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53 साल बाद फिर गूंजा चिपको आंदोलन, जानिए कैसे उत्तराखंड के लोगों ने बचा ली 4,369 पेड़ों की जान

Chipko Movement History : उत्तराखंड में 4,369 पेड़ों को बचाने के लिए फिर शुरू हुआ 'चिपको आंदोलन'! जानिए 1974 में गौरा देवी और सुंदरलाल बहुगुणा द्वारा शुरू किए गए इस ऐतिहासिक आंदोलन का पूरा इतिहास और 2026 में इसके दोबारा गूंजने की असली वजह।
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Jul 20, 2026
Chipko Movement History
Chipko Movement History : देहरादून-ऋषिकेश मार्ग के चौड़ीकरण के लिए 4,369 पेड़ों की कटाई होनी थी, लेेकिन, लोगों ने अभी इन पेड़ों को कटने से बचा लिया, PC- Chatgpt

उत्तराखंड में देहरादून-ऋषिकेश मार्ग के चौड़ीकरण के लिए 4,369 पेड़ों को काटने की योजना बनाई गई थी। इसके विरोध में स्थानीय लोग, पर्यावरण कार्यकर्ता और छात्र पेड़ों से लिपट गए। लोगों ने 4,369 पेड़ों को कटने अभी कटने से बचा लिया। इस प्रदर्शन की तस्वीरें सामने आईं तो लोगों को 1973-74 का वह ऐतिहासिक आंदोलन याद आ गया, जिसने पूरी दुनिया को पर्यावरण संरक्षण का नया रास्ता दिखाया था- 'चिपको आंदोलन।' लगातार विरोध के बाद राज्य सरकार ने फिलहाल पेड़ों की कटाई पर रोक लगा दी है।

आखिर क्या है चिपको आंदोलन?

'चिपको' का अर्थ है- 'चिपक जाना'। इस आंदोलन में लोग पेड़ों से लिपट जाते थे ताकि लकड़ी ठेकेदार या वन विभाग के कर्मचारी उन्हें काट न सकें। यह दुनिया के सबसे प्रसिद्ध अहिंसक पर्यावरण आंदोलनों में गिना जाता है। इसका उद्देश्य सिर्फ पेड़ों को बचाना नहीं था, बल्कि जंगलों पर स्थानीय लोगों के अधिकार और पर्यावरण संरक्षण की लड़ाई भी था।

चिपको आंदोलन की शुरुआत क्यों हुई?

1970 के दशक में हिमालयी क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर जंगल काटे जा रहे थे। स्थानीय ग्रामीणों को अपने उपयोग के लिए लकड़ी तक नहीं मिलती थी, जबकि बड़ी कंपनियों को हजारों पेड़ काटने की अनुमति दी जा रही थी।

ग्रामीणों का कहना था कि जंगल सिर्फ लकड़ी का स्रोत नहीं हैं। इन्हीं जंगलों से पानी, चारा, ईंधन और खेती की सुरक्षा जुड़ी हुई है। लगातार हो रही कटाई से भूस्खलन, बाढ़ और पर्यावरणीय नुकसान बढ़ रहा था। इसी असंतोष ने आंदोलन का रूप लिया।

कब और कहां शुरू हुआ था चिपको आंदोलन?

चिपको आंदोलन की शुरुआत 1973 में तत्कालीन उत्तर प्रदेश (आज का उत्तराखंड) के चमोली जिले के मंडल गांव से मानी जाती है। मामला तब शुरू हुआ जब स्थानीय लोगों को पेड़ देने से मना कर दिया गया, लेकिन एक बाहरी कंपनी को सैकड़ों पेड़ काटने का ठेका दे दिया गया। इसका विरोध ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने किया। जब मजदूर पेड़ काटने पहुंचे तो गांव वालों ने उनका रास्ता रोक दिया और पेड़ों की रक्षा की।

गौरा देवी और रैणी गांव की ऐतिहासिक घटना

चिपको आंदोलन की सबसे प्रसिद्ध घटना 26 मार्च 1974 को चमोली जिले के रैणी (रेनी) गांव में हुई। जब गांव के अधिकांश पुरुषों को दूसरी जगह भेज दिया गया, तब ठेकेदारों के लोग जंगल में पेड़ काटने पहुंच गए। इसकी जानकारी गांव की महिला नेता गौरा देवी को मिली।

गौरा देवी 27 महिलाओं को लेकर जंगल पहुंचीं। उन्होंने लकड़हारों से कहा कि जंगल उनका मायका और जीवन हैं। जब बात नहीं बनी तो महिलाएं पेड़ों से चिपक गईं। पूरी रात उन्होंने जंगल की पहरेदारी की। आखिरकार ठेकेदारों को पीछे हटना पड़ा और पेड़ों की कटाई रुक गई। यही घटना चिपको आंदोलन का प्रतीक बन गई।

आंदोलन के प्रमुख चेहरे कौन थे?

गौरा देवी : रैणी गांव की महिला नेता, जिन्होंने महिलाओं के साथ मिलकर पेड़ों को बचाया। आज उन्हें "चिपको वूमन" के नाम से भी जाना जाता है।

चंडी प्रसाद भट्ट : दशोली ग्राम स्वराज मंडल के संस्थापक और आंदोलन के शुरुआती रणनीतिकारों में शामिल। उन्होंने स्थानीय लोगों को संगठित किया।

सुंदरलाल बहुगुणा : उन्होंने चिपको आंदोलन को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। जंगल बचाने के लिए लंबी पदयात्राएं कीं और पर्यावरण संरक्षण का संदेश फैलाया।

आंदोलन का असर क्या हुआ?

चिपको आंदोलन धीरे-धीरे पूरे हिमालयी क्षेत्र में फैल गया। इसका दबाव इतना बढ़ा कि सरकार को जंगल कटान की नीतियों पर पुनर्विचार करना पड़ा।

इस आंदोलन ने पहली बार यह सोच मजबूत की कि जंगलों को सिर्फ राजस्व का स्रोत नहीं, बल्कि पर्यावरण और समाज की जीवनरेखा माना जाना चाहिए। बाद में हिमालयी क्षेत्रों में व्यावसायिक कटान पर कई प्रतिबंध लगाए गए और पर्यावरण संरक्षण राष्ट्रीय बहस का विषय बन गया।

2026 में फिर क्यों याद आया चिपको आंदोलन?

इस महीने देहरादून-ऋषिकेश के बीच भानियावाला-रानीपोखरी क्षेत्र में सड़क चौड़ीकरण परियोजना के लिए 4,369 पेड़ों को काटने की तैयारी थी। लोगों ने इसका विरोध शुरू किया और कई प्रदर्शनकारियों ने पेड़ों को गले लगाकर कटाई रोकने की कोशिश की।

विरोध बढ़ने के बाद मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने पेड़ों की कटाई पर तत्काल रोक लगाने के निर्देश दिए और सभी पक्षों से बातचीत की बात कही। यही वजह है कि 53 साल पुराना चिपको आंदोलन एक बार फिर चर्चा में आ गया।

क्यों खास है यह आंदोलन?

चिपको आंदोलन सिर्फ पेड़ों को बचाने की कहानी नहीं है। यह उस सोच का प्रतीक है जिसमें विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने की बात कही गई। 1974 में गौरा देवी और पहाड़ की महिलाओं ने जो संदेश दिया था, वही संदेश आज भी उत्तराखंड के जंगलों में सुनाई देता है- 'जंगल बचेंगे, तभी जीवन बचेगा।'

आज जब हजारों लोग 4,369 पेड़ों को बचाने के लिए फिर पेड़ों से लिपट रहे हैं, तो यह सिर्फ एक विरोध नहीं, बल्कि चिपको आंदोलन की विरासत का नया अध्याय है।

Updated on:
20 Jul 2026 04:33 pm
Published on:
20 Jul 2026 04:33 pm