
Mahalaxmi Temple Dress Booking 2058: दीपावली पर हर कोई मां लक्ष्मी से धन-धान्य की मनोकामना कर रहा है और अपने परिवार की सुख-समृद्धि के लिए प्रार्थना कर रहा है। इसी बीच हम आपको मध्यप्रदेश के एक ऐसा मंदिर के बारे में बता रहे हैं जहां मां लक्ष्मी को पोशाक अर्पित करने की अनूठी परंपरा है। आपको जानकर हैरानी होगी कि इस मंदिर में मां लक्ष्मी को पोशाक अर्पित करने के लिए एडवांश में वर्ष 2058 तक की बुकिंग हो चुकी है। जिस मंदिर की हम बात कर रहे हैं वो है मंदसौर जिले में के सीतामऊ में स्थित प्राचीन महालक्ष्मी मंदिर। ऐसे में अगर आज कोई भक्त मां लक्ष्मी को पोशाक अर्पित करने की बुकिंग करता है तो उसे 38 साल का इंतजार करना होगा।
सीतामऊ के इस प्राचीन महालक्ष्मी मंदिर में दीपावली का पर्व केवल दीपों की रोशनी और मां की आराधना तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यहां सदियों से चली आ रही धार्मिक परंपरा के निर्वहन का भी विशेष अवसर होता है। मान्यता है कि दीपावली के दिन गोधूलि बेला में मां महालक्ष्मी को पोशाक अर्पित करने से भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं। इसी विश्वास के साथ दूर-दूर से श्रद्धालु माता के दरबार में पहुंचते हैं और अपनी बारी आने पर विधि-विधान से पोशाक अर्पित करते हैं। मंदिर की विशेषता यह है कि पोशाक अर्पित करने की बुकिंग भी दीपावली के दिन, उसी गोधूलि बेला में की जाती है। जिस समय वर्तमान वर्ष के लिए निर्धारित भक्त मां को पोशाक अर्पित करते हैं, उसी समय आगामी वर्षों के लिए भी श्रद्धालुओं के नाम दर्ज किए जाते हैं।
इस वर्ष दीपावली पर मां महालक्ष्मी को पोशाक अर्पित करने का अवसर मुंबई के आभूषण कारोबारी हरिनारायण उपाध्याय को प्राप्त हुआ। उनके लिए यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि वर्षों से संजोई गई आस्था के पूर्ण होने का अवसर है। मां के दरबार में पोशाक अर्पित करने के लिए उन्हें 12 साल तक अपनी बारी का इंतजार करना पड़ा। दीपावली पर जब गोधूलि बेला में मां महालक्ष्मी का विशेष श्रृंगार किया जाता है और पोशाक अर्पित करने की परंपरा निभाई जाती है, तब इस क्षण के साक्षी बनने का सौभाग्य भी निर्धारित भक्त को ही मिलता है। उपाध्याय के लिए यह अवसर वर्षों की प्रतीक्षा के बाद आया है। मंदिर की परंपरा के अनुसार निर्धारित समय पर पोशाक अर्पित करने का धार्मिक महत्व है। यही वजह है कि श्रद्धालु अपनी बारी आने तक इंतजार करते हैं और निर्धारित वर्ष में ही इस परंपरा का निर्वहन करते हैं।
मंदिर की इस व्यवस्था में आस्था के साथ धैर्य का भी अनूठा संगम दिखाई देता है। सामान्यत: भक्त मंदिरों में तत्काल पूजा-अर्चना और शृंगार की सेवा करने की इच्छा रखते हैं, लेकिन सीतामऊ के महालक्ष्मी मंदिर में भक्त अपनी बारी के लिए वर्षों तक प्रतीक्षा करते हैं। यहां पोशाक अर्पित करने का अवसर मिलना अपने आप में विशेष सौभाग्य माना जाता है।
महालक्ष्मी मंदिर की विशेषता केवल पोशाक अर्पित करने की परंपरा तक सीमित नहीं है। इस प्राचीन मंदिर को लेकर क्षेत्र में एक रोचक धार्मिक मान्यता भी प्रचलित है। मंदिर के पुजारी प्रमोद मोड़ के अनुसार, जनश्रुति है कि प्राचीन समय में कोई साधक आकाश मार्ग से तीन मंदिरों को उड़ाकर ले जा रहा था। उस समय क्षेत्र में तपस्या कर रहे एक साधु ने अपनी तपस्या की शक्ति से उन मंदिरों को वहीं उतार लिया। मान्यता के अनुसार, जिन तीन मंदिरों को साधु ने अपनी शक्ति से यहां स्थापित कराया था, उनमें सीतामऊ का यह महालक्ष्मी मंदिर, राधा बावड़ी तथा नादिया बावड़ी स्थित हनुमान मंदिर शामिल हैं। क्षेत्र में इन तीनों मंदिरों को लेकर यह कथा आज भी श्रद्धा के साथ सुनाई जाती है। इन मंदिरों की एक और खासियत भी बताई जाती है। तीनों मंदिरों के आकार, बनावट और स्थापत्य शैली में समानता दिखाई देती है। मंदिरों की यह एकरूपता भी इन्हें अन्य धार्मिक स्थलों से अलग पहचान देती है।