UP Assembly Election BSP: क्या यूपी की सियासत में 'हाथी' फिर पकड़ेगा रफ्तार? हाशिए पर चल रही बसपा को जिंदा करने के लिए मायावती ने चला है एक ऐसा दांव, जिसने भाजपा-सपा की नींद उड़ा दी है। आखिर क्या है बसपा सुप्रीमो की रणनीति, पढ़ें पूरी इनसाइड स्टोरी।
अगले साल होने वाला उत्तर प्रदेश विधानसभा बेहद रोचक हो सकता है। क्योंकि सूबे के सियासी नक्शे से लगभग गायब हो चुकी बसपा एक बार फिर से अपनी मौजूदगी का अहसास कराने की तैयारी में जुट गई है। मायावती की कोशिश पुराने और जनाधार वाले नेताओं को बसपा में वापस लाना है। पिछले 10 सालों में कई दिग्गज नेता पार्टी से दूर जा चुके हैं। कुछ ने खुद पाला बदल लिया, जबकि अधिकांश को मायावती ने बाहर किया। 2007 में मायावती की जिस टीम ने यूपी में 206 सीटें जीतकर बहुमत की सरकार बनाई थी, उसमें से बमुश्किल एक-दो ही आज पार्टी का हिस्सा रह गए हैं। ऐसे में बसपा के लिए पुराने नेताओं को 'घर' वापसी आसान नहीं होगी। लेकिन अगर मायावती इसमें सफल होती हैं, तो भाजपा सहित अन्य सभी दलों के समीकरण जरूर बिगड़ सकते हैं।
बहुजन समाज पार्टी (BSP) अपने सबसे खराब दौर से गुजर रही है। किसी जमाने में यूपी की राजनीति बसपा और मायावती के इर्द-गिर्द घूमती थी, लेकिन आज उसका केवल एक विधायक है। चुनाव दर चुनाव पार्टी कमजोर हुई है। उत्तर प्रदेश के बाहर भी बसपा की मौजूदगी नाममात्र बची है। उत्तराखंड में उसके दो और पंजाब में एक विधायक है। इस तरह, तीन राज्यों में बसपा विधायकों की संख्या महज 4 रह गई है। दलित, पिछड़ा वर्ग को बसपा का कोर वोटर माना जाता है। 2007 में पार्टी ने अपना जनाधार बढ़ाने के लिए बहुजन के साथ-साथ खुद को सर्वजन की पार्टी के तौर पर पेश किया। ब्राह्मण नेताओं को टिकट दिए, पार्टी में बड़ी जिम्मेदारी सौंपी। मायावती की सोशल इंजीनियरिंग ने भाजपा, सपा और कांग्रेस को बेचैन कर दिया। इसके बाद मायावती ने मुस्लिम वोटों में भी सेंध लगाई। हालांकि, 2012 में मिली हार के बाद मायावती और बसपा लगातार कमजोर होते चले गए।
बसपा के सूबे की सियासत में कमजोर पड़ने का बड़ा फायदा समाजवादी पार्टी और कांग्रेस को मिला। दलित वोट इन दोनों पार्टियों में विभाजित हो गया। हालांकि, 2017 और फिर 2022 में दलित मतदाता भाजपा से प्रभावित नजर आए। उत्तर प्रदेश में 22 प्रतिशत दलित वोट हैं। प्रदेश की आरक्षित 86 में से 84 सीटें दलितों के लिए रिजर्व हैं। 140 से 150 सीटों पर दलित मतदाता निर्णायक प्रभाव रखते हैं। भाजपा भी उनकी अहमियत अच्छे से समझती है और योगी सरकार ने वाल्मीकि जयंती पर पहली बार सार्वजनिक अवकाश घोषित करके दलित वोटों को आगे भी अपने से जोड़े रखने का दांव चला है। पिछले दो चुनाव यानी 2017 और 2022 में भाजपा दलितों का समर्थन प्राप्त करने में सफल रही है। लेकिन यदि मायावती पुराने रंग में लौटती हैं, तो फिर हालात अलग होंगे।
लालजी वर्मा और राम अचल राजभर जैसे नेता कभी बसपा सुप्रीमो मायावती के खास हुआ करते थे। लेकिन अब दोनों अलग राह पर हैं। इसी तरह, बसपा के अच्छे दिनों के साथी स्वामी प्रसाद मौर्य, नकुल दुबे, नसीमुद्दीन सिद्दीकी, बाबू सिंह कुशवाहा और ठाकुर जयवीर सिंह भी पार्टी से दूर जा चुके हैं। इनके अलावा भी कई ऐसे लीडर, जो बसपा के लिए वोट मशीन साबित हो चुके हैं - पार्टी से बाहर हैं। बसपा से दूर अपनी एक अलग पहचान स्थापित कर चुके नेताओं का पार्टी में वापस लौटना मुश्किल है।
लेकिन ऐसे नेता जो अपनी मौजूदा पार्टी में किनारे कर दिए गए हैं या जिनकी टिकट कटने की आशंका है, वो जरूर मायावती के 'हाथी' की सवारी कर सकते हैं। बसपा ने जय प्रकाश सिंह और वहाब चौधरी को पार्टी में वापस ले लिया है। प्रकाश सिंह को कुछ साल पहले राहुल गांधी और प्रधानमंत्री के खिलाफ टिप्पणी को लेकर मायावती ने पार्टी से निकाल दिया था। जबकि चौधरी पार्टी विरोधी गतिविधियों के चलते निष्कासित हुए थे। इन दोनों नेताओं की वापसी से मायावती ने यह संदेश दिया है कि वो 'अपनों' की पिछली गलतियों को भुलाने को तैयार हैं।
मायावती अकेले चुनाव लड़ेगी या गठबंधन के साथ, अभी कुछ साफ नहीं है। बीते दिनों कांग्रेस के नेता मायावती से मिलने पहुंचे थे, लेकिन उन्होंने मुलाकात नहीं की। ऐसे में फिलहाल तो यही समझा जा सकता है कि मायावती कांग्रेस से रिश्ता नहीं जोड़ेंगी। समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर चुनाव में उतरने की संभावना भी बेहद कम है।
संभव है कि बसपा छोटे दलों को साथ लेकर चुनाव लड़े या फिर नतीजों के बाद कोई नया साथी तलाशे। बसपा को लगभग सभी बड़े दलों के साथ गठबंधन का अनुभव है। 1993 में बसपा ने समाजवादी पार्टी से रिश्ता जोड़ा, लेकिन 1995 में दोनों अलग हो गए।
2019 में फिर गठबंधन हुआ। 'बुआ' और 'बबुआ' यानि अखिलेश यादव और मायावती ने कड़वा इतिहास भुलाकर साथ चलने का ऐलान किया, मगर जल्द ये रिश्ता भी टूट गया। 1996 में मायावती ने कांग्रेस से मिलकर चुनाव लड़ा था, लेकिन सरकार भाजपा के साथ बना ली। बीजेपी के साथ बसपा ने तीन बार गठबंधन किया, सरकार भी बनाई मगर रिश्ते खास अच्छे नहीं रहे। ऐसे में मायावती के लिए कोई भी दल नया नहीं है। वह पहले अकेले मैदान में उतरकर खुद को कसौटी पर परख सकती हैं और अगर परिणाम अनुकूल आता है, तो नफे-नुकसान का आकलन करने के बाद नया रिश्ता जोड़ सकती हैं.