
SP Congress Alliance UP Elections:उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा के खिलाफ विपक्षी एकजुटता की कोशिश को कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच बढ़ते मतभेदों ने नई चुनौती दे दी है। हालांकि दिल्ली के रामलीला मैदान में राहुल गांधी और अखिलेश यादव एक मंच पर नजर आए लेकिन अगले ही दिन यूपी की राजनीति में दोनों दलों के बीच स्वामी प्रसाद मौर्य को लेकर विवाद गहरा गया। कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम की मौर्य से मुलाकात और उन्हें इंडिया गठबंधन में शामिल करने के समर्थन ने सपा नेतृत्व की नाराजगी बढ़ा दी है। अखिलेश यादव पहले ही मौर्य को गठबंधन में शामिल करने से इनकार कर चुके हैं। इसके बावजूद कांग्रेस की ओर से उनसे संपर्क बनाए रखने से दोनों दलों के बीच राजनीतिक प्राथमिकताओं का अंतर सामने आ गया है।
विवाद की शुरुआत मौर्य के कांग्रेस नेतृत्व से संपर्क और इंडिया गठबंधन में शामिल होने की इच्छा जताने से हुई। मौर्य ने राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा से मुलाकात के बाद गठबंधन में शामिल होने का दावा किया। इसके बाद अखिलेश यादव ने साफ कर दिया कि मौर्य के लिए गठबंधन में कोई जगह नहीं है और विधानसभा चुनाव के सीट बंटवारे में भी उनका कोई हिस्सा नहीं होगा। सपा अध्यक्ष के इस रुख के बाद भी कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने मौर्य से मुलाकात की। हालांकि सोशल मीडिया पर इस मुलाकात की तस्वीरें वायरल होने के बाद कांग्रेस प्रभारी ने बचाव करते हुए कहा कि मौर्य सामाजिक न्याय की लड़ाई में उनके पुराने साथी हैं और वह अपने मित्रों से मिलना बंद नहीं कर सकते। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि मौर्य और अखिलेश के बीच का विवाद दोनों नेताओं को आपस में सुलझाना चाहिए। दूसरी ओर, सपा नेतृत्व का सवाल है कि जब पार्टी अध्यक्ष गठबंधन में मौर्य की भूमिका स्पष्ट कर चुके हैं तो कांग्रेस का प्रदेश प्रभारी उनसे लगातार मुलाकात क्यों कर रहे हैं।
मौर्य ने भी अखिलेश के रुख पर पलटवार करते हुए कहा कि उन्हें इंडिया गठबंधन में शामिल करने का फैसला कांग्रेस का है और इसके लिए उन्हें अखिलेश यादव के प्रमाणपत्र की जरूरत नहीं है। उन्होंने कांग्रेस नेतृत्व से बातचीत का हवाला देते हुए कहा कि उन्होंने सपा के हिस्से की सीटें नहीं मांगी हैं। इस तरह मौर्य ने अपने राजनीतिक भविष्य को सपा के बजाय कांग्रेस नेतृत्व से जोड़ दिया।
कांग्रेस और सपा के बीच मतभेद केवल मौर्य तक सीमित नहीं हैं। विधानसभा चुनाव के लिए सीटों के बंटवारे को लेकर दोनों दलों की दावेदारी में बड़ा अंतर है। कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम पहले 150 सीटों की चर्चा को खारिज करते हुए 200 सीटों तक चुनाव लड़ने की बात कह चुके हैं। बाद में कांग्रेस की ओर से 175 से 200 सीटों की सूची सपा को सौंपे जाने की बात भी सामने आई। कांग्रेस इसे अपने संगठनात्मक विस्तार, लोकसभा चुनाव के प्रदर्शन और राहुल गांधी के प्रभाव से जोड़ रही है। वहीं सपा नेतृत्व कांग्रेस को उसकी मौजूदा विधानसभा ताकत और संबंधित क्षेत्रों में जीत की संभावना के आधार पर सीटें देना चाहता है। सपा खेमे से कांग्रेस को करीब 70 से 80 सीटें दिए जाने की चर्चा है। कांग्रेस की इतनी बड़ी दावेदारी को सपा के कई नेता स्वीकार करने के पक्ष में नहीं हैं। कांग्रेस का तर्क है कि लोकसभा चुनाव में यूपी में इंडिया गठबंधन की सफलता में राहुल गांधी की भूमिका महत्वपूर्ण थी। उस चुनाव में सपा ने 37 और कांग्रेस ने 6 सीटें जीती थीं। गठबंधन ने कुल 43 सीटों पर जीत दर्ज की थी।
कांग्रेस के लिए सीटों की संख्या केवल चुनाव लड़ने का सवाल नहीं है। पार्टी उत्तर प्रदेश में अपना संगठन दोबारा मजबूत करने और विधानसभा में अपनी राजनीतिक मौजूदगी बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रही है। वहीं सपा प्रदेश में विपक्ष की सबसे बड़ी ताकत होने के आधार पर गठबंधन का नेतृत्व और सीटों के बंटवारे में अपनी प्रमुख भूमिका बनाए रखना चाहती है। इसी अंतर के कारण सीटों पर बातचीत शुरू होने के बावजूद दोनों दलों के बीच सहमति बनना आसान नहीं दिख रहा।
मौर्य के मुद्दे पर कांग्रेस की सक्रियता के पीछे पिछड़े वर्गों के बीच अपना राजनीतिक आधार बढ़ाने की कोशिश भी जुड़ी है। कांग्रेस उत्तर प्रदेश में ऐसे नेताओं और छोटे राजनीतिक दलों को साथ जोड़ना चाहती है, जिनका विभिन्न पिछड़े वर्गों में प्रभाव है। मौर्य के अलावा संजय चौहान और अपना दल (कमेरावादी) से जुड़े नेताओं के साथ कांग्रेस नेतृत्व की बातचीत भी इसी राजनीतिक कवायद का हिस्सा रही है। मौर्य की राजनीतिक पृष्ठभूमि भी इस रणनीति में महत्वपूर्ण है। सपा से अलग होने के बाद मौर्य लगातार अखिलेश यादव की पीडीए राजनीति पर सवाल उठाते रहे हैं। उन्होंने पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वर्गों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर सपा नेतृत्व की आलोचना की है। अब कांग्रेस के साथ उनकी बातचीत ने इस पुराने विवाद को विपक्षी गठबंधन के भीतर का मुद्दा बना दिया है।
कांग्रेस और सपा के बीच बढ़ते मतभेद ऐसे समय सामने आए हैं, जब दोनों दल लोकसभा चुनाव में मिली सफलता को विधानसभा चुनाव में दोहराने की तैयारी कर रहे हैं। कांग्रेस जहां अपने लिए अधिक सीटें और पिछड़े वर्गों के प्रभावशाली नेताओं की भागीदारी चाहती है, वहीं सपा अपने पीडीए समीकरण और प्रदेश में सबसे बड़े विपक्षी दल की हैसियत के आधार पर गठबंधन की शर्तें तय करना चाहती है। प्रदेश इकाई छोटे दलों और सामाजिक आधार वाले नेताओं को जोड़कर अपनी चुनावी क्षमता बढ़ाना चाहती है। दूसरी ओर, अखिलेश यादव गठबंधन में शामिल दलों और नेताओं के चयन को जीत की संभावना तथा सपा की राजनीतिक रणनीति के अनुरूप रखना चाहते हैं।