रॉकेट जिस गति से वायुमंडल को पार करता है, उसकी तुलना में लौटते वक्त उसकी गति 8 से 9 गुणा अधिक होगी और इस गति पर हीटशील्ड का बच पाना मुश्किल है।
राजीव मिश्रा.
बेंगलूरु:अंतरिक्ष में भटक रहा भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) का डेड मिशन पीएसएलवी सी-39 अगले तीन महीने में धरती के वातावरण में पुन: प्रवेश करेगा लेकिन, उसके पृथ्वी से टकराने की आशंका नहीं हैं। इसरो के उच्च पदस्थ सूत्रों के मुताबिक रॉकेट का अवशेष अगले वर्ष फरवरी महीने तक धरती के वातावरण में प्रवेश करेगा और बाह्य अंतरिक्ष में ही जलकर भस्म हो जाएगा।
पृथ्वी या सागर तक पहुंचने की संभावना नहीं
इसरो के निदेशक देवी प्रसाद कार्णिक ने बताया कि फिलहाल पीएसएलवी सी-39 रॉकेट एक अर्थ ऑब्जर्वेशन उपग्रह की तरह पृथ्वी की कक्षा में परिक्रमा कर रहा है। इसकी कक्षा में धीरे-धीरे गिरावट आ रही है और उस पर इसरो वैज्ञानिकों की नजर बनी हुई है। चूंकि, रॉकेट से उष्मारोधी कवच (हीट शील्ड) जुड़ा हुआ है इसलिए आशंका जताई जा रही थी कि वह भस्म नहीं हो पाएगा क्योंकि वायुमंडल के घर्षण से उत्पन्न ऊर्जा से बचाने के लिए ही हीटशील्ड होता है।
लौटते वक्त रॉकेट की गति 8 से 9 गुणा अधिक
लेकिन, इसरो अधिकारी ने इससे इनकार किया और कहा कि वायुमंडल में प्रवेश करते वक्त डेड मिशन का पूरा अवशेष जलकर भस्म हो जाएगा। उसके पृथ्वी या सागर तक पहुंचने की कोई संभावना नहीं है। धरती के वातावरण में डेड मिशन का अवशेष काफी तेज रफ्तार से प्रवेश करेगा। इसरो अधिकारियों के मुताबिक रॉकेट जिस गति से वायुमंडल को पार करता है, उसकी तुलना में लौटते वक्त उसकी गति 8 से 9 गुणा अधिक होगी और इस गति पर हीटशील्ड का बच पाना मुश्किल है।
तीव्र गति के साथ पृथ्वी की ओर आकर्षित
दरअसल, धरती के गुरुत्वाकर्षण के कारण वातावरण में पुन: प्रवेश करते वक्त पिंडों की गति बाह्य अंतरिक्ष में काफी बढ़ जाती है। इससे तीव्र घर्षण होता है और बड़े पैमाने पर उत्पन्न ऊर्जा में वह पिंड जलकर भस्म हो जाता है। फिलहाल उपग्रह हीट-शील्ड के साथ पृथ्वी का चक्कर काट रहा है और इसकी कक्षा में ह्रास हो रहा है। जब पेरिगी (धरती से न्यूनतम दूरी) 100-120 किमी के आसपास होगी तब वह अधिक तीव्र गति के साथ पृथ्वी की ओर आकर्षित होगा।
120 km तक आ जाएगी पेरिगी
गौरतलब है कि पीएसएलवी सी-39 रॉकेट से नौवहन उपग्रह आईआरएनएसएस 1 एच को 28 4 किमी पेरिगी (धरती से उपग्रह की निकटतम दूरी) गुणा 20,6 50 किमी एपोगी (धरती से उपग्रह की अधिकतम दूरी) वाली उप भू-तुल्यकालिक अंतरण कक्षा (सब जीएसओ) में स्थापित करने की योजना थी लेकिन मिशन विफल होने के कारण रॉकेट का अवशेष 16 7 किमी (पेरिगी) गुणा 6 78 0 किमी (एपोगी) वाली कक्षा में रह गया। जब पेरिगी गिरकर 120 किमी तक आ जाएगी अवशेष धरती के वातावरण में प्रवेश करेगा।