बसपा सुप्रीमो मायावती ने एक बड़ा राजनीतिक दांव चल दिया है, उन्हें उम्मीद है कि इस रणनीति से पार्टी को लोकसभा में अच्छे परिणाम मिलेंगे
लखनऊ. बसपा सुप्रीमो ने एक बड़ी राजनीतिक चाल चलते हुए राजद अध्यक्ष लालू यादव को मात दे दिया है। वे राज्यसभा नहीं जाना चाहतीं, इसलिए उन्होंने राजद नेता तेजस्वी यादव के प्रस्ताव को ठुकरा दिया है। उनके इस फैसले से राजद के नेताओं की किरकिरी हो रही है। बसपा प्रमुख मायावती के इस रुख को उनका एक बड़ा राजनीतिक दांव माना जा रहा है।
दरअसल, राज्यसभा चुनाव के सिलसिले में तेजस्वी यादव ने मायावती को फोन किया था। कभी आरजेडी अध्यक्ष लालू प्रसाद ने मायावती से वादा किया था कि वह उनको राज्यसभा भेजेंगें इसी सिलसिले में उनके पुत्र तेजस्वी ने मायावती को फोन किया था। अगस्त 2017 में मायावती ने राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया था जबकि सीट खाली नहीं था।
कुछ इस तरह हुई बात
25 फरवरी को बिहार के पूर्व डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव ने मायावती को फोन किया। उन्होंने कहा, मैं तेजस्वी बोल रहा हूं। पापा (लालू प्रसाद यादव) ने आपसे वादा किया था। सीट खाली हुई है, चुनाव की घोषणा हो चुकी है, आरजेडी अपना वादा निभाना चाहती है।
मायावती ने किया इनकार
मायावती ने पहले तो धन्यवाद किया। फिर तेजस्वी ने कहा कि संसद में लालू प्रसाद नहीं हैं, शरद यादव भी बाहर हो चुके हैं, ऐसे में जिस बात की आपको चिंता थी कि वंचितों की आवाज उठाने वाला कोई नहीं रहा, उसकी भरपाई आप चाहें तो की जा सकती है। लेकिन पूर्व की तरह एक बार फिर मायावती ने मना कर दिया। मायावती ने कहा कि लालू प्रसाद ने मेरे बारे में सोचा, आरजेडी ने मेरे बारे में इतना सोचा यह आप सबों का बड़प्पन है। लेकिन जब तक बीजेपी की सरकार है तब तक पार्लियामेंट नहीं जाऊंगी।
गठबंधन में बाधा डालने का आरोप
मायावती के इनकार के बाद सवाल उठ रहे हैं कि आखिर क्या मायावती आरजेडी के साथ सीधे तौर पर नाता जोडऩे से कतरा रही हैं? हालांकि मायावती पर कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद यह आरोप लगाया था कि वह बीजेपी को हराने के लिए गठबंधन में बाधा बन रही हैं। उन्होंने कहा था, 'यूपी असेंबली चुनाव से पहले हमने मायावती जी से मुलाकात की थी। तब मैं व्यक्तिगत रूप से भी उनसे मिलने गया था। हम चाहते थे कि एसपी, बीएसपी और कांग्रेस को मिलाकर एक अलायंस बने ताकि बीजेपी को हराया जा सके लेकिन वे (मायावती) तैयार नहीं हुईं।
संसद में सरकार को नहीं डाल सकती मुश्किल में
बसपा विधायकों के बूते मायावती राज्यसभा नहीं पहुंच सकतीं। वैसे भी मायावती जानती हैं कि संख्याबल में कम होने के कारण वे संसद के अंदर सरकार के लिए कोई मुश्किल खड़ी करने की स्थिति में नहीं हैं। लोकसभा में तो उनका कोई सांसद ही नहीं है जबकि राज्यसभा में भी महज तीन बीएसपी सांसद हैं। ऐसे में वे अगर दोबारा राज्यसभा में चली भी जाती हैं तो उन्हें अहम मसलों पर बोलने का बहुत ज्यादा मौका मिले, इसकी कोई गारंटी नहीं है।
दलितों के हित में कुर्बानी देने का संदेश
राज्यसभा से बाहर रहकर माया अपने कोर वोटर को बड़ा संदेश दे सकती हैं। माया के राज्यसभा की सीट छोडऩे से ये संदेश तो गया ही है कि बीएसपी सुप्रीमो को दलितों की परवाह है और उनके हक में आवाज उठाने से वह पीछे नहीं हटेंगी। साथ ही उसके लिए कोई भी कुर्बानी दे देंगी। माया का ये संदेश उन्हें अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव में फायदा दिला सकता है।
खेल सकती हैं विक्टिम कार्ड
मायावती राज्यसभा में न जाकर विक्टिम कार्ड भी खेल सकेंगी। वो सत्ता में रहने के दौरान विपक्ष की ओर से उठने वाले हर वार का सामना खुद को दलित की बेटी बताकर कराकर आई थीं। अब वे ये संदेश दे सकती हैं कि दलित की बेटी को परेशान किया जा रहा है। उसे राज्यसभा में बोलने नहीं दिया जाता और अब ये जनता के हाथ में है कि वो उन्हें लोकसभा भेजेगी या नहीं।
अपनी जीत दोहराने की कवायद
बीएसपी 2012 के विधानसभा चुनाव के बाद से लगातार घटती जा रही है। 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी जीरो पर सिमट गई। इसके बाद 2017 में हुए यूपी विधानसभा चुनाव में बीएसपी 80 सीटों से घटकर 19 पर आ गई। पार्टी के कई दिग्गज नेता या तो बाहर चले गए या बाहर कर दिए गए।
संजीवनी की तलाश
मायावती पहले जितनी आक्रामक नेता हुआ करती थीं, अब वह वैसा तेवर नहीं दिखा पा रही हैं। यूपी में ऊंची जातियों और मध्य जातियों के जिस संघर्ष की वजह से बीएसपी का उभार हुआ था। ये संघर्ष कम हुआ तो मायावती भी सियासी तौर पर कमजोर होती गईं। हालांकि योगी सरकार के आने के बाद सहारनपुर में दलित और राजपूतों के बीच हुए हिंसा और दलित अत्याचार के कई मामले सामने आए है। मायावती इन घटनाओं को अपने लिए संजीवनी की तरह देख रही हैं।
मध्यवर्गीय राजनीति पसंद नहीं
मायावती दलित समाज से आती हैं। सूबे के युवा दलित मतदाताओं को मायावती की मध्यमार्गीय दलित राजनीति पसंद नहीं है। एग्रेसिव दलित एजेंडा लेकर भीम आर्मी आगे बढ़ी। सहारनपुर घटना के मामले में भीम आर्मी के चीफ चंद्रशेखर रावण जेल में बंद हैं। ऐसे में मायावती फिलहाल राज्यसभा सीट के चक्कर में फंसकर खुद का सियासी वजूद खत्म होते नहीं देखना चाहतीं। यही वजह है कि उन्होंने वापस राज्यसभा जाने का ऑफर ठुकरा दिया है।