मेरठ से भड़की थी क्रांति की पहली चिंगारी मेरठ से दिल्ली तक बिछ गई थी अंग्रेजों की लाशें गदर के 162 साल पुराने इतिहास को समेटे है मेरठ
मेरठ। वह दिन था 10 मई 1857 का। मेरठ के काली पल्टन जिसे आज औघड़नाथ मंदिर के नाम से जानते हैं। वहां पर आज के ही दिन एक भारतीय फौजी ने अंग्रेज अधिकारी को गोली से उड़ा दिया था। मेरठ संग्रहालय अधीक्षक डीके मौर्या ने बताया कि एक फकीर भारतीय सेना और आम जनता के बीच आजादी की चिंगारी फूंकने का काम किया करते थे। ये फकीर बाबा कौन थे किसी को नहीं पता, लेकिन वे औघड़नाथ मंदिर में ही वास करते थे।
इसलिए काली पल्टन दिया था नाम
औघड़नाथ मंदिर अंग्रेजों की सैनिक छावनी काली पल्टन के पास था। काली पल्टन में चूंकि अधिकांश भारतीय सैनिक थे, इसलिए इस छावनी का नाम ही काली पल्टन रख दिया गया था। 10 मई 1857 का वह दिन भारतीय इतिहास में स्वर्णिम इतिहास से लिखा गया। जब फकीर की मेहनत रंग लाई। यह रविवार का दिन था। भारतीय सैनिकों को परेड ग्राउंड में बुलाया गया। रविवार को अंग्रेज सैनिकों और अधिकारियों का अवकाश होता था। भारतीय सैनिकों को जैसे ही कारतूस दांत से निकालने के लिए कहा गया, उन्होंने मना कर दिया। इसके बाद एक भारतीय सैनिक ने अंग्रेज अधिकारी पर गोली चला दी। इसके बाद तो काली पल्टन गोरों पर टूट पड़ी। गर्मी की दोपहर होने के कारण सभी अंग्रेज अधिकारी अपने बंगले में थे। काली पल्टन के सैनिकों ने अंग्रेज अधिकारियों के बंगलों पर हमला कर दिया। जो भी मिला उसको मौत के घाट उतार दिया। कुछ अंग्रेज अधिकारी अपने परिवार को बचाने के लिए घर के भीतर छुप गए तो उनके बंगले में आग लगा दी गई। मौर्या ने संग्रहालय में लगी भित्तियों के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि ये सभी 10 मई 1857 के गदर को ही दर्शाती हैं।
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