- कौशलेन्द्र बिक्रम सिंह
लखनऊ।
सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने बुधवार को उत्तर प्रदेश में अागमी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर 325 प्रत्याशियों की सूची जारी कर गठबंधन के साथ-साथ सपा में जारी टिकट विवाद का पटापेक्ष कर दिया। आइए एक-एक कर जानने की कोशिश करते हैं कि नेता जी के इस अप्रत्याशित कदम की क्या वजह थी...
पिछले दिनों अखिलेश यादव ने अपने पसंद के 403 प्रत्याशियों की सूची सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव को सौंपी थी। इससे पहले सपा प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल यादव अपनी एक लिस्ट जारी कर चुके थे। मीडिया में सपा के महासचिव प्रो. रामगोपाल यादव ने भी कहा था कि टिकट पर आखिरी मुहर नेता जी ही लगाएंगे, अभी किसी का टिकट फाइनल नहीं। शिवपाल यादव ने टिप्पणी की थी कि प्रदेश अध्यक्ष मैं हूं जिसे चाहूंगा टिकट दूंगा, कोई अनुशासनहीनता बर्दाश्त नहीं होगी। उपरोक्त सभी बातों पर एक साथ पूर्ण विराम लगाने के लिए नेता जी ने 325 प्रत्याशियों के नाम की सूची ही नहीं जारी की बल्कि यह भी कह दिया कि अब इन नामों पर कोई बातचीत नहीं होगी।
अखिलेश के बढ़ते कद से परेशानी
कहने को लोग भले ही इसे शिवपाल यादव और अखिलेश यादव के बीच सत्ता संघर्ष मान रहे हों लेकिन कहीं न कहीं मुलायम सिंह यादव को भी पार्टी में अपनी अहमियत दिखानी थी। मुलायम नहीं चाहते कि पार्टी पर उनकी पकड़ कमजोर हो। पहली बार जब यादव परिवार में 'गृहयुद्ध' छिड़ा था तो मुलायम ने अखिलेश की सुनी थी अब टिकट बंटवारे में वे शिवपाल की सुनते नजर आ रहे हैं।
जनता में मजबूत सपा की छवि दिखाना
सपा-कांग्रेस का गठबंधन ऐसा मुद्दा है जिस पर इन दो पार्टियों ने कम विरोधियों ने ज्यादा बात की होगी। सपा सुप्रीमो को भी यह बात कहीं न कहीं लग रही होगी कि जनता में कमजोर सपा की छवि जा रही है। विरोधी भी लगातार गठबंधन को लेकर यही बात दोहरा रहे थे कि 'सपा को हार का डर' सताने लगा है। शायद यही वजह रही होगी कि सपा सुप्रीमो ने ऐन वक्त पर गठबंधन से हाथ खींच लिए और अपने प्रत्याशियों की लिस्ट जारी कर दी।
मुलायम सिंह को इस बात का भी डर सता रहा होगा कि अगर जनता में कमजोर सपा की छवि चली गई तो उसके परंपरागत मुस्लिम वोट छिन सकते हैं। क्योंकि उत्तर प्रदेश में मुस्लिम वोट बैंक उधर ही रहता है जो भाजपा से सीधी टक्कर ले रहा हो। इसलिए सपा हरसंभव कोशिश करने में लगी है कि भाजपा से सीधी लड़ाई उसी की है वहीं दूसरी ओर बसपा भी मुस्लिम वोटबैंक में सेंध लगाने की पूरी कोशिश कर रही है। मुलायम सिंह का यह कदम उसी कवायद का हिस्सा है कि वे मुस्लिम वोटर को ये बता सकें कि 'अभी हम मजबूत हैं'।
कांग्रेस को संजीवनी न देना
मुलायम ही नहीं सभी राजनीतिक पंडित जानते हैं कि अगर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच गठबंधन होता है तो उसके जीतने की संभावनाएं प्रबल हो जाएंगी। कांग्रेस फिलहाल लंबे समय से यूपी की सत्ता से दूर है। सपा के साथ मिलकर वह 27 साल बाद एक बार फिर सरकार में आ सकती है। अगर ऐसा होता है तो कांग्रेस को संजीवनी मिल जाएगी। मुलायम इस बात से भी परेशान होंगे कि अगर राज्य में कांग्रेस फिर से जिंदा हुई तो नुकसान समाजवादी पार्टी का ही होगा। दरअसल सपा की सत्ता का आधार ओबीसी और मुस्लिम वोट बैंक है अगर कांग्रेस बढ़ी तो इसका टूटना लगभग तय है क्योंकि कांग्रेस के प्रदेश की सत्ता से बाहर होने के बाद ही सपा 'धर्मनिरपेक्ष पार्टी' बनकर उभर थी।