लखनऊ

यूपी पंचायत चुनाव: OBC आयोग का गठन से बीजेपी को फायदा होगा या नुकसान?

UP Panchayat Election: उत्तर प्रदेश पंचायत चुनाव आखिर कब होंगे? OBC आयोग गठन के बाद बढ़ी हलचल, जानिए क्यों 2027 विधानसभा चुनाव से जुड़ गया है पूरा मामला और क्या ग्राम प्रधानों का कार्यकाल बढ़ सकता है।

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May 21, 2026
उत्तर प्रदेश सरकार ने पंचायत चुनावों में ओबीसी आरक्षण देने के लिए एक विशेष पिछड़ा वर्ग (OBC) आयोग का गठन कर दिया है। PC: IANS

उत्तर प्रदेश सरकार ने पंचायत चुनावों में ओबीसी आरक्षण देने के लिए एक विशेष पिछड़ा वर्ग (OBC) आयोग का गठन कर दिया है। इस फैसले के बाद अब यह पूछा जा रहा है कि आखिर पंचायत चुनाव कब तक होंगे? आयोग को छह महीने में अपनी रिपोर्ट सौंपनी होगी, उसके बाद पंचायतों में ओबीसी आरक्षण पर अंतिम फैसला होगा। इसके बाद ही चुनाव की तारीख को लेकर कोई खबर सामने या सकती है।

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बड़ा राजनीतिक मुद्दा

योगी कैबिनेट ने इस हफ्ते की शुरूआत में ही आयोग के गठन को मंज़ूरी दी थी। इस आयोग की अध्यक्षता रिटायर्ड जस्टिस राम अवतार सिंह करेंगे। इसका मकसद पिछड़ी जातियों के प्रतिनिधित्व का अध्ययन करना और ग्रामीण स्थानीय निकायों के लिए आरक्षण के फ़ॉर्मूले सुझाना है। सरकार के इस फैसले के बाद जो मामला शुरुआत में महज एक प्रशासनिक प्रक्रिया लग रहा था, वह अब जातीय समीकरणों और 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों से पहले बीजेपी की रणनीति से जुड़ा एक राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मुद्दा बन गया है। आयोग को नवंबर 2026 तक अपनी रिपोर्ट सौंपनी होगी।

क्यों हुआ आयोग का गठन?

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार, स्थानीय निकाय चुनावों में ओबीसी आरक्षण देने से पहले राज्यों को ट्रिपल टेस्ट पूरा करना जरूरी है। साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होता है कि एससी, एसटी और ओबीसी का कुल आरक्षण 50% की सीमा से अधिक न जाए. इसलिए राज्य सरकार को एक समर्पित आयोग बनाकर अध्ययन करती है और उसी आधार पर आरक्षण तय होगा। सरकार का कहना है कि आयोग ग्राम पंचायत, ब्लॉक और जिला स्तर पर पिछड़े वर्ग की आबादी और उनके राजनीतिक प्रतिनिधित्व की जरूरत का आकलन करेगा। उसकी रिपोर्ट के आधार पर ही यह निर्धारित किया जाएगा कि कौन सी सीटें ओबीसी के लिए आरक्षित होंगी.

कब हो सकते हैं चुनाव?

पंचायत चुनाव अब कब होंगे, इसे लेकर कोई भी जानकारी सामने नहीं आई है। हालांकि, इतना जरूर है कि 2027 के विधानसभा चुनाव के बाद ही इसका शेड्यूल तय होगा। अभी केवल आयोग का गठन हुआ है, प्रशासनिक स्तर पर कई काम बाकी हैं। पूरे राज्य में जाति और पिछड़े वर्ग के प्रतिनिधित्व का सर्वे, आरक्षण रोस्टर तैयार करना, वार्डों का रोटेशन, ड्राफ़्ट लिस्ट जारी करना, आपत्तियों पर सुनवाई और राज्य चुनाव आयोग द्वारा अंतिम अधिसूचना जारी करना। जानकारों का कहना है कि भले ही आयोग अपनी रिपोर्ट छह महीने के अंदर जमा कर दे, फिर भी बाकी की प्रक्रिया 2026 के आखिर या 2027 की शुरुआत तक खिंच सकती है। लिहाजा, पंचायत चुनाव विधानसभा चुनाव के बाद ही होंगे।

कार्यकाल खत्म होने के बाद क्या?

अब सवाल यह है कि क्या ग्राम प्रधानों, जिला पंचायत अध्यक्षों और ब्लॉक प्रमुखों को कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी कामकाज जारी रखने की अनुमति मिल सकती है?  26 मई को मौजूदा ग्राम प्रधानों, जिला पंचायत अध्यक्षों और ब्लॉक प्रमुखों का कार्यकाल समाप्त होने वाला है। ऐसे में पंचायती राज विभाग की तरफ से शासन को एक प्रस्ताव भेजा गया है, जिसे मंजूरी मिल सकती है। क्योंकि सरकार चाहती है कि प्रशासनिक कामकाज में किसी तरह की बाधा न आए और ग्रामीण शासन की पूरी बागडोर नौकरशाहों के हाथों में न जाए।

बीजेपी के लिए लाभ या नुकसान?

पंचायत चुनाव में देरी करने से सरकार को आरक्षण से जुड़ी कानूनी पेचीदगियों को दूर करने में मदद मिल सकती है, लेकिन इससे राजनीतिक जोखिम भी पैदा होते हैं। उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनावों को अक्सर बड़े चुनावों से पहले हवा का रुख भाँपने के अवसर के तौर पर देखा जाता है। ये चुनाव जातिगत समीकरणों के साथ -साथ  बूथ-स्तर पर लोगों को जुटाने वाले नेटवर्क पर असर डालते हैं। जानकार बताते हैं कि 2022 के विधानसभा चुनावों से पहले, 2021 के पंचायत चुनावों ने BJP के खिलाफ ग्रामीण इलाकों में पनप रहे गुस्से को दर्शाया था, जिसे पार्टी बड़े चुनाव से पहले दूर करने में कामयाब रही। लेकिन इस बार उसके पास वो मौका नहीं होगा।

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Updated on:
21 May 2026 08:25 pm
Published on:
21 May 2026 08:02 pm
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