लखनऊ

पंचायत चुनाव: क्या है ‘ट्रिपल टेस्ट फॉर्मूला’, क्यों पड़ी इसकी जरूरत? यहां जानिए पूरी डिटेल्स

Panchayat Chunav Update: यूपी पंचायत चुनावों में ‘ट्रिपल टेस्ट फॉर्मूला’ लागू होगा। जानिए ये फॉर्मूला क्या है और इसकी जरूरत क्यों पड़ी?
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May 19, 2026
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यूपी में पंचायत चुनाव में 9 अंकों के नया वोटर नंबर लागू करने का क्या है कारण? फोटो सोर्स-पत्रिका न्यूज

Panchayat Chunav Update:उत्तर प्रदेशमें पंचायत चुनावों को लेकर इस बार बड़ा और ऐतिहासिक बदलाव होने जा रहा है। राज्य में पहली बार ग्राम प्रधान, ब्लॉक प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनावों में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) का आरक्षण ‘ट्रिपल टेस्ट फॉर्मूले’ के तहत तय किया जाएगा। इसके लिए राज्य सरकार एक समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन करने जा रही है। सोमवार को राज्य कैबिनेट ने आयोग के गठन को मंजूरी दे दी।

अब तक पंचायत चुनावोंमें ओबीसी आरक्षण तय करने के लिए रैपिड सर्वे का सहारा लिया जाता था। साल 2021 के पंचायत चुनावों में भी इसी आधार पर आरक्षण की सीटें तय की गई थीं, लेकिन इस बार पूरी प्रक्रिया वैज्ञानिक, अनुभवजन्य और कानूनी मानकों के आधार पर पूरी की जाएगी।

इससे पहले उत्तर प्रदेश सरकार ने साल 2023 के नगर निकाय चुनावों में पहली बार सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार ट्रिपल टेस्ट फॉर्मूले को लागू किया था। अब पंचायत चुनावों में भी इसे पूरी तरह अनिवार्य कर दिया गया है।

ट्रिपल टेस्ट फॉर्मूला क्या है ?

ट्रिपल टेस्ट फॉर्मूला स्थानीय निकाय चुनावों में ओबीसी आरक्षण लागू करने के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किया गया कानूनी मानक है। सर्वोच्च अदालत ने पहली बार साल 2010 में ‘के. कृष्णमूर्ति बनाम भारत संघ’ मामले में और बाद में 2021 में ‘विकास किशनराव गवली बनाम महाराष्ट्र राज्य’ मामले में इस प्रक्रिया को अनिवार्य बताया था। इसके तहत राज्य सरकार को आरक्षण लागू करने से पहले तीन जरूरी शर्तें पूरी करनी होती हैं।

पहला टेस्ट: समर्पित आयोग का गठन

ट्रिपल टेस्ट के पहले चरण में राज्य सरकार को एक विशेष और समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन करना होता है। इस आयोग का मुख्य काम स्थानीय निकायों में पिछड़ेपन की प्रकृति, उसके प्रभाव और वर्तमान स्थिति का अनुभवजन्य अध्ययन करना होता है।

आयोग जमीनी स्तर पर जाकर यह पता लगाएगा कि किन क्षेत्रों में पिछड़ा वर्ग राजनीतिक और सामाजिक रूप से किस स्थिति में है।

दूसरा टेस्ट: आरक्षण का सटीक अनुपात तय करना

दूसरे चरण में आयोग द्वारा जुटाए गए अनुभवजन्य आंकड़ों के आधार पर स्थानीय निकायवार ओबीसी आरक्षण का प्रतिशत तय किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार बिना वैज्ञानिक और सामाजिक अध्ययन के किसी भी निकाय में आरक्षण लागू नहीं किया जा सकता, इसलिए आयोग की रिपोर्ट के आधार पर ही तय होगा कि किस पंचायत, ब्लॉक या जिला पंचायत में कितनी सीटें ओबीसी वर्ग के लिए आरक्षित होंगी।

तीसरा टेस्ट: 50 प्रतिशत की सीमा

ट्रिपल टेस्ट का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा 50 प्रतिशत आरक्षण सीमा से जुड़ा है। इसके तहत यह सुनिश्चित करना जरूरी होगा कि किसी भी ग्राम पंचायत, ब्लॉक या जिला पंचायत में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और ओबीसी को मिलाकर कुल आरक्षण 50 प्रतिशत से अधिक न हो। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी भी परिस्थिति में कुल आरक्षण इस सीमा से आगे नहीं बढ़ सकता।

क्यों जरूरी पड़ा यह फॉर्मूला?

सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि शिक्षा और नौकरियों में मिलने वाला आरक्षण तथा राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिए दिया जाने वाला आरक्षण दोनों अलग-अलग विषय हैं। अदालत के अनुसार, राजनीतिक पिछड़ेपन को साबित करने के लिए सरकार के पास ठोस और समकालीन आंकड़े होना जरूरी है। यही वजह है कि स्थानीय निकाय चुनावों में ओबीसी आरक्षण के लिए वैज्ञानिक सर्वे और अनुभवजन्य डेटा को अनिवार्य किया गया।

नियम यह भी कहता है कि यदि कोई राज्य सरकार ट्रिपल टेस्ट की प्रक्रिया पूरी किए बिना चुनाव कराती है, तो ओबीसी वर्ग की सीटों को सामान्य श्रेणी मानकर चुनाव कराना होगा।

जून के पहले सप्ताह तक हो सकती हैं नियुक्तियां

शासन स्तर से मिली जानकारी के अनुसार समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का कार्यकाल 6 महीने का होगा। आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति इस महीने के अंत तक या जून के पहले सप्ताह में पूरी होने की संभावना है। आयोग उन क्षेत्रों में नए सिरे से सर्वे भी कराएगा जहां पिछड़ा वर्ग से जुड़े सटीक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। इसी सर्वे और अध्ययन के आधार पर पंचायत चुनावों में आरक्षण की अंतिम रूपरेखा तैयार की जाएगी।

Updated on:
19 May 2026 01:28 pm
Published on:
19 May 2026 01:28 pm