- प्रेक्टिस मैच की तरह है यह उपचुनाव- गठबंधन के रास्ते नहीं किए बंद- दलित वोट बैंक की वफादारी को परखना चाहती हैं मायावती
लखनऊ. बहुजन समाज पार्टी सुप्रीमोे मायावती के अकेले विधानसभा उपचुनाव लड़ने की घोषणा ने मौकापरस्ती की परिभाषा को चरितार्थ किया है। प्रेस कांफ्रेस कर न सिर्फ उन्होंने गठबंधन तोड़ने के संकेत दिए बल्कि चुनाव अकेले लड़ने के लिए उन्होंने सपा को ही जिम्मेदार ठहरा दिया। साइकिल पर सवार होकर शुन्य से 10 सीटों तक पहुंचने वाली मायावती से लोग इसी बात की उम्मीद कर रहे थे। 1993 में सपा से गठबंधन की बात हो हो या फिर कांग्रेस के साथ 1996 में और या फिर सपा से 2019 चुनाव में। मायावती ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वह अपनी शर्तों पर चलने वाली राजनेता हैं। वहीं राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि मायावती ने बड़ी की सावधानी व सोच समझकर अकेले उपचुनाव लड़ने का फैसला लिया है। दरअसल 402 सीटों वाली यूपी में केवल 11 सीटों पर ही उपचुनाव होना है, जिससे सत्ता पर काबिज भाजपा पर इससे ज्यादा कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है। वहीं मायावती इस उपचुनाव को प्रेक्टिस मैच की तरह देख रही है, जिसमें वह अपनी राजनीतिक क्षमता व पार्टी के वोट बैंक की उनके प्रति वफादारी को परखना चाहती हैं।
प्रेक्टिस मैच की तरह है यह उपचुनाव-
11 सीटों पर चुनाव को मायावती एक तरह के वर्ल्ड कप से पूर्व प्रेक्टिस मैच की तरह खेलना चाहती। जिसमें वह बसपा के सिपाहियों की क्षमता को जांचना व परखना चाहेंगी। यदि वो इसमें हार भी जाती हैं, तब भी 2022 से पहले उनका चुनावी दृष्टिकोण साफ हो जाएगा। इसके बाद मुमकिन है कि वह सपा से दोबारा गठबंधन भी कर लें। जिसके लिए उन्होंने अखिलेश से अपने व्यक्तिगत रिश्ते की डोर को कमजोर न होने के लिए एक दांव भी चला है।
गठबंधन के रास्ते नहीं किए बंद-
अकेले उपचुनाव लड़कर मायावती ने तो यह साफ कर दिया कि बसपा का सपा से गठबंधन तो फिलहाल नहीं रहा है। लेकिन अखिलेश से रिश्ते जारी रखने की बात कहकर उन्होंने इस संभावना को जिंदा रखा है कि चुनाव के बाद वह सपा से दोबारा गठबंधन कर सकती हैं। लेकिन उपचुनाव के बाद क्या होगा, यह तो भविष्य में ही प्रतिचारित होगा।
दलित वोट बैंक की मजबूती को परखना चाहती हैं मायावती-
मायावती ने जैसा की अपने बयान में भी कहा है कि वह सपा मुखिया को अपने यादव-मुस्लिम वोट बैंट को एक जुट करने का मौका देना चाहती हैं। लेकिन इस बयान के पीछे उनके अपने वोट बैंक के बिखरने का भी डर है। इस उपचुनाव में वह दलित वोट बैंक की उनके प्रति वफादारी को परखना चाहती हैं।
चट भी मेरी पट भी मेरी-
अकेले लड़ने के पीछे उन्होंने यादव वोट के ट्रांसफर न होने को जिम्मोदार ठहराया। इस लिहाज से तो इस गठबंधन से सबसे ज्यादा नुकसान तो सपा का ही हुआ है जिसे पहले की तरह सिर्फ ५ सीटें मिली वह भी कन्नौज, फिरोजाबाद, बदायूं जैसी अपनी पारंपरिक सीटें खोने के बाद। वहीं मायावती तो शुन्य से 10 सीटों तक पहुंची हैं। तो क्या यह मान लिया जाए कि मायावती का दलित वोटर सपा की हार की वजह है? सपा महासचिव रामगोपाल यादव ने तो इस पर सवाल भी उठाते हुए कहा कि यदि यादव वोट ट्रांसफर न होता तो मायावती को इतने सीटें न मिलती। वहीं सपाई इस पर कह रहे हैं उल्टा चोर कोतवाल को डांटे।