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सुप्रीम कोर्ट ने की सख्ती तो सोशल मीडिया निगरानी के फैसले पर केंद्र सरकार हुई पीछे

सोशल मीडिया मॉनिटरिंग हब बनाने के केंद्र सरकार के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती को देखने के बाद सरकार ने इसे लेकर अपने कदम पीछे खींच लिए हैं।
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Updated: 3 Aug 2018, 2:34 PM IST
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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद केंद्र सरकार ने सोशल मीडिया पर निगरानी के लिए सोशल मीडिया हब बनाने के अपने फैसले से हाथ खींच लिए हैं। बीती 13 जुलाई को हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के इस फैसले को 'मॉनिटरिंग स्टेट' बनाने जैसा कदम बताया था। सर्वोच्च अदालत का कहना था कि सरकार की मंशा है कि वो नागरिकों के वाट्सऐप मैसेज टैप करे।

शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने जब सख्ती दिखाई तो केंद्र सरकार ने बताया कि वो अब सोशल मीडिया की निगरानी नहीं करेगी। सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति एएम खानविलकर व न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ के समक्ष केंद्र सरकार के पक्ष रखने के बाद मामले का निस्तारण कर दिया गया।

सरकार नागरिकों के व्हॉट्सऐप संदेशों को देखना चाहती है

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने बीते 14 जुलाई को कहा था कि सरकार नागरिकों के व्हॉट्सऐप संदेशों को देखना चाहती है और इसके लिए उसे दो सप्ताह में जवाब देना होगा। कोर्ट ने यह आदेश तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के विधायक महुआ मोइत्रा द्वारा दायर याचिका की सुनवाई के बाद दिया था। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति एएम खानविल्कर और न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड की खंडपीठ कर रही है। पीठ ने अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल से इस मामले में जवाब दाखिल करने के लिए कहा था।

मोइत्रा की ओर से मामले की पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता एएम सिंघवी ने कहा था कि सरकार ने इस संबंध में एक प्रस्ताव जारी किया था और आगामी 20 अगस्त को इसके लिए निविदाएं मांगना शुरू करेगी।

सिंघवी का कहना है, "सोशल मीडिया हब की मदद से वे (सरकार) सोशल मीडिया सामग्री की निगरानी करना चाहते हैं." इसके बाद खंडपीठ ने कहा कि वो इस मामले की अगली सुनवाई 20 अगस्त को निविदा के खुलने से पहले 3 अगस्त को करेगी और सरकार की तरफ से अटॉर्नी जनरल या अन्य किसी विधि अधिकारी को इस मामले की सुनवाई के दौरान पेश रहना होगा।

निजता के अधिकार का सरासर उल्लंघन

इससे पहले बीते 18 जून को सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार की 'सोशल मीडिया कम्यूनिकेशन हब' स्थापित करने के कदम पर रोक लगाने की याचिका की तत्काल सुनवाई करने से इनकार कर दिया था। इस सोशल मीडिया कम्यूनिकेशन हब के जरिये सरकार डिजिटल और सोशल मीडिया कंटेंट को एकत्रित करती और इसे एनालाइज करती।

मोइत्रा की ओर से आए वकील ने कहा था कि सरकार लोगों के सोशल मीडिया अकाउंट्स जैसे ट्विटर, फेसबुक और इंस्टाग्राम समेत उनके ईमेल जैसी सोशल मीडिया सामग्री पर निगरानी करना चाहती है। इससे इन सभी पर मौजूद यूजर्स के डाटा तक सरकार पहुंच जाएगी जोकि निजता के अधिकार का सरासर उल्लंघन है। इस कदम से सरकार जब चाहेगी किसी भी व्यक्ति की निजी जानकारी हासिल कर सकेगी और उसकी पहुंच जिला स्तर तक होगी।

गौरतलब है कि हाल ही में मंत्रालय के अंतर्गत आने वाली सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी ब्रॉडकास्ट इंजीनियरिंग कंसल्टेंट्स इंडिया लिमिटेड (बेसिल) ने एक इस प्रोजेक्ट के लिए सॉफ्टवेयर की आपूर्ति की निविदाएं मांगीं थी। इसके बाद सरकार जिलों में काम करने वाले मीडियाकर्मियों के जरिये सोशल मीडिया की सूचनाओं पर निगरानी रखने के साथ ही सरकारी योजनाओं पर लोगों का रुख भांप पाती।

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