
उत्तर प्रदेश में पिछले एक सप्ताह के दौरान पुलिस मुठभेड़ों के कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें आरोपियों के पैर में गोली लगने के बाद उन्हें गिरफ्तार किया गया। अलीगढ़ में दुष्कर्म के आरोपी ई-रिक्शा चालक को घटना के महज चार घंटे बाद मुठभेड़ में गिरफ्तार किया गया, जबकि उसके पैर में गोली लगी। बहराइच में दो अलग-अलग मुठभेड़ों में ₹50 हजार के इनामी बदमाश फिरोज और उसके साथी मुल्कराज को पैर में गोली लगने के बाद पकड़ा गया। वहीं अलीगढ़ में 25 हजार रुपये के इनामी गोकश फरमान और बुलंदशहर में दुष्कर्म के आरोपी इरफान को भी पुलिस ने मुठभेड़ के बाद घायल अवस्था में गिरफ्तार किया। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर 'हाफ एनकाउंटर' क्या है? क्या भारतीय कानून में ऐसा कोई प्रावधान है? आइए पूरे मामले को विस्तार से समझते हैं।
हाफ एनकाउंटर' भारतीय कानून, भारतीय न्याय संहिता (BNS) या पुलिस नियमावली में मौजूद कोई आधिकारिक शब्द नहीं है। यह पूरी तरह एक बोलचाल की भाषा है। जब मुठभेड़ के दौरान पुलिस आरोपी को पैर में गोली मारकर पकड़ लेती है और उसकी मौत नहीं होती, तो लोग इसे 'हाफ एनकाउंटर' कहते हैं। यानी आरोपी घायल जरूर होता है, लेकिन जिंदा बचता है और फिर उस पर मुकदमा चलता है।
साल 2017 में योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद यूपी में अपराधियों के खिलाफ 'जीरो टॉलरेंस' नीति लागू हुई। इसके बाद से प्रदेश में एनकाउंटर की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ। धीरे-धीरे बड़ी संख्या में ऐसे मामले सामने आने लगे, जिनमें आरोपियों के पैर में गोली लगी थी। यहीं से सोशल मीडिया पर 'ऑपरेशन लंगड़ा' और 'हाफ एनकाउंटर' जैसे शब्द वायरल होने लगे। हालांकि, यूपी पुलिस ने कभी इन शब्दों को आधिकारिक तौर पर स्वीकार नहीं किया।
कानून और व्यवस्था का रिकॉर्ड के अनुसार, उत्तर प्रदेश में वर्ष 2017 से 2025 के बीच पुलिस ने कुल 15,726 एनकाउंटर किए। सरकारी आंकड़ों के अनुसार इन अभियानों के दौरान 256 कुख्यात अपराधी मारे गए, जबकि 31,960 अपराधियों को गिरफ्तार किया गया। इसके अलावा 10,324 अपराधी घायल हुए, जिनमें अधिकांश के पैर में गोली लगने का दावा किया गया। इस अवधि में 18 पुलिसकर्मी शहीद हुए और 1,754 पुलिसकर्मी घायल हुए।
हाल के महीनों में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 'हाफ एनकाउंटर' के बढ़ते मामलों पर चिंता जताई है। हाईकोर्ट ने कहा है कि पुलिस अधिकारी सिर्फ तारीफ, समय से पहले प्रमोशन और सोशल मीडिया पर वाहवाही के लिए अनावश्यक रूप से हथियार का इस्तेमाल करते हैं। कोर्ट ने राज्य सरकार और डीजीपी को पुलिस मैनुअल में जरूरी बदलाव करने और जवाबदेही सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। हाईकोर्ट ने साफ कहा कि पुलिसिंग हमेशा कानून के दायरे में रहकर ही होनी चाहिए।
यह आदेश जस्टिस जस्टिस अरुण कुमार देशवाल ने राजू उर्फ राजकुमार की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया। आरोपी के खिलाफ BNS की धाराओं 305(a), 331(4) और 317(2) के तहत मामला दर्ज था। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि पुलिस मुठभेड़ में आरोपी गंभीर रूप से घायल हुआ, जबकि किसी पुलिसकर्मी को चोट नहीं आई। इसी आधार पर कोर्ट ने मुठभेड़ में बल प्रयोग की आवश्यकता और उसकी अनुपातिकता पर सवाल उठाते हुए यह टिप्पणी की।
साल 1999 में एक सामाजिक संस्था 'पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज' यानी पीयूसीएल ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की थी। इस याचिका में साल 1995 से 1997 के बीच मुंबई पुलिस की ओर से किए गए एनकाउंटरों पर सवाल उठाए गए थे और इन मुठभेड़ों की निष्पक्ष जांच की मांग की गई थी।
इस याचिका पर वर्षों तक सुनवाई चलती रही। फर्जी एनकाउंटर की बढ़ती आशंकाओं को ध्यान में रखते हुए आखिरकार सितंबर 2014 में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश आरएम लोढ़ा और जस्टिस रोहिंटन फली नरीमन की पीठ ने इस मामले में एक अहम फैसला सुनाया। इसी फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस मुठभेड़ों को लेकर 16 बिंदुओं का एक विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किया, जो आज भी देशभर में हर पुलिस मुठभेड़ की जांच का आधार बना हुआ है।
साल 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस मुठभेड़ों को लेकर सख्त दिशा-निर्देश जारी किए थे…
एनकाउंटर शब्द का भारत के संविधान या किसी कानून में कहीं उल्लेख नहीं है। पुलिस और सुरक्षा बल जब आत्मरक्षा में या कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए किसी अपराधी के खिलाफ बल प्रयोग करते हैं, तो आमतौर पर उसे एनकाउंटर कहा जाता है। पुलिस को भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 34 से 44 के तहत राइट टू प्राइवेट डिफेंस (आत्मरक्षा का अधिकार) प्राप्त है।
हालांकि, कानून से परे जाकर किसी आरोपी या अपराधी के खिलाफ की गई कार्रवाई को अलग-अलग देशों में अलग नामों से जाना जाता है। उदाहरण के तौर पर अमेरिका में इसे Arbitrary Execution या Deliberate Killing कहा जाता है।
एनकाउंटर शब्द की उत्पत्ति को लेकर अलग-अलग मत हैं। एक मत के अनुसार, पंजाब में 1984 के दंगों के दौरान यह शब्द प्रचलन में आया। दूसरा मत यह है कि 1990 के दशक में मुंबई में संगठित अपराध पर अंकुश लगाने के लिए पुलिस ने बड़े पैमाने पर एनकाउंटर किए। इसके बाद पुलिस की एक विशेष टीम को ही "एनकाउंटर स्क्वॉड" कहा जाने लगा।