्हें मुख्यमंत्री के पद के रूप में मिला। त्रिभुवन नारायण सिंह के इस्तीफे के बाद 4 अप्रैल, 1971 को वह यूपी के सीएम बने। करीब दो साल बाद 12 जून, 1973 को उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। परिस्थिति ऐसी बनी कि इंदिरा गांधी ने ही उनका इस्तीफा लिया।

उनके इस्तीफे की वजह एक बड़ा पुलिस विद्रोह बना। प्रांतीय सशस्त्र बल (पीएसी) में हुए इस विद्रोह में करीब तीन दर्जन सुरक्षाकर्मी मारे गए थे। स्थिति को काबू करने के लिए सेना बुलानी पड़ी थी। विद्रोह से निपटने में नाकामी के चलते त्रिपाठी सरकार हर ओर से हमले झेल रही थी। मुख्यमंत्री के इस्तीफे की मांग लगातार तेज हो रही थी। इसलिए अंत में इंदिरा गांधी को उनका इस्तीफा लेना पड़ा और राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। 1974 में राष्ट्रपति शासन रहते हुए ही राज्य में चुनाव हुए।

त्रिपाठी पर जातिवाद करने, मुस्लिम विरोधी होने और जनता के पैसे की बरबादी के भी आरोप लगे थे। उन्होंने अपने गृह नगर वाराणसी में सर्किट हाउस होते हुए भी नया सर्किट हाउस बनवाया, जिसके लिए उनकी खूब आलोचना हुई। विपक्षी नेता चौधरी चरण सिंह ने फीरोजाबाद और वाराणसी में दंगों को काबू करने में नाकाम रहने का आरोप लगाते हुए उन पर निशाना साधा। वाराणसी में हुए दंगों के संदर्भ में 1966 बैच के आईपीएस अजय राज शर्मा ने अपने संस्मरण में लिखा है कि इंदिरा गांधी ने मुस्लिमों पर ज्यादती होने की बात कहते हुए डीएम और एसपी को हटाने के लिए कहा था, लेकिन सीएम ने अफसरों (जिनमें शर्मा भी शामिल थे) का पूरा बचाव किया और नहीं हटाया।

लखनऊ विश्वविद्यालय परिसर में पीएसी जवानों ने की बगावत

20 मई की रात को लखनऊ विश्वविद्यालय परिसर में तैनात पीएसी के जवानों ने विद्रोह का बिगुल फूंक दिया। जवानों ने अपने हथियार डाल कर छात्रों के साथ प्रदर्शन शुरू कर दिया। रात करीब 10 बजे पीएसी के जवानों और छात्रों ने मिल कर जुलूस निकाला। इसमें "छात्र-पीएसी एकता जिंदाबाद" और "छात्रों पर अत्याचार बंद करो" जैसे नारे लगाए गए। PAC के कुछ जवानों ने जुलूस का विरोध करने वाले अधिकारियों की पिटाई भी कर दी।

विश्वविद्यालय परिसर से पीएसी को वापस बुलाने का आदेश हुआ। 21 मई की सुबह सुबह 6:30 बजे तक परिसर को पीएसी से पूरी तरह खाली करा लिया गया। वहां पीएसी की जगह सेना को तैनात करने का फैसला हुआ, लेकिन सेना को लाने से पहले पीएसी जवानों को पूरी तरह हटा दिया गया। इस बीच करीब दो घंटे वहां सुरक्षा का कोई इंतजाम नहीं था। ऐसा संभवतः इस डर से किया गया था कि पीएसी और सेना के जवानों का आमना-सामना होने पर कहीं टकराव न हो जाए।

बिना रोक-टोक तांडव करते रहे प्रदर्शनकारी

21 मई की सुबह सबसे पहले कुछ लड़के ताला तोड़ कर परीक्षा केंद्र में घुस गए। उन्होंने कागज के बंडल में आग लगा दिए। इसके बाद कई और लड़के आ गए। उन्होंने फर्नीचर इकट्ठा करके उसमें आग लगा दी। आगजनी में सैकड़ों की संख्या में छात्रों के अलावा कई बाहरी लोग भी शामिल थे। वे एक के बाद एक दफ्तर और बिल्डिंग में आग लगाते चले गए। सुबह 7.30 बजे तक कैंपस में हर तरफ आग और धुआं ही था। कैंपस में पुलिस व्यवस्था का जिम्मा सर्कल ऑफिसर इनाम अली के पास था। उन्हें छात्रों ने बीती रात में ही खदेड़ कर परिसर से बाहर कर दिया था।

सुबह 6:30 से 7:30 बजे के बीच परिसर में छात्र आग का तांडव करते रहे। उन्हें रोकने वाला कोई नहीं था। उन्होंने पेट्रोल और केरोसिन छिड़ककर आर्ट्स फैकल्टी, प्रॉक्टर कार्यालय, कैशियर कार्यालय और रजिस्ट्रार ब्लॉक सहित कई इमारतों को आग के हवाले कर दिया। आग इतनी भीषण थी कि गोमती नदी से पानी पंप करने के बावजूद धुआं पूरे दिन परिसर में छाया रहा। विश्वविद्यालय के लगभग सभी महत्वपूर्ण रिकॉर्ड जलकर राख हो गए। कुलपति के अनुसार करीब 35 लाख रुपये का नुकसान हुआ।

सुबह करीब 8:15 बजे सेना की दो कंपनियां परिसर में पहुंचीं। तब जाकर स्थिति थोड़ी काबू में की जा सकी। उधर,
मुख्यमंत्री कमलापति त्रिपाठी ने शाम 5.30 बजे कैबिनेट की आपात बैठक बुलाई। उन्होंने कहा कि पीएसी जवान छात्रों के साथ मिल गए थे। उन्होंने मीडिया से यह भी कहा कि इसे "विद्रोह" कहना सही नहीं होगा और आगे जो भी कार्रवाई की जाएगी, उसके बारे में आपको जानकारी दी जाएगी। मानने से इनकार किया। विश्वविद्यालय को अनिश्चित काल के लिए बंद कर दिया गया।

22 मई को रामनगर, कानपुर और तीन अन्य जगहों पर पीएसी और सेना के जवान आमने-सामने आ गए थे। इन भिड़ंत में 40 मौतें हुई थीं और करीब 80 लोग घायल हुए थे। 300 से ज्यादा पीएसी जवान गिरफ्तार किए गए थे।

क्यों बागी हुए थे पीएसी जवान?

उत्तर प्रदेश के कई शहरों में भड़के इस विद्रोह की चिनगारी लंबे समय से सुलग रही थी। पीएसी जवानों का कहना था कि उनसे बहुत कम वेतन में ज्यादा काम लिया जाता है, कोई सुविधा नहीं दी जाती है, अफसर कपड़े धोना, बर्तन साफ करना जैसे निजी काम करवाते हैं और यूनियन बनाने पर पाबंदी है।

Updated on:
22 Jan 2026 11:23 am
Published on:
22 Jan 2026 11:22 am
Also Read
View All

अगली खबर