
UP GST Department IAS Posting Row: Government Orders Probe After Officers' Association Complaint: उत्तर प्रदेश के राज्य कर ( GST ) विभाग में स्वीकृत पदों से अधिक आईएएस अधिकारियों की तैनाती को लेकर विवाद गहरा गया है। विभाग के अधिकारियों और जीएसटी ऑफिसर्स सर्विस एसोसिएशन ने इस मुद्दे को गंभीर बताते हुए मुख्यमंत्री के समक्ष अपनी आपत्ति दर्ज कराई है। एसोसिएशन का आरोप है कि विभाग में सेवा नियमावली की अनदेखी करते हुए ऐसे पदों पर आईएएस अधिकारियों की नियुक्ति की जा रही है, जो नियमानुसार केवल विभागीय पदोन्नति के माध्यम से भरे जाने चाहिए। मामले की गंभीरता को देखते हुए शासन ने पूरे प्रकरण की जांच के आदेश जारी कर दिए हैं। इसके बाद विभागीय हलकों में इस मुद्दे को लेकर चर्चा तेज हो गई है।
राज्य कर विभाग उत्तर प्रदेश सरकार के सबसे महत्वपूर्ण राजस्व विभागों में गिना जाता है। विभाग हर वर्ष करीब 1.25 लाख करोड़ रुपये का राजस्व राज्य सरकार के खजाने में जमा कराता है। ऐसे में विभागीय अधिकारियों का कहना है कि इस महत्वपूर्ण विभाग को प्रशासनिक प्रशिक्षण का केंद्र नहीं बनाया जाना चाहिए। उनका तर्क है कि यहां कार्य करने के लिए कर कानूनों, जीएसटी प्रणाली, व्यापारिक प्रक्रियाओं और राजस्व प्रशासन का गहन अनुभव आवश्यक होता है, जिसे विभागीय अधिकारी वर्षों की सेवा के बाद प्राप्त करते हैं।
वरिष्ठ अधिकारियों का मानना है कि यदि लगातार आईएएस अधिकारियों की तैनाती विभागीय पदों पर होती रही तो विभागीय अधिकारियों की पदोन्नति, मनोबल और सेवा संरचना पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
इस पूरे विवाद की शुरुआत कानपुर से हुई, जहां अपर आयुक्त स्तर के दो पदों पर लगातार आईएएस अधिकारियों की नियुक्ति की गई। पहले इन पदों पर आईएएस सैमुअल पाल की तैनाती की गई और अब आईएएस सान्य छाबड़ा को नियुक्त किया गया है। जीएसटी ऑफिसर्स सर्विस एसोसिएशन का कहना है कि ये नियुक्तियां विभाग की सेवा नियमावली के अनुरूप नहीं हैं। एसोसिएशन का दावा है कि अपर आयुक्त ग्रेड-1 के पद विभागीय संवर्ग के पद हैं और इन पर नियुक्ति केवल पदोन्नति के माध्यम से ही की जानी चाहिए।
एसोसिएशन ने मुख्यमंत्री को भेजे गए पत्र में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया है कि राज्य कर विभाग में अपर आयुक्त ग्रेड-1 के कुल 22 स्वीकृत पद हैं। इन पदों को भरने की प्रक्रिया विभागीय सेवा नियमावली में निर्धारित है और इन पर विभाग के पात्र अधिकारियों को पदोन्नति देकर नियुक्त किया जाना चाहिए।
एसोसिएशन का कहना है कि यदि इन पदों पर बाहरी अधिकारियों की तैनाती की जाती है तो इससे विभागीय अधिकारियों के वैधानिक अधिकार प्रभावित होते हैं। साथ ही इससे पदोन्नति की पूरी व्यवस्था भी प्रभावित होती है, जिससे कर्मचारियों में असंतोष बढ़ना स्वाभाविक है।
जीएसटी ऑफिसर्स सर्विस एसोसिएशन ने इस विषय पर मुख्यमंत्री को विस्तृत पत्र भेजकर पूरे मामले में हस्तक्षेप की मांग की है। पत्र में कहा गया है कि विभागीय नियमों का पालन सुनिश्चित किया जाए और स्वीकृत पदों पर नियुक्ति सेवा नियमावली के अनुसार ही की जाए।
एसोसिएशन ने यह भी आग्रह किया है कि यदि किसी विशेष परिस्थिति में आईएएस अधिकारियों की तैनाती की जाती है तो उसके लिए स्पष्ट प्रशासनिक और कानूनी आधार सार्वजनिक किया जाना चाहिए, ताकि भविष्य में इस प्रकार के विवाद की स्थिति उत्पन्न न हो।
एसोसिएशन की शिकायत मिलने के बाद शासन ने पूरे मामले को गंभीरता से लिया है। सूत्रों के अनुसार, संबंधित विभाग से इस मामले में विस्तृत रिपोर्ट तलब की गई है और जांच के आदेश जारी कर दिए गए हैं। जांच में यह देखा जाएगा कि आईएएस अधिकारियों की तैनाती किन परिस्थितियों में की गई और क्या यह नियुक्तियां सेवा नियमावली तथा प्रशासनिक प्रावधानों के अनुरूप हैं। जांच रिपोर्ट आने के बाद शासन आगे की कार्रवाई पर निर्णय लेगा। विभागीय अधिकारी भी अब इस रिपोर्ट का इंतजार कर रहे हैं।
विभागीय अधिकारियों का कहना है कि पूर्व में कानपुर और गाजियाबाद जैसे महत्वपूर्ण जोनों में विभागीय अधिकारी ही सर्वोच्च पदों पर कार्य करते रहे हैं। इन अधिकारियों ने वर्षों तक कर प्रशासन का अनुभव प्राप्त करने के बाद इन जिम्मेदारियों का निर्वहन किया और राजस्व संग्रह में उल्लेखनीय योगदान दिया। अधिकारियों का तर्क है कि विभाग की कार्यप्रणाली अत्यंत तकनीकी और विशिष्ट है। इसलिए अनुभवी विभागीय अधिकारियों को प्राथमिकता देना विभाग और सरकार-दोनों के हित में होगा।
राज्य कर विभाग के कई अधिकारियों का मानना है कि यदि विभागीय पदों पर लगातार आईएएस अधिकारियों की तैनाती होती रही तो इसका सीधा असर अधिकारियों के मनोबल पर पड़ेगा। वर्षों की सेवा और अनुभव के बाद मिलने वाली पदोन्नति यदि प्रभावित होती है तो इससे विभागीय कार्य संस्कृति पर भी नकारात्मक असर पड़ सकता है। विभागीय सूत्रों का कहना है कि किसी भी विभाग में सेवा नियमों का पालन कर्मचारियों के विश्वास और प्रशासनिक संतुलन के लिए आवश्यक होता है। यदि नियमों को लेकर असमंजस की स्थिति बनती है तो संगठनात्मक असंतोष बढ़ सकता है।
राज्य कर विभाग में आईएएस अधिकारियों की तैनाती का यह मामला अब शासन स्तर पर पहुंच चुका है। मुख्यमंत्री को भेजी गई शिकायत और उसके बाद जांच के आदेश ने इस विवाद को और गंभीर बना दिया है। अब विभागीय अधिकारियों, कर्मचारी संगठनों और प्रशासनिक हलकों की नजर शासन की जांच रिपोर्ट और उसके आधार पर होने वाले निर्णय पर टिकी हुई है।
यदि जांच में सेवा नियमावली के उल्लंघन की पुष्टि होती है तो नियुक्तियों की प्रक्रिया पर पुनर्विचार किया जा सकता है। वहीं यदि शासन इन नियुक्तियों को नियमों के अनुरूप पाता है तो विभागीय अधिकारियों को उसका स्पष्ट कारण बताया जा सकता है। फिलहाल यह मामला प्रशासनिक व्यवस्था, सेवा नियमों और विभागीय अधिकारों के बीच संतुलन का एक महत्वपूर्ण विषय बन गया है, जिस पर आने वाले दिनों में शासन का फैसला निर्णायक माना जा रहा है।