
नई दिल्ली। कोरोना वायरस चीन के वुहान से निकलकर अब 135 से अधिक देशों में फैल चुका है। इस वायरस के कारण पूरी दुनिया में 5400 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 1.40 लाख से ज्यादा लोग संक्रमण हुए हैं। ऐसे में लोगों में डर का माहौल है। दुनिया की अर्थव्यवस्था भी इस वायरस से प्रभावित हुआ है। हालांकि इस वायरस से निपटने के लिए दुनियाभर में तरह-तरह के उपाय किए जा रहे हैं।
चीन ने कोरोना संक्रमण रोकने के लिए फैक्ट्रियां बंद की और कई अन्य कदम उठाए हैं। लेकिन अब धीरे-धीरे चीन में हालात सामान्य होने की दिशा में बढ़ने लगा है। भारत में भी कोरोना का असर पड़ा है और ये माना जा रहा है कि अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी। हालांकि कुछ महीने पहले तक केंद्रीय वित्त सचिव के तौर पर देश की अर्थव्यवस्था को दिशा देने में अहम भूमिका निभा रहे सुभाष चंद्र गर्ग का मानना है कि कोरोना की आपदा के प्रबंधन में चीन से सीख ली जा सकती है। कोरोना के अटैक से अर्थव्यस्था पर क्या असर होगा और कितना होगा, इस तरह के सवालों को लेकर सुभाष चंद्र गर्ग से पत्रिका संवाददाता मुकेश केजरीवाल ने की बात। आइए जानते हैं बातचीत के अंश...
पत्रिका- शेयर बाजार से निवेशकों का भरोसा तेजी से गिर रहा है। आप इसे किस तरह देखते हैं?
सुभाष चंद्र गर्ग: पिछले 10 दिनों में दुनिया भर में और भारत में भी इक्विटी बाजार तेजी से गिरे हैं। अधिकांश जगह यह कोरोना की दहशत से है। फिलहाल, इसका टीका, इलाज या एंटीडॉट नहीं होने की वजह से भारी अनिश्चितता है और ऐसे में इक्विटी बाजार इसी तरह प्रतिक्रिया करता है।
पत्रिका- निवेशकों को कैसे आश्वस्त किया जा सकता है?
सुभाष चंद्र गर्ग: चीन ने जिस तरह से कोरोना वायरस के खतरे के बीच अर्थव्यवस्था को नियंत्रण किया वह अच्छा उदाहरण है। चीन में 80 हजार से अधिक लोग संक्रमित हुए, लेकिन अब हालात नियंत्रण में है। अगर दृढ़ता और धैर्य के साथ काम करें तो प्राकृतिक आपदाओं को जिस तरह से नियंत्रित करते हैं, उसी तरह ही इसको भी नियंत्रित कर सकते हैं।
पत्रिका- आर्थिक मोर्चे पर इसका नुकसान रोकने के लिए क्या कदम उठाए जा सकते हैं?
सुभाष चंद्र गर्ग: हमारे लिए कृषि, निर्माण, उद्योग, सेवा आदि सबसे अहम हैं। कोरोना वायरस का असर खेती पर नहीं हो रहा है। अभी तक भारत में उद्योग भी अप्रभावित हैं। फिर भी यदि कुछ समस्याएं आती हैं, तो जिस तरह चीन ने कदम उठाएं हैं, वैसे ही हम कर सकते हैं। चीन ने संक्रमण रोकने के लिए फैक्ट्रियां बंद की थीं, पर अब 85-90 प्रतिशत कामगार वापस पहुंच चुके हैं। चीन ने अपना प्रोडक्शन फिर से चालू कर लिया है और कुछ ही दिनों में दुनियाभर में उसके उत्पाद जाने लगेंगे। इसलिए, हमें भी देखना चाहिए कि हम जरूरत से ज्यादा उतावले हो कर औद्योगिक गतिविधियों को न रोकें।
हमारी अर्थव्यवस्था के लिहाज से सेवा क्षेत्र बहुत अहम है। सिनेमा हॉल, मॉल बंद करने जैसे कदम उठाते समय हमें थोड़ा धैर्य दिखाना चाहिए। स्टेडियम में जैसे हम सुरक्षा जांच करते हैं कि कोई हथियार नहीं ले जाए, वैसे ही सुनिश्चित कर सकते हैं कि बैठने की व्यवस्था इस तरह हो कि संक्रमण फैले नहीं।
पत्रिका- कोरोना का हमारी अर्थव्यवस्था पर कितना असर होता देख रहे हैं?
सुभाष चंद्र गर्ग: आर्थिक आंकड़े देरी से मिलते हैं। मंदी के बावजूद हमारा सेवा क्षेत्र 6 से 6.5 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा था, मगर इस पर असर देखने को मिलने लगा है। कुल आर्थिक विकास 5 प्रतिशत रहने की उम्मीद थी, लेकिन उसमें और गिरावट आ सकती है।
पत्रिका- वैश्विक अर्थव्यवस्था और कच्चे तेल की घटती कीमत का भारत पर क्या प्रभाव हो सकता है?
सुभाष चंद्र गर्ग: पहले से ही दुनिया में मंदी के लक्षण दिख रहे थे और अब कोरोना की मार से इसमें कुछ असर दिख सकता है। इसके अलावा रूस और सऊदी अरब में कच्चे तेल को लेकर झगड़ा है। ऐसे में तेल के दाम गिरने से ना सिर्फ आपूर्ति करने वाले देशों की अर्थव्यवस्था पर असर होगा बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी। लेकिन इसका फायदा भारत को मिलेगा। हालांकि हमें काफी उत्साहित नहीं होना चाहिए।
पत्रिका- विनिवेश का जो महत्वाकांक्षी लक्ष्य था, मौजूदा स्थिति में उसे ले कर कितनी उम्मीद की जा सकती है?
सुभाष चंद्र गर्ग: साफगोई से कहूं तो मौजूदा वित्त वर्ष में लक्ष्य पूरा नहीं हो पाएगा। सरकार ने लक्ष्य 1.5 लाख करोड़ से घटा कर 65 हजार करोड़ कर दिया था। लेकिन लगता है कि वह भी पूरा नहीं हो सकेगा। अगले वित्त वर्ष के दौरान भी बहुत महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा गया है। लेकिन शेयर बहुत गिर गए हैं। ऐसे में अनिश्चितता की स्थिति बनी हुई है कि यह प्रक्रिया जारी रखेंगे या नहीं और की भी तो उसकी कीमत कितनी मिलेगी।
पत्रिका- कर राजस्व बढ़ नहीं रहा और विनिवेश भी नहीं होगा तो खजाना कैसे चलेगा?
सुभाष चंद्र गर्ग: यह असामान्य समय है। इस बार कर संकलन भी लगभग 2.5 से 3 लाख करोड़ कम रहेगा ऐसा अनुमान है। सेवा क्षेत्र से मिलने वाले जीएसटी में और कमी आ सकती है। ऐसे में जरूरी है कि सरकार खर्च नहीं बढ़ाए। फिलहाल ज्यादा उधार लेना है तो ले सकते हैं। लेकिन खर्च बढ़ा तो उसे घटाना बहुत मुश्किल होगा। 2008 से 10 के बीच खर्च बहुत बढ़ा दिए थे तो देश में बहुत महंगाई आई। राजस्व घाटा बहुत बढ़ गया।
पत्रिका- यही चुनौती राज्यों के सामने है, ये कैसे निपटें?
सुभाष चंद्र गर्ग: राज्यों का राजस्व भी प्रभावित हो रहा है। उनका जीएसटी राजस्व घट गया है, केंद्र सरकार से मिलने वाली रकम कम हो रही है। उन्हें भी अपने राजस्व और व्यय के बीच के अंतर को दूर करने के लिए इस समय कर्ज की चिंता नहीं करनी चाहिए।
पत्रिका- आरोप लगता है कि सरकार में विशेषज्ञों की बात नहीं सुनी जा रही और इंस्टीट्यूशन्स को स्वायत्त रूप से काम नहीं करने दिया जा रहा। आपका क्या अनुभव रहा?
सुभाष चंद्र गर्ग: सरकार में मंत्रियों को बहुत अनुभव रहता है। मौजूदा पीएम खुद इतने साल तक मुख्यमंत्री रहे हैं, उन्हें जमीनी समझ बहुत अच्छी है। यह भी सही है कि अर्थव्यवस्था के प्रबंधन में खास तौर पर विशेषज्ञता की जरूरत होती है। इस काम को कैरियर ब्यूरोक्रेट और बाहर के विशेषज्ञों के बीच बेहतर सामंजस्य से आगे बढ़ाया जा सकता है। सरकार ने कई प्रख्यात अर्थशास्त्रियों से बात की। यह थोड़ा और बेहतर हो सकता है।