
नई दिल्ली। चंद्रयान-2 के लैंडर विक्रम से 7 सितंबर को संपर्क टूटने के कई दिनों बात तक इसरो के वैज्ञानिकों NASA के वैज्ञानिकों ने मदद लेने से बचते रहे। ऐसा इसलिए कि NASA के LRO से ज्यादा ताकतवर का ऑर्बिटर है। इसके बावजूद इसरो के वैज्ञानिकों ने बूझे मन से ही सही नासा से सहयोग लेने की फैसला लिया। इसके पीछे इसरो की मंशा यह थी कि हो सकता है कि अमरीकी अतंरिक्ष एजेंसी मदद करने में सफल हो जाए।
लेनिक वैसा कुछ नहीं हुआ। मंगलवार को NASA अपने LRO की मदद से लैंडर विक्रम के इलाके से गुजरा पर अभी तक कोई नई जानकारी नहीं मिली है। इसरो ने भी इस बात का जिक्र अपने ट्वीटर से नहीं किया कि आखिर नासा विक्रम का फोटो लेने में सफल हुआ या नहीं।
बता दें कि इसरो की ओर से सहमति मिलने के बाद अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा (NASA) भी अपने डीप स्पेस नेटवर्क के तीन सेंटर्स से लगातार चंद्रयान-2 के ऑर्बिटर और लैंडर से संपर्क में है। नासा के ये तीन सेंटर्स हैं - स्पेन के मैड्रिड, अमरीका के कैलिफोर्निया का गोल्डस्टोन और ऑस्ट्रेलिया का कैनबरा है।
इस तीन जगहों पर लगे ताकतवर एंटीना चंद्रयान-2 के ऑर्बिटर से तो संपर्क साध पा रहे हैं लेकिन विक्रम लैंडर को उन्हें इन मैसेजों का कोई जवाब नहीं दे रहा है।
LRO को भी नहीं मिली सफलता!
इसके बाद मंगलवार को नासा ने इसरो की मदद के लिए अपने लूनर रिकॉनसेंस ऑर्बिटर (LRO) को विक्रम लैंडर की तस्वीर लेने के रवाना किया था। लूनर रिकॉनसेंस ऑर्बिटर विक्रम के इलाके से गुजरा भी लेकिन अभी तक नासा ने इसरो को कोई जानकारी नहीं दी दी है। यह मान लिया जाए कि अमरीका की 10 साल पुरानी टेक्नोलॉजी इस लायक नहीं है जो चंद्रयान-2 के ऑर्बिटर की गुणवत्ता को टक्कर!
चंद्रयान-2 के ऑर्बिटर का ऑप्टिकल हाई-रिजोल्यूशन कैमरा (OHRC) आज के जमाने की तकनीक से बना है। यही कारण है कि एलआरओ से कई गुणा बेहतर इसरो का ऑर्बिटर माना जाता है।
इसलिए अंतरिक्ष विज्ञान के जानकारों के बीच इस बात की चर्चा है कि आखिर इसरो ने नासा से सहयोग लेने का फैसला क्यों किया? कहीं ऐसा तो नहीं कि वैज्ञानिकों को किसी चमत्कार की उम्मीद में ऐसा किया।
इसलिए NASA की मदद लेने को तैयार हुआ इसरो
खगोलविदों का कहना है कि इसरो के ऑर्बिटर के कैमरे की ताकत ज्यादा है लेकिन उसके वैज्ञानिक OHRC से मिले डेटा से सॉफ्ट लैंडिंग वाली घटना का विश्लेषण नहीं कर सकते। इसके लिए उन्हें LRO की मदद लेनी पड़ी है। LRO के पास पुराना डेटा भी है। वह यह बता सकता है कि विक्रम लैंडिंग से पहले और बाद में लैंडिंग वाली जगह पर क्या बदलाव हुए। इसलिए LRO की मदद लेने का इसरो ने फैसला लिया।