
मथुरा। ब्रज का कण कण भगवान श्रीकृष्ण को समाहित किए हुए हैं। यहां हर स्थान पर आपको कृष्ण की किसी न किसी लीला का वर्णन मिल ही जाएगा। शरद पूर्णिमा के मौके पर हम आपको ब्रज की एक ऐसी जगह से परिचित कराएंगे, जिसके बारे में आपने शायद ही सुना हो। हम बात कर रहे हैं, गोवर्धन पर्वत के पास बसे पारसोली गांव की। कहा जाता है कि आज से करीब 5200 वर्ष पूर्व शरद पूर्णिमा के दिन चांदनी रात में भगवान कृष्ण ने यहां सूर श्याम सरोवर पर अपनी गोपियों के साथ महारास किया था।
महारास देखने को ठहर गया था चंद्रमा
मथुरा से करीब 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित गोवर्धन धाम से करीब दो किलोमीटर सौख गांव की तरफ चलते हुए रास्ते में सूर श्याम चंद्र सरोवर दिखायी देता है। बेहद प्राचीन इस सरोवर को लेकर मान्यता है कि यहां भगवान श्रीकृष्ण ने महारास किया था। मान्यता है कि यहां कृष्ण अपने सखाओं के साथ आए और मुरली बजाने लगे। मुरली की धुन सुनकर सभी गोपियां अपने काम को छोड़कर दौड़ी चली आईं। हर कोई गोपी चाहती थी कि इस महारास में वह भगवान श्रीकृष्ण के साथ नृत्य करे। जब एक-एक गोपी ने भगवान श्रीकृष्ण से आकर अपनी मन की बात कही तो भगवान श्रीकृष्ण ने उनकी इस इच्छा को पूरा करने के लिए सभी के साथ नृत्य किया। इस सरोवर के पास मौजूद हर गोपी के साथ भगवान श्रीकृष्ण एक ही समय पर नृत्य करते नजर आ रहे थे। इस महारास को देखने के लिए चंद्रमा ने अपनी गति को स्थिर कर दिया था। महारास में चंद्रमा इतना खो गया कि 6 महीने तक भोर नहीं हुई। यह महारास 6 महीने तक लगातार चलता रहा।
भगवान शिव को लौटा दिया
भगवान श्रीकृष्ण के महारास को देखने के लिए भगवान शिव भी स्वयं यहां आए, लेकिन पुरुष होने की वजह से गोपियों ने भगवान शिव को दरवाजे पर ही रोक दिया। उन्हें यह कहकर लौटा दिया गया कि यहां सिर्फ गोपियां ही इस महारास में सम्मिलित हो सकती हैं। भगवान शिव बड़े व्याकुल हुए और इस अद्भुत पल को देखने के लिए उन्होंने एक सखी का रूप धारण कर लिया और वहां पहुंच गए। कुछ पल बाद जब गोपियों को पता चला कि भगवान शिव ने गोपी का रूप धारण कर महारास में आ गए है। भगवान शिव का यही रूप गोपेश्वर कहलाया। वहीं बलदाउ जब इस महारास में शामिल होते हैं तो गोपियां उन्हें पहचानकर पकड़ने के लिए जाती हैं, तब वे भागकर सिंह का रूप लेते हैं और दूर से नृत्य देखते हैं। सूर्य श्याम सरोवर पर आज भी भगवान श्री कृष्ण के महाराज का दृश्य दिखाई देता है ।
ये है मान्यता
इस बारे में पंडित पूर्ण कौशिक ने बताया कि छह महीने में चंद्रमा की शीतलता से जो घनीभूत रस धरती पर गिरा, वही रस एकत्रित होकर सरोवर बन गया। तब से इस सरोवर का नाम चंद्र सरोवर पड़ गया। पंडित पूर्ण कौशिक बताते हैं कि इस सरोवर में आचमन करने से भगवान का आशीर्वाद प्राप्त होता है। अगर कोई व्यक्ति इस चंद्र सरोवर में स्नान करता है उसकी सारी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं।