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मुहर उनकी, आवाज किसी और की, कैसे पंचायतों में महिला राज सिर्फ कागजों तक सिमटा

Gender equality in local governance : कागजों पर आरक्षण, लेकिन फैसले पति के! जानिए कैसे देश की पंचायतों में महिला राज सिर्फ दस्तखत तक सिमट कर रह गया है और 'सरपंच पति' प्रथा को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट व सरकार क्या कदम उठा रही है।
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Women reservation in Panchayati Raj

Women reservation in Panchayati Raj : पंचायत पत्नी की चला रहे पति।

Sarpanch Pati System : गांव की सरकार यानी पंचायत, यहीं से लोकतंत्र की सबसे निचली और सबसे जमीनी परत शुरू होती है। पिछले तीन दशकों में इस पंचायत की कुर्सियों पर महिलाओं की तादाद तेजी से बढ़ी है। आज देश की करीब 32 लाख 29 हज़ार निर्वाचित पंचायत सीटों में से लगभग आधी, करीब 46-47% महिलाओं के पास हैं। कागज पर यह भारत के लोकतंत्र की एक बड़ी उपलब्धि है। पर गांव-गांव घूमकर पूछा जाए तो एक अलग ही तस्वीर सामने आती है। कुर्सी महिला की है, मुहर और दस्तखत भी उन्हीं के, लेकिन फैसले कोई और लेता है…उसका पति, ससुर या बेटा। इसी को 'सरपंच पति' (कहीं प्रधान पति, कहीं मुखिया पति") कहा जाता है।

आखिर यह मामला है क्या?

सीधी भाषा में समझें: चुनाव महिला उम्मीदवार लड़ती है, प्रचार में उसका नाम और तस्वीर होती है, नतीजा आने पर वही जीतकर सरपंच बनती है। लेकिन जीत के बाद असली कामकाज, पंचायत की बैठकें, विकास कार्यों की मंज़ूरी, ठेके देना, सरकारी दफ्तरों में फाइलें लेकर जाना, अफसरों से बातचीत, यह सब घर के पुरुष सदस्य संभालने लगते हैं। महिला सरपंच का काम सिमटकर रह जाता है सिर्फ जरूरत पड़ने पर कागजों पर दस्तखत करने तक।

मध्य प्रदेश के देवास जिले की लखनाखेड़ी पंचायत इसका एक जीता-जागता उदाहरण है। यहां की निर्वाचित सरपंच बबीता विश्वकर्मा सिर्फ दस्तखत करती हैं, जबकि पंचायत का पूरा कामकाज उनके पति दिनेश पटेल संभालते हैं। ऐसे मामले किसी एक राज्य या जिले तक सीमित नहीं हैं। यूपी, बिहार, हरियाणा, राजस्थान, छत्तीसगढ़ से लेकर मध्य प्रदेश तक, यह 'प्रधान पति संस्कृति देशभर में मौजूद है। कई जगह तो 15 अगस्त को झंडारोहण जैसे सार्वजनिक कार्यक्रमों में भी निर्वाचित महिला की जगह उनके पति ही झंडा फहराते देखे गए हैं।

यह व्यवस्था चलती कैसे है

चुनाव से पहले ही परिवार में तय हो जाता है- 'सीट पत्नी के नाम, राज पति का'। पंचायत की बैठकों में महिला सरपंच मौजूद तो रहती हैं, लेकिन बोलना और फैसला लेना पति का काम होता है। ब्लॉक या जिला दफ्तर में फाइलें लेकर पति ही जाते हैं, और वक्त के साथ सरकारी अफसर भी सीधे पति से ही बात करने के आदी हो जाते हैं।

टेंडर, निर्माण कार्य और फंड आवंटन जैसे बड़े फैसलों में महिला सरपंच का नाम सिर्फ हस्ताक्षर तक सीमित रह जाता है। कई मामलों में तो महिला सरपंच को पंचायत के रजिस्टर, बजट या चल रही योजनाओं की जानकारी तक नहीं होती।

असली कहानियां, अलग-अलग राज्यों से

मध्य प्रदेश के भोपाल में हुए एक महिला सरपंच सम्मेलन में राज्यभर से आईं करीब 1000 महिला सरपंचों के अनुभव जुटाए गए थे। इनमें कई ने बताया कि वे पति या परिवार के दबाव में काम करती हैं, तो कई और ऐसी भी थीं जो खुद पूरी कुशलता से पंचायत चला रही थीं। यानी तस्वीर काली-सफेद नहीं, बल्कि मिली-जुली हैं।

हरियाणा से दो अलग मामले सामने आए। कैथल जिले के जियोंग गांव में शपथ ग्रहण समारोह के दौरान निर्वाचित महिला सरपंच की जगह उनके पति ने ही शपथ ले ली। चंदलाना गांव में कुछ पंचों के परिवारवालों के साथ भी ऐसा ही हुआ। मामला सामने आने पर तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर संगीता तेतरवाल ने अफसरों को सख्त निर्देश दिया कि किसी भी आधिकारिक बैठक में महिला प्रतिनिधि की जगह कोई 'प्रॉक्सी' शामिल न हो। इसी राज्य के मेहम इलाके में सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट मुकुंद तंवर ने तो एक कदम आगे जाकर सार्वजनिक बयान में यह साफ कर दिया कि महिला पदाधिकारियों की जगह उनके पति, ससुर या परिवार के पुरुष सदस्यों का प्रतिनिधित्व करना सीधे-सीधे गैरकानूनी है।

राजस्थान की पूर्व पंचायत प्रतिनिधि सरिता गैना की बात इस मुद्दे को एक उम्मीद भरा एंगल भी देती है। उनके मुताबिक, शुरुआती दौर में 'पति सरपंच, पति प्रधान, पति जिला प्रमुख' जैसी चुनौतियां आम थीं, क्योंकि उस वक्त ज़्यादातर निर्वाचित महिलाएं पढ़ी-लिखी नहीं थीं। लेकिन, अब शिक्षित महिलाओं की संख्या बढ़ने के साथ यह तस्वीर काफी हद तक बदल चुकी है।

पंजाब के देहलों गांव की सरपंच बलजिंदर कौर की कहानी भी इसी उम्मीद को आगे बढ़ाती है। रिकॉर्ड मार्जिन से चुनाव जीतने वाली बलजिंदर कहती हैं कि वे लैंगिक भेदभाव में यकीन नहीं रखतीं और पूरे गांव महिला, पुरुष, बुज़ुर्ग, बच्चे, सबके लिए काम करना चाहती हैं। यह दिखाता है कि आरक्षित सीट पर जीतकर भी महिला नेतृत्व उतना ही असरदार हो सकता है, बशर्ते इच्छाशक्ति और सहयोग दोनों मिलें।

यह शुरू कैसे हुआ- आरक्षण की कहानी

महिलाओं को पंचायतों में लाने की कोशिश दशकों पुरानी है। 1974 में एक समिति ने तो यहां तक सुझाव दिया था कि महिलाओं की अलग पंचायतें ही बना दी जाएं। 1988 के नेशनल पर्सपेक्टिव प्लान फॉर विमेन ने ग्राम पंचायत से लेकर ज़िला परिषद तक 30% सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने की सिफारिश की। इसका असली नतीजा 1992 में सामने आया, जब 73वें संविधान संशोधन के ज़रिए पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण अनिवार्य कर दिया गया। बाद में मध्य प्रदेश, राजस्थान, बिहार और आंध्र प्रदेश जैसे कई राज्यों ने इसे बढ़ाकर 50% तक कर दिया।

मकसद बिल्कुल साफ था गांव की सत्ता में महिलाओं की सीधी और असली भागीदारी। लेकिन कानून से सिर्फ सीट महिला के नाम हो सकी, समाज की सदियों पुरानी सोच नहीं बदली और यहीं से सरपंच पति जैसी व्यवस्था ने जन्म लिया।

आखिर ऐसा होता क्यों है?

इसके पीछे कई वजहें एक साथ काम करती हैं। सबसे बड़ी वजह है पितृसत्तात्मक सोच, गांव-कस्बों में आज भी यह धारणा गहरी है कि सार्वजनिक जीवन और राजनीति असल में 'पुरुषों का काम' है। दूसरी वजह है शिक्षा और जानकारी की कमी कई बार महिला उम्मीदवार को सिर्फ आरक्षण की शर्त पूरी करने के लिए खड़ा कर दिया जाता है, बिना उसे प्रशासनिक प्रक्रिया की कोई जानकारी दिए। तीसरी वजह सामाजिक दबाव और सुरक्षा की चिंता है। परिवार अक्सर यह तर्क देते हैं कि महिला के लिए बाहर आना-जाना और अफसरों से मिलना असुरक्षित या 'अनुचित' है। और चौथी, शायद सबसे चालाक वजह है राजनीतिक सुविधा कई बार पति खुद चुनाव लड़ना चाहते हैं, लेकिन सीट महिला के लिए आरक्षित होने पर वे पत्नी को आगे कर देते हैं और खुद पर्दे के पीछे से सत्ता चलाते रहते हैं।

इसका असर कितना गहरा है

इस व्यवस्था का सबसे बड़ा नुकसान है लोकतंत्र का खोखला हो जाना। संविधान की जो मंशा असली महिला नेतृत्व लाने की थी, वह सिर्फ कागज पर रह जाती है। इससे एक जवाबदेही का संकट भी खड़ा होता है। कानूनन जिम्मेदारी निर्वाचित महिला सरपंच की ही होती है, भले फैसला किसी और ने लिया हो, तो गड़बड़ी होने पर जवाबदेह वही ठहराई जाती है। बार-बार दरकिनार किए जाने से महिलाओं का आत्मविश्वास और राजनीतिक क्षमता भी प्रभावित होती है, जिससे आगे चलकर वे राजनीति में और आगे बढ़ने से हतोत्साहित हो जाती हैं।

लेकिन यह भी सच है कि यह कहानी सिर्फ एकतरफा नहीं है। आज कई महिला सरपंच खुद पढ़ी-लिखी हैं और बड़ी कुशलता से अपनी पंचायतें चला रही हैं। यह बदलाव भी उतना ही असली है, और यही उम्मीद की किरण भी है।

सरकार और अदालत तक पहुंचा मामला

यह मुद्दा सिर्फ मीडिया रिपोर्टों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अदालत और संसद तक पहुंच चुका है। 2023 में सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर हुई, जिसमें आरोप था कि महिला पंचायत प्रतिनिधियों की शक्तियों का उनके पतियों या अन्य पुरुष रिश्तेदारों द्वारा दुरुपयोग किया जा रहा है। कोर्ट के आदेश पर पंचायती राज मंत्रालय ने पूर्व खान सचिव सुशील कुमार की अगुवाई में एक कमेटी बनाई। इस कमेटी ने एक दर्जन से ज़्यादा राज्यों का दौरा कर, महिला प्रतिनिधियों से सीधे बातचीत कर, फरवरी 2025 में अपनी रिपोर्ट मंत्रालय को सौंप दी।

कमेटी ने कई अहम सिफारिशें कीं। महिला प्रतिनिधियों के कामकाज में पति या पुरुष रिश्तेदारों के दखल पर कठोर दंड का प्रावधान, निगरानी के लिए एक महिला लोकपाल की नियुक्ति, ग्राम सभा में सार्वजनिक रूप से शपथ दिलाना, महिला पंचायत नेताओं का अलग संगठन बनाना, कानूनी सलाह व ट्रेनिंग के लिए जेंडर रिसोर्स सेंटर, स्थानीय भाषा में ट्रेनिंग की सुविधा, पंचायत बैठकों की वीडियो रिकॉर्डिंग अनिवार्य करना, और महिला प्रतिनिधियों की मदद के लिए AI व WhatsApp जैसे डिजिटल टूल्स का इस्तेमाल।

संसद में भी यह सवाल उठ चुका है। राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने सरकार से सीधे पूछा था कि क्या 'सरपंच पति' जैसी प्रथा वाकई मौजूद है, और इसे खत्म करने के लिए सरकार क्या ठोस कदम उठा रही है।

'सरपंच पति' सिस्टम असल में यह याद दिलाता है कि सिर्फ कानून बना देने या आरक्षण दे देने से बराबरी नहीं आती। जब तक समाज की सोच नहीं बदलती, तब तक कुर्सी पर बैठी महिला भी सिर्फ एक चेहरा बनकर रह सकती है। लेकिन कई राज्यों के उदाहरण यह भी दिखाते हैं कि शिक्षा, जागरूकता और सही सहयोग मिलने पर यही महिलाएं असल में अपनी पंचायतें कुशलता से चला भी सकती हैं।