
मंडला. जिला प्रशासन द्वारा जिले के जलस्त्रोतों का जीर्णोद्वार कराया जा रहा है। मनरेगा तथा विभिन्न योजना के तहत कार्य किए जा रहे हैं। कुछ कार्य पूर्ण हो गए हैं तो कुछ का कार्य जारी है। वर्षों पुराने इन जलस्त्रोतों के जीर्णोद्वार से जल अभाव से बचा सकता है। पुराने समय से ही जिले में कुएं, तालाब, बावडिय़ां और झिरिया ही पानी के मुख्य स्रोत रहे हैं। स्थानों के नामों में ताल, तलाई, सागर आदि का होना वहां जलस्रोत होने का ही संकेत है। ऐसा ही गोंड़वाना साम्राज्य के पुरातत्व धरोहर गढ़ी झिरिया है। विकासखंड नैनपुर के ग्राम पंचायत झिरिया में स्थित झिरिया क्षेत्र की पहचान है। जिसे देखने आसपास क्षेत्र से लोग पहुंचते हैं। पिंडरई रोड पर 25 किलोमीटर दूर स्थिति झिरिया गांव में एक विशाल बावड़ी है। जो गोड़ शासक द्वारा कराए गए निर्माण की पहचान है। इसके ऊपर रहने के लिए कमरे भी बने हुए हैं। गौड़ साम्राज्य के दौरान कुंए, बावडिय़ां, झिरिया और तालाब ही पानी के मुख्य स्रोत रहे हैं। इसी स्थान के नाम पर गांव का नाम भी झिरिया पड़ गया। पुरात्व विभाग द्वारा २०१० में इसका जीर्णोद्वार किया गया था जिसके बाद से समय-समय पर सफाई भी की जाती है। लेकिन वर्तमान में झिरिया के आस-पास झाडिय़ां उग आई साथ झिरिया में भरने वाले पानी को भी वर्षों से अलग नहीं किया गया। जिससे पानी गंदा हो चुका। हालांकि लोगों द्वारा अब इस पानी का उपयोग तो नहीं किया जाता लेकिन गंदे पानी भरे रहने से मच्छरों के लार्वा पनप रहे हैं। स्थानीय लोगों को कहना है कि गौड़ शासन के समय की झिरिया प्रचार-प्रसार के आभाव में भी अपनी पहचान खो रहा है। समुचित प्रचार किया जाए तो पर्यटक यहां आकर गौड़ शासन के इतिहास से रू-ब-रू हो सकते हैं।
गोंगपा के संभागीय उपाध्यक्ष देवेन्द्र मरावी ने बताया कि बावड़ी में ही बीहर माता की मुर्ति स्थापित की गई है जो लोगों के लिए आस्था केन्द्र भी है। प्रतिवर्ष नवरात्री के समय श्रद्धालुओं की बड़ी तदाद दर्शन के लिए पहुंचती हैं। लोगों का मानना है कि यहां जो भी मनोकमना मांगी जाती है जल्द ही पूरी हो जाती है।