लखनऊ विधानसभा में आंदोलनों पर कार्रवाई को लेकर जोरदार बहस छिड़ गई। नेता प्रतिपक्ष माता प्रसाद पांडेय के सवाल पर स्पीकर सतीश महाना ने वित्त मंत्री सुरेश खन्ना से जवाब मांगा। खन्ना ने अपने विपक्षी दौर के मुकदमों का जिक्र करते हुए राजनीतिक प्रताड़ना के अनुभव साझा किए।
Suresh Khanna UP Assembly: उत्तर प्रदेश विधानसभा में शुक्रवार को आंदोलनों और उन पर की जाने वाली प्रशासनिक कार्रवाई को लेकर तीखी बहस देखने को मिली। नेता प्रतिपक्ष Mata Prasad Pandey ने सदन में सवाल उठाया कि यदि कोई आंदोलन शांतिपूर्ण और अहिंसक है, तो सरकार की ओर से कार्रवाई क्यों की जाती है। उनके इस प्रश्न पर सदन का माहौल कुछ देर के लिए गरमा गया। स्थिति को स्पष्ट करने के लिए विधानसभा अध्यक्ष Satish Mahana ने वित्त मंत्री Suresh Khanna से प्रतिक्रिया देने को कहा। इसके बाद वित्त मंत्री ने अपने लंबे राजनीतिक अनुभव का हवाला देते हुए विपक्ष के दौर की कई घटनाओं का उल्लेख किया।
माता प्रसाद पांडेय ने कहा कि लोकतंत्र में आंदोलन जनता की आवाज का माध्यम होते हैं। यदि कोई आंदोलन हिंसक नहीं है और कानून-व्यवस्था को चुनौती नहीं दे रहा, तो फिर उस पर मुकदमे दर्ज करना या नेताओं को हिरासत में लेना क्यों आवश्यक हो जाता है। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार को विपक्ष की आवाज को दबाने के बजाय संवाद का रास्ता अपनाना चाहिए। उनके इस वक्तव्य के दौरान विपक्षी सदस्यों ने मेज थपथपाकर समर्थन जताया, जबकि सत्तापक्ष की ओर से कुछ आपत्तियां भी दर्ज की गईं।
सदन में बढ़ते शोर-शराबे के बीच स्पीकर सतीश महाना ने स्थिति को नियंत्रित किया। उन्होंने कहा कि यह गंभीर विषय है और सरकार की ओर से स्पष्ट जवाब आना चाहिए। इसके बाद उन्होंने वित्त मंत्री सुरेश खन्ना को अपनी बात रखने के लिए आमंत्रित किया।
वित्त मंत्री सुरेश खन्ना ने कहा कि वे पिछले 37 वर्षों से सदन के सदस्य हैं और उन्होंने राजनीति के दोनों पक्ष देखे हैं-सत्ता और विपक्ष। उन्होंने कहा कि लंबे समय तक वे स्वयं विपक्ष में रहे और उस दौरान उनके खिलाफ कई मुकदमे दर्ज किए गए। खन्ना ने दावा किया कि एक समय ऐसा भी आया जब उन पर एक ऐसे व्यक्ति की हत्या का मुकदमा दर्ज कर दिया गया, जिसे उन्होंने कभी देखा तक नहीं था। उन्होंने बताया कि यह मुकदमा करीब 12 वर्षों तक चला और अंततः अदालत ने उन्हें बरी कर दिया। उन्होंने कहा, “उस दौर में विपक्ष के नेताओं पर मुकदमे दर्ज कर उन्हें जेल भेजना आम बात थी। राजनीतिक मतभेदों को आपराधिक मामलों में बदल दिया जाता था।” उनके इस बयान के बाद सदन में कुछ देर के लिए सन्नाटा छा गया, जबकि सत्ता पक्ष के सदस्यों ने मेज थपथपाकर समर्थन जताया।
वित्त मंत्री के बयान के बाद विपक्षी सदस्यों ने भी अपनी प्रतिक्रिया दी। उनका कहना था कि अतीत की घटनाओं को आधार बनाकर वर्तमान में हो रही कार्रवाई को सही नहीं ठहराया जा सकता। लोकतंत्र में असहमति और विरोध का अधिकार संवैधानिक है। सत्ता पक्ष का तर्क था कि यदि कोई आंदोलन कानून-व्यवस्था को प्रभावित करता है या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाता है, तो सरकार कार्रवाई करने के लिए बाध्य है। इस दौरान कुछ देर के लिए सदन में नोकझोंक भी हुई, जिसे स्पीकर ने शांत कराया।
सदन में हुई इस बहस को आगामी राजनीतिक परिस्थितियों के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। विपक्ष जहां सरकार पर दमनात्मक रवैये का आरोप लगा रहा है, वहीं सरकार अपने अनुभवों के आधार पर यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि राजनीतिक संघर्षों में मुकदमे और आरोप नई बात नहीं हैं। सुरेश खन्ना का व्यक्तिगत अनुभव साझा करना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि सत्ता पक्ष खुद को पीड़ित राजनीति के रूप में भी प्रस्तुत करना चाहता है, ताकि विपक्ष के आरोपों का संतुलित जवाब दिया जा सके।