कैराना के लिटमस टेस्ट में खरा उतरा गठबंधन, भाजपा फेल
मेरठ। पश्चिम उप्र का भी अपना अलग मिजाज रहा है। यहां के मतदाताओं ने कभी किसी भी दल को इस भ्रम में नहीं रहने दिया कि वे इस क्षेत्र को अपनी राजनैतिक विरासत मान बैठे। अजित सिंह ने ऐसा किया तो उन्हें इस क्षेत्र की जनता ने राजनीतिक वनवास तक दे दिया और वे विधानसभा और लोकसभा के लिए मोहताज हो गए, लेकिन कैराना के लिटमस टेस्ट में उनका गठबंधन रूपी फार्मूला खरा उतरा है। मुज़फ्फ़रनगर दंगे के बाद हुए पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा को यहां ज़बरदस्त कामयाबी मिली थी। कैराना उपचुनाव में पुरानी कहानी दोहराने के लालच में भाजपा के कुछ नेताओं ने कोशिश तो पूरी की, लेकिन हिंदू कार्ड नहीं चला। शायद उनमें दिवंगत हुकुम सिंह जैसी सोच और कैराना की नब्ज पकड़ने की राजनीतिक सोच का अकाल था।
2019 में जाट चौंकाएंगे परिणाम
इस उपचुनाव से राजनीतिक हवा का रूख कुछ-कुछ बदला सा लगने लगा है। जाट वापस अपनी बिरादरी यानी चौधरी अजित सिंह की ओर घूम गया है। अगर ऐसा हुआ तो पश्चिम की अधिकांश सीटों के चुनाव परिणाम 2019 में चौंकाने वाले साबित होगे। राजनीतिक लिटमस टेस्ट’वाली जगह मानी जाने वाली शामली ज़िले की कैराना विधानसभा, जहां मुसलमानों के डर से हिंदुओं के पलायन का मुद्दा भाजपा उठाती रही है। इस मुद्दे के पैरोकार भाजपा के सांसद हुकुम सिंह की बेटी मृगांका सिंह यहां उम्मीदवार रही, लेकिन मृगांका सिंह के लिए यह कैराना हार कोई पहली हार नहीं है इससे पहले भी वह विधानसभा चुनाव हार चुकी हैं। चुनाव हारने के बाद उन्होंने कभी इस क्षेत्र में आकर नहीं देखा। जबकि अगर उन्हें पिता की विरासत सहेजकर रखनी थी, तो कैराना को अपनी राजनैतिक जमीन बनाती, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। राजनैतिक विश्लेषक और चौधरी चरण सिंह विवि के डा. संजीव शर्मा के मुताबिक पश्चिम उप्र में वोटों का भूगोल काफी कुछ यहां की आबोहवा पर निर्भर रहता है। यह पल-पल बदलता रहता है।