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पढ़ें मोदी को गंगापुत्र का आखिरी पत्र: ‘आपसे उम्मीद थी लेकिन आपने गंगा के लिए कुछ नहीं किया’

जलत्याग करने से पूर्व प्रो. अग्रवाल ने कहा था मेरा जीवन गंगा के लिए है अब तो मेरी मौत से ही अनशन खत्म होगा.

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पढ़ें मोदी को गंगापुत्र का आखिरी पत्र: 'आपसे उम्मीद थी लेकिन आपने गंगा के लिए कुछ नहीं किया'

नई दिल्ली। गंगा के लिए 111 दिन से अनशन पर बैठे 86 साल के वैज्ञानिक संत प्रो. जीडी अग्रवाल के निधन के कुछ घंटों बाद गुरुवार देर रात वाराणसी के सांसद और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट कर दु:ख जताया। मोदी ने लिखा, पर्यावरण विशेषकर गंगा की सफाई के प्रति उनका जुनून हमेशा याद रखा जाएगा। उन्हें मेरी श्रद्धांजलि है। प्रो. अग्रवाल (स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद) ने गंगा एक्ट लागू करने की मांग को लेकर प्रधानमंत्री को कई पत्र लिखे, यहां तक कि अनशन शुरू करने से पहले भी उन्होंने पत्र लिखा, लेकिन जवाब के इंतजार में गंगा के 'भगीरथ' ने 'दधीचि' बन देह त्याग दी। गंगा पुत्र स्वामी सानंद ने अपना शरीर ऋषिकेश एम्स के छात्रों के उपयोग के लिए दान कर दिया गया।

डॉक्टरों ने बताया कि उनके शरीर में कीटोन की मात्रा बहुत अधिक हो गई थी, इसके चलते उन्हें दिल का दौरा पड़ा और उनका निधन हो गया। डॉक्टर भले इसे बीमारियों के कारण दिल का दौरा कहें लेकिन उनका निधन तो गंगा की बदहाली के कारण दिल पर लगे आघात से हुआ। सनद रहे कि गंगा के ही मुद्दे पर 2011 में 115 दिन के अनशन के बाद स्वामी निगमानंद ने भी देह त्याग दी थी।

'गंगाजी के लिए मुझे अपनी जान देने में कोई समस्या नहीं है'
प्रधानमंत्री को भेजे आखिरी खत में स्वामी ज्ञान स्वरूप ने लिखा था, 'माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी, मैंने गंगा सफाई अभियान को लेकर आपको कई पत्र लिखे, लेकिन अभी तक इस संबंध में कोई जवाब नहीं मिला है। मुझे उम्मीद थी कि प्रधानमंत्री बनने के बाद आप गंगा सफाई पर गहराई से विचार करेंगे, क्योंकि आपने 2014 में चुनाव प्रचार के दौरान बनारस में कहा था कि गंगा जी ने आपको उनकी सेवा के लिए बुलाया है। ...मुझे उम्मीद थी कि आप आगे बढ़कर एक नई पहल करेंगे।'

'प्रधानमंत्री जी आपने गंगा सफाई को लेकर एक अलग मंत्रालय भी बनाया, लेकिन इस बात का अफसोस है कि पिछले साढ़े चार साल में कोई प्रगति देखने को नहीं मिली। अभी तक आपने सिर्फ गंगा जी द्वारा लाभ अर्जित करने वाले बिंदुओं की ओर ही ध्यान दिया है। ... तीन अगस्त 2018 को उमा भारतीजी मुझसे मिलने पहुंची थीं। उन्होंने फोन पर मेरी गडकरीजी से बात कराई थी लेकिन गंगा सफाई के मुद्दे पर मुझे आप से जवाब की अपेक्षा थी। गंगाजी के लिए मुझे अपनी जान देने में कोई समस्या नहीं है, वह मेरे जीवन की प्राथमिकता हैं। ...'

'मैं आइआइटी में प्रोफेसर था और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य के साथ-साथ गंगाजी से संबंधित सरकारी संगठनों के सदस्य था। विभिन्न पदों पर अपने अनुभवों के आधार पर मैं कह सकता हूं कि पिछले चार साल में आपकी सरकार की ओर से गंगा की भलाई के लिए एक काम भी नहीं किया गया है ......मैं उमा भारती जी के माध्यम से आपको पत्र भेज रहा हूं और फिर से दोहराता हूं कि मेरे जिक्र किए गए 4 बिंदुओं पर गंभीरता से विचार करते हुए कार्य किया जाए ... चूंकि मुझे 13 जून 2018 तक आपकी तरफ से कोई जवाब नहीं मिला इसलिए मैंने 22 जून 2018 से फिर से उपवास प्रारंभ कर दिया है।'

ये थीं स्वामी सानंद की गंगा मइया के लिए चार मांगें

गंगा के लिए शरीर त्यागने वाले स्वामी सांनद से ने सरकार ने ऐसा कुछ नहीं मांगा था जो सरकार नहीं दे सकती थी। उनकी प्रमुख मांग थी कि केंद्र गंगा और उसकी सहायक नदियां अलकनंदा, धौलिगंगा, नंदाकिनी, पिंडर और मंदाकिनी नदियों पर में बनने वाली जल विद्युत परियोजनाओं को तुरंत बंद करे। गंगा के प्रति समर्पित लोगों की गंगा भक्त परिषद बनाई जाई। गंगा में हो रहा खनन रोका जाए। केंद्र सरकार संसद के इस सत्र में गंगा रक्षा के लिए प्रस्तावित गंगा अधिनियम, 2012 पास कराए।

एक दशक से गंगा के लिए संघर्ष

प्रो. अग्रवाल ने 2008 में 13 जून से 30 जून तक उत्तरकाशी में गंंगा के लिए पहली बार अनशन किया। इसके बाद वे १४ जनवरी 2009 से 20 फरवरी 2009 तक अनशन पर रहे। तीसरी बार मातृसदन जगजीतपुर कनखल में 20 जुलाई से 22 अगस्त 2010 में 28 दिन अनशन किया। तत्कालीन केंद्र सरकार ने उनकी मांग मानते हुए उत्तरकाशी में गंगा भागीरथी पर बन रही तीन जल विद्युत परियोजनाओं लोहारी नागपाला, पाला मनेरी और भैरो घाटी को तुरंत बंद कर दिया था। गोमुख से उत्तरकाशी तक 135 किलोमीटर क्षेत्र को इको संवेदनशील क्षेत्र घोषित किया। चौथा अनशन 2012 में 8 फरवरी से 8 मार्च तक हरिद्वार में चला। यहां प्रो. अग्रवाल ने गंगा रक्षा के लिए अधिनियम 2012 का मसौदा बनाया और जिसे लागू लागू कराने के लिए वे इस बार अनशन पर बैठे थे।

जबरन अस्पताल ले गई थी उत्तराखंड पुलिस

प्रो. अग्रवाल 22 जून से उत्तराखंड स्थित मातृसदन आश्रम में अनशन पर थे। नौ अक्टूबर से उन्होंने जल भी त्याग दिया था। 11 अक्टूबर को उत्तराखंड प्रशासन ने उन्हें जबरन ऋषिकेश एम्स में भर्ती करवा दिया। प्रो. अग्रवाल ने इस साल फरवरी में भी प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर गंगा के लिए अलग से कानून बनाने की मांग की थी। जवाब न मिलने पर वे अनशन पर बैठ गए थे।

बेहाल नमामि गंगे परियोजना

गंगा में कऱीब 12000 एमएलडी नाले का पानी गिरता है। केवल 1000 एमएलडी गंदा पानी ही गंगा में गिरने से पहले उपचारित किया जा रहा है। नमामी गंगे के तहत पांच साल में 20,601 करोड़ खर्च होना है, लेकिन मार्च 2018 तक मात्र 4,254 करोड़ रुपए ही खर्च हुए हैं।

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Updated on:
12 Oct 2018 10:34 am
Published on:
12 Oct 2018 10:26 am
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