- महेंद्र प्रताप सिंह
लखनऊ.
समाजवादी पार्टी विचारों के द्वंद का शिकार हो गई है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव युवा हैं। उनकी सोच आधुनिक है। मुलायम सिंह वृद्ध हो चुके हैं। वे पार्टी को 2007 के यादव-मुस्लिम गठजोड़ पर लठ्ठधारी मॉडल से हांकना चाहते हैं। अखिलेश विदेश में पढ़े-लिखे हैं। वे बदलाव को महसूस कर रहे हैं। अमरीकी चुनावों की बात हो फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चुनाव अभियान। उन्होंने देखा है कि कैसे चुनावों का कारपोरेटीकरण हो चुका है। इवेंट मैनेजमेंट कंपनियां नेता की ब्रांड इमेज बनाती हैं और धूम धड़ाके के साथ प्रचार कर चुनाव जीतती हैं। इसीलिए सीएम अखिलेश अपनी ब्रांड पर जोर दे रहे हैं। वे विकास के ब्रांड पर चुनाव जीतना चाहते हैं तो मुलायम का मानना है कि उम्मीदवार की छवि और सामाजिक भूमिका का चुनाव पर कोई असर नहीं पड़ता। शायद यही वजह है उन्होंने वे बेटे के बेहतर कामकाज को घूरे पर डाल दिया है। और लठ्ठधारी,मूंछधारी अतीक अहमद और शिगबतुल्लाह अंसारी जैसों को तरजीह दे रहे हैं। अखिलेश को यही नागवार लग रहा है। पिता-पुत्र में लड़ाई की एक बड़ी वजह यही है। आइए जानते हैं आखिर दोनों की विचारधारा किसके पुष्पित और पल्लवित हो रही है और उनकी सोच कहां आड़े आ रही है।
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के सिपहसालार यादव परिवार के तथाकथित पढ़े लिखे उनके चाचा और पार्टी महासचिव राम गोपाल यादव हैं। इन्हें पार्टी का थिंक टैंक भी माना जाता है। मंत्रिमंडल में उनके सहयोगी आईआईएम में पढ़े-लिखे अभिषेक मिश्र, अखिलेश के चचेरे भाई सांसद धर्मेद्र यादव सरीखे लोग हैं। चुनावी प्रबंधन के लिए अखिलेश ने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर स्टीव जार्डिंग की सेवाएं लीं तो इलेक्शन कंपेन के लिए पढ़े-लिखे युवाओं की एक टीम स्विटरजरलैंड भेजी।
अखिलेश यादव अपने कामकाज और इमेज का इस्तेमाल कर खुद को विकासोन्मुखी और आधुनिक पार्टी के नेता के रूप में पेश करना चाहते हैं। इसीलिए उन्होंने भाजपा के होर्डिग्स वार के मुकाबले अपनी खुद की बड़ी-बड़ी तस्वीरों वाली यूपी के विकास को दर्शाती होर्डिग्स बनवाई हैं। इसकी तैयारी वे आज से नहीं छह-सात माह पहले से कर रहे थे।
समाजवादी पार्टी के मुखिया के सिपहसालारों की टीम पुरातन विचारधारा वाली है। उनके सबसे बड़े सिपहसालार अमर सिंह हैं। जिनकी छवि घर तोडऩे वाली रही है। अनुज शिवपाल का अपना कोई विजन नहीं है। वे मुलायम के अंधभक्त हैं। वही करते हैं जितना मुलायम बोलते हैं। इसके अलावा बेनी प्रसाद वर्मा, किरणमय नंदा और नारद राय जैसे लोगों की टीम है। इनमें से अधिकतर का जमीनी वजूद न के बराबर है। ये पुराने तरीके से ही पार्टी चलाना चाहते हैं।
मुलायम सिंह यादव को लगता है कि विकास और इमेज की बातें सिर्फ शहरी मतदाताओं पर ही असर डालती हैं। गांव लोग आज भी अपनी जाति-बिरादरी का मुंह देखकर वोट डालते हैं। बूथ पर जिस पार्टी की हनक दिखती है वही वोट बटोरता है। इसलिए मुलायम सिंह यादव को अतीक अहमद और अमनमणि त्रिपाठी जैसे लोग सुहाते हैं जिनकी लाठी में दम है। आपराधिक छवि के नेताओं के सहारे मुलायम कई चुनावों में हारी हुई सीटें भी जीत चुके हैं। इसलिए वे इनका साथ नहीं छोडऩा चाहते। मुस्लिम-यादव के गठजोड़ के सहारे उनकी राजनीति की बेल बढ़ी है। इसलिए इससे भी उनका मोहभंग नहीं हो रहा। फिलहाल, बाप-बेटे दोनों पंचर साइकिल पर सवार हैं। देखना होगा यह साइकिल उन्हें कितनी दूर ले जाएगी।