
नई दिल्ली। आज के दौर में भारतीय चिकित्सा पद्धति ( IMS ) के तरीके से बीमारी का इलाज कितना कारगर है, इस बात का पता लगाने के लिए केंद्रीय आयुष मंत्रालय ( Ayush Ministry ) 50 लाख लोगों पर ट्रायल ( Trial ) करने की योजना पर तेजी से काम कर रहा है। इसका मकसद देसी दवाओं की उपयोगिता का पता लगाना है। ट्रायल के लिए करीब 1.80 लाख लोग अपना रजिस्ट्रेशन करा चुके हैं। इसके लिए जल्द ही विश्व स्वास्थ्य संगठन ( WHO ) की ओर से शोधार्थियों को प्रशिक्षण दिया जाएगा।
देसी दवाओं ( indigenous drugs ) की उपयोगिता का पता लगाने के लिए अलग-अलग समूह में ट्रायल करने की योजना बनाई गई है। इसके लिए आयुष मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव पीके पाठक की निगरानी में समिति गठित की गई है। परीक्षण तीन चरणों में होगा। जिसमें सामान्य लोग, सुरक्षा जवान, एनजीओ, स्वास्थ्य कर्मचारियों का समूह और कोरोना वायरस पॉजिटिव ( coronavirus ) मरीज शामिल होंगे।
आईसीएमआर, भारतीय जनस्वास्थ्य फाउंडेशन और राष्ट्रीय महामारी रोग नियंत्रण संस्थान के विशेषज्ञों की सलाह के मुताबिक ट्रायल की प्रक्रिया को अंजाम दिया जाएगा।
इसके साथ ही आयुष मंत्रालय की आयुर्वेद ( Ayurved ) के परीक्षण की योजना भी है। दिल्ली के तिब्बिया कॉलेज और चौधरी ब्रह्मप्रकाश आयुर्वेद अस्पताल में भी परीक्षण जारी है। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय ने भी फीफाट्रोल पर परीक्षण की मंजूरी मांगी है।
आयुष मंत्रालय संजीवनी मोबाइल एप के जरिए भी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में पारंपरिक दवाओं इस्तेमाल व असर का पता लगाएंगे। ट्रायल के लिए दिल्ली पुलिस के 80 हजार जवान भी पंजीकृत हुए हैं, जिनके जरिए आयुष इम्युनिटी बूस्टिंग उत्पादों का अध्ययन किया जाएगा।बता दें कि कोरोना के इलाज में कारगर दवाई की खोज के लिए आयुर्वेद समेत भारतीय चिकित्सा पद्धति की दवाओं की उपयोगिता का पता लगाने का काम जारी है। देशभर में आयुर्वेद, सिद्ध, यूनानी और होम्योपैथ के डाक्टरों व विशेषज्ञों ने आयुष मंत्रालय को 3500 से अधिक दवाइयों और उसके फार्मूले को कोरोना के इलाज में कारगर होने का दावा करते हुए उसका ट्रायल करने का प्रस्ताव भेजा है। आयुष मंत्रालय इन प्रस्तावों में 100 से अधिक सबसे सटीक लगने वाले फार्मूले को कोरोना के इलाज में ट्रायल के तौर पर शामिल करने पर विचार कर रहा है।