
भारत में सर्पदंश (Snakebite) एक गंभीर समस्या है, जिसे विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने उपेक्षित उष्णकटिबंधीय बीमारी (Neglected Tropical Disease - NTD) का दर्जा दिया हुआ है। Cghr.org की 'मिलियन डेथ स्टडी' और WHO के अनुमानों के अनुसार, दुनिया भर में सांप काटने से होने वाली मौतों में से लगभग आधी मौतें (सालाना 45,000 से 58,000 के बीच) अकेले भारत में होती हैं।
शोधकर्ता के नजरिए से, मौत का कारण केवल सांप का जहर नहीं है, बल्कि यह एक बहुआयामी समस्या है जिसमें जहर की पैथोफिजियोलॉजी (Pathophysiology) से लेकर स्वास्थ्य सेवा प्रणाली की कमियां तक शामिल हैं। आइए, इसे वैज्ञानिक और व्यावहारिक दोनों संदर्भों में समझते हैं।
भारत में सांपों की 300 से अधिक प्रजातियां हैं, लेकिन 90% से अधिक मौतें केवल चार विषैले सांपों के कारण होती हैं। भारत में बनने वाला एंटी-वेनम भी विशेष रूप से इन्हीं चार सांपों के जहर को बेअसर करने के लिए बनाया जाता है:
सांप का जहर वास्तव में प्रोटीन, पेप्टाइड्स और एंजाइम्स का एक जटिल कॉकटेल है। मौत की पैथोफिजियोलॉजी इस बात पर निर्भर करती है कि जहर न्यूरोटॉक्सिक है या हीमोटॉक्सिक।
1. न्यूरोटॉक्सिक प्रभाव (कोबरा और करैत)
यह जहर सीधे नर्वस सिस्टम (तंत्रिका तंत्र) पर हमला करता है।
मैकेनिज्म: जहर के अणु न्यूरोमस्कुलर जंक्शन (तंत्रिका और मांसपेशियों के मिलन बिंदु) पर रिसेप्टर्स को ब्लॉक कर देते हैं। इससे मस्तिष्क से मांसपेशियों तक जाने वाले संकेत कट जाते हैं।
मौत का कारण: इसके कारण शरीर में लकवा (Paralysis) मार जाता है। जब यह लकवा फेफड़ों को चलाने वाली मांसपेशी (Diaphragm) तक पहुंचता है, तो पीड़ित सांस नहीं ले पाता। अंततः रेस्पिरेटरी फेलियर (श्वसन विफलता) और ऑक्सीजन की कमी (Hypoxia) के कारण मौत हो जाती है।
2. हीमोटॉक्सिक प्रभाव (रसेल वाइपर और सॉ-स्केल्ड वाइपर)
यह जहर रक्त (Blood) और ऊतकों (Tissues) पर हमला करता है।
मैकेनिज्म: यह एंजाइम रक्त के थक्के जमने की प्रक्रिया को अनियंत्रित कर देते हैं (Venom-Induced Consumptive Coagulopathy - VICC)। शरीर के सारे क्लॉटिंग फैक्टर खत्म हो जाते हैं, जिससे खून पानी की तरह पतला हो जाता है।
मौत का कारण: शरीर के अंदरूनी अंगों (जैसे मस्तिष्क, पेट) में भारी रक्तस्राव (Internal Bleeding) होता है। इसके अलावा, जहर के कारण लाल रक्त कोशिकाएं टूटने लगती हैं, जिससे किडनी की नलिकाएं ब्लॉक हो जाती हैं और एक्यूट किडनी इंजरी (AKI) या मल्टी-ऑर्गन फेलियर से मौत होती है।
मेडिकल साइंस में सांप काटने के बाद के शुरुआती 60 मिनट को 'गोल्डन आवर' कहा जाता है। जहर शरीर में प्रवेश करने के बाद तेजी से रिसेप्टर्स और रक्तप्रवाह में फैलने लगता है।
यदि इस एक घंटे के भीतर मरीज को सही मेडिकल सहायता (एंटी-वेनम) मिल जाए, तो जहर को ऊतकों या नर्वस सिस्टम के रिसेप्टर्स के साथ स्थायी रूप से बंधने (Irreversible binding) से रोका जा सकता है।
गोल्डन आवर पार होने के बाद, भले ही एंटी-वेनम दे दिया जाए, जो नुकसान नर्व्स या किडनी को हो चुका है, उसे पलटना बहुत मुश्किल होता है और वेंटिलेटर या डायलिसिस की आवश्यकता पड़ सकती है।
भारत में पॉलीवैलेंट एंटी-स्नेक वेनम (Polyvalent ASV) का उपयोग किया जाता है।
यह कैसे बनता है: घोड़ों को 'बिग फोर' सांपों के जहर की सुरक्षित और थोड़ी मात्रा देकर उनके शरीर में एंटीबॉडीज (Antibodies) विकसित की जाती हैं। फिर घोड़ों के रक्त से इन एंटीबॉडीज को अलग करके इंसान के लिए जीवन रक्षक दवा बनाई जाती है।
यह कैसे काम करता है: जब इसे पीड़ित के खून में चढ़ाया जाता है, तो यह एंटीबॉडीज शरीर में घूम रहे मुक्त जहर के अणुओं को पकड़ लेती हैं और उन्हें बेअसर कर देती हैं।
नोट: एंटी-वेनम केवल रक्त में मौजूद मुक्त जहर पर काम करता है। जो जहर पहले ही रिसेप्टर्स से जुड़ चुका है, उसे एंटी-वेनम नहीं हटा सकता। इसीलिए समय (Time) सबसे महत्वपूर्ण फैक्टर है।
क्लिनीकल कारणों के अलावा, भारत में मौतों का आंकड़ा अधिक होने के पीछे कुछ गंभीर व्यवस्थागत कारण हैं:
अंधविश्वास और झाड़-फूंक: ग्रामीण इलाकों में आज भी पीड़ित को अस्पताल ले जाने के बजाय तांत्रिकों या ओझाओं के पास ले जाया जाता है, जिससे अमूल्य 'गोल्डन आवर' बर्बाद हो जाता है।
PHC में सुविधाओं का अभाव: कई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (Primary Health Centres) में एंटी-वेनम का स्टॉक नहीं होता, या यदि मरीज को रेस्पिरेटरी फेलियर हो रहा हो तो वहां वेंटिलेटर की सुविधा नहीं होती।
देरी से परिवहन: खेतों या दूरदराज के इलाकों से अस्पताल तक पहुंचने में ही कई घंटे लग जाते हैं।
"देरी" ना करें। यह देरी किसी भी स्तर पर नहीं होनी चाहिए। अंधविश्वास और झाड़-फूंक में समय ना गंवाए, एम्बुलेंस नहीं है तो बाइक-कार या जो भी हो उससे अस्पताल के लिए निकले, दवाई नहीं है तो दूसरे अस्पताल के लिए फौरन चल पड़े। क्योंकि, सांप के काटने के बाद 1 घंटा सबसे अहम है। इसलिए, जान बचाने के लिए देरी नहीं करने का मूलमंत्र याद रखिए।