पत्रिका से बातचीत में बोले किसान- ऊंट के मुंह में जीरा है मुख्यमंत्री की किसान कर्जमाफी योजना, नरेंद्र मोदी के बाद योगी सरकार ने भी दिया झटका
हरदोई. दीपावली के त्यौहार के साथ ही आलू बुआई का समय चल रहा है, लेकिन आलू किसानों के आगे धुप्प अंधेरा है। उनकी जेबें खाली और चेहरे पर हवाइयां उड़ रही हैं। वजह भी साफ है। आलू कौड़ियों के भाव बिक रही है। किसान कोल्ड स्टोरेज से आलू तक छुड़ाकर ला पाने में असमर्थ हैं या फिर वहीं वारे-न्यारे कर रहे हैं। बड़ी संख्या में किसान आलू की खेती से दूरी बना रहे हैं। मतलब साफ है कि इस बार आलू का रकबा कम होगा। जानकारों का मानना है कि अगर आलू की पैदावार कम होगी तो अगले साल दालों के रेट आसमान छुएंगे।
हरदोई जिला मुख्यालय से 45 किलोमीटर पश्चिम में स्थित कोथावां ब्लॉक आलू का हब बनता जा रहा था, लेकिन इस बार सैकड़ों किसान या तो आलू की खेती से किनारा कर रहे हैं या फिर खाने भर का आलू ही बो रहे हैं। कोथावां ब्लॉक की ग्राम पंचायत भैनगांव निवासी रमन कुमार (29) सहित ज्यादातर किसान भाजपा की नीतियों से दुखी हैं। रमन कुमार का कहना है कि पिछले साल जब आलू के अच्छे भाव मिलने का समय आया था तो नोटबंदी ने आलू किसानों की कमर तोड़ दी और इस साल योगी सरकार की नीतियों के चलते आलू 250-300 रुपए प्रति कुंतल बिक रही है। इसे और समझाते हुए अशोक कुमार (43) बताते हैं कि एक कच्चे बीघे में आलू की फसल की कुल लागत (बुआई से कोल्ड स्टोरेज तक) करीब 10-12 हजार रुपए होती है, जबकि बमुश्किल से तीन हजार रुपए ही वापस आ पा रहे हैं। रमन कुमार ने कहा कि उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ की सरकार ने जो प्रति कुंतल आलू का समर्थन मूल्य (450 रुपए) तय किया था, उस रेट से भी किसानों का आलू नहीं बिक रहा है।
नोटबंदी ने और जीएसटी ने रुलाया
भैनगांव के ही निवासी राधेलाल (52) ने बताया कि वह करीब पिछले 10-15 सालों से बड़े पैमाने पर आलू की खेती करते रहे हैं, लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ कि 12 हजार रुपए लगाकर सिर्फ पांच हजार रुपए ही वापस आ रहे हैं। कोल्ड स्टोर में आलू रखा है, लेकिन उसे छुड़ाने नहीं जा पा रहे हैं। मिल वाले कहते हैं, आलू ले जाओ। गांवों में बेचो जाकर। भला ये कैसे संभव है। उन्होंने कहा कि नोटबंदी के बाद सरकार के रवैये ने आलू किसान की कमर तोड़ दी है। नोटों की किल्लत के चलते किसानों को अपने आलू औने-पौने दाम में बेचने पड़े थे। गांव के निवासी विनोद कुमार (36) कहते हैं कि भाजपा सरकार ने किसानों की कमर तोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी। जीएसटी के बाद खाद महंगी हो गई। डीजल के दाम बढ़ गए। चकबंदी को 10 साल से अधिक हो गया, लेकिन खेतों तक पानी नहीं पहुंच पाता।
भूलकर भी अब नहीं करेंगे आलू की खेती
भैनगांव निवासी मुनेंद्र सिंह बताते हैं कि पिछले उन्होंने पिछली बार दो एकड़ (10 बीघे) आलू बोए थे, लेकिन इस बार एक भी आलू नहीं बोएंगे। उन्होंने बताया हमारी लागत को मुश्किल से 20 फीसदी ही वापस हुआ है। माथे पर छलछला आए पसीने को अंगोछे से पोछते हुए मुनेंद्र सिंह कहत हैं कि हमने कड़ी मेहनत से आलू की खेती की थी। पैदावार भी खूब हुई, लेकिन भाव नहीं मिले। उन्होंने बताया कि दो एकड़ में उन्होंने इधर-उधर से पैसे लेकर करीब लाख रुपए आलू की खेती में लगाए थे, जिसमें से बमुश्किल 20 हजार रुपए ही वापस आ पाया है। गांव के ही निवासी ठाकुर प्रसाद (38) बताते हैं कि उन्होंने आलू की जगह अपने पूरे खेतों में सरसों की बुआई करा दिया है। अब वह भूलकर भी आलू नहीं बोएंगे। ठाकुर प्रसाद की तरह गांव में कई ऐसे किसान हैं, जिन्होंने आलू की खेती से तौबा कर लिया है।
किसान कर्जमाफी, ऊंट के मुंह में जीरा
किसानों की समस्याओं के सामने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की किसान कर्जमाफी योजना ऊंट के मुंह में जीरा के समान है। यह कहना है भैनगांव ग्राम पंचायत के किसान राम सहारे (56) का। इसे और स्पष्ट करते हुए राम सहारे बताते हैं कि जैसे हमारे गांव में करीब 250 किसान हैं, जिनमें से बमुश्किल 10-12 लोगों का ही कर्ज माफ हुआ है। शेष किसान परेशान हैं।
किसानों को बुनियादी सुविधाओं की जरूरत
बड़े किसान नेता शिवनारायण परिहार कहते हैं कि आज सभी किसान को बुनियादी सुविधाओं की जरूरत है, न कि कुछ को कर्जमाफी के टॉनिक की। वह कहते हैं प्रदेश भर में किसान परेशान हैं। इसलिए सरकार को ऐसी योजनाओं को धरातल पर लाना चाहिए, ताकि किसानों को सीधा उनका फायदा मिल सके।
किसान की आलू तीन सौ रुपए, सरकारी बीज 1400 रुपए
किसान ने जो अपना आलू कोल्ड स्टोरेज में रखा है, वह चार सौ रुपए प्रति कुंतल भी नहीं बिक रही है, जबकि उत्तर प्रदेश सरकार ने आलू के बीज की जो विक्रय दर 1400 रुपए प्रति कुंतल निर्धारित की है। आलू की आधारित प्रथम दर 1400 रुपये प्रति कुन्टल, आधारित द्वितीय दर 1310 रुपये प्रति कुन्तल, ओवर साइज (आधारित प्रथम) की दर 1200 रुपये प्रति कुन्टल तथा ओवर साइज (आधारित द्वितीय) की दर 910 रुपये प्रति कुन्टल निर्धारित की गई है।
जीएसटी लगते ही बढ़ गए खाद के दाम
जीएसटी लागू होते ही फर्टिलाइजर्स, जैविक कैमिकल्स और खेती-किसानी में इस्तेमाल होने वाले यंत्रों की कीमत बढ़ गई है। देश की प्रमुख फर्टिलाइजर्स कंपनियों ने विज्ञापन के जरिए अपने नए रेट लिस्ट घोषित किए हैं। राजनीतिक दल और किसान नेता इसका विरोध कर रहे हैं तो देश का अन्नदाता गुस्से में है। जीएसटी के बाद इंडियन फॉरमर्स फर्टिलाइजसर्स कोओपरेटिव (इफको) लिमिटेड ने यूरिया, डीएपी, एनपीके आदि के दामों में भारी बढ़ोत्तरी की है। कोरोमंडल इंटरनेशनल लिमिटेड ने भी खादों के दाम बढ़ा दिए हैं। कृषक भारती कोआपरेटिव लिमिटेड (कृभको) के भी दाम बढ़ गए हैं।
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