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पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर ने ‘शास्त्री’ इसलिए रखा था अपना उपनाम, शादी में मिला था चरखा

शास्त्री जी निजी जीवन में ईमानदारी बरतने के साथ ही सरकारी कामकाज में भी इस सिद्धांत को लागू करने पर जोर देते थे।

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Oct 02, 2018
पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर ने 'शास्त्री' इसलिए रखा था अपना उपनाम, दहेज में मिला था चरखा

नई दिल्ली। पूरा देश आज राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 150वीं जयंती मना रहा है। लेकिन आज ही एक दिन देश की एक ऐसी शख्सियत ने भी जन्म लिया था, जो अपनी ईमानदार छवि के लिए भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दनिया में मशहूर हुए। हम बात कर रहे माटी के पूत कहे जाने वाले लाल बहादुर शास्त्री की। दरअसल, शास्‍त्री जी का पूरा जीवनकाल सरलता और सादगी की मिसाल है। इसका कारण यह है कि शास्त्री जी निजी जीवन में ईमानदारी बरतने के साथ ही सरकारी कामकाज में भी इस सिद्धांत को लागू करने पर जोर देते थे।

जन्म 2 अक्‍टूबर, 1901 में हुआ जन्म

लाल बहादुर शास्‍त्री का जन्म 2 अक्‍टूबर, 1901 में हुआ था। उनके पिता का नाम शारदा श्रीवास्तव प्रसाद और माता का नाम रामदुलारी देवी था। शास्‍त्री जी शुरुआत से ही जातिवाद प्रथा के विरोधी थे। यहां तक कि काशी विद्यापीठ से ‘शास्‍त्री’ की उपाधि मिलने के बाद उन्होंने अपने असल जातिसूचक सरनेम श्रीवास्‍तव को हटा दिया और उसके स्थान पर शास्‍त्री को स्थान दिया। शास्त्री जी इस सरनेम को आज तक उनका परिवार बड़े गर्व के साथ अपने नाम के साथ जोड़ता आ रहा है। आपको बता दें कि शास्त्री जी के समय भारत में जातिवादी प्रथा काफी गहरी जड़ें जमा चुकी थी। समाज से जाति प्रथा जैसी बुराई की जड़ उखाड़ने के लिए शास्त्री भी ने भी जाति विरोधी मुहिम में बढ़-चढ़कर भाग लिया था।

दरअसल, शास्‍त्री जी एक बेहद सरल और साधारण परिवार में पैदा हुए थे। उनके परिवार की माली हालत में भी काफी खराब थी। यहां तक कि उनको स्कूल जाने के लिए नाव का किराया देने तक के भी पैसे न थे। इसलिए उनको स्कूल जाने के लिए तैर कर ही नदी पार करनी होती थी। उनसे जुड़ा एक ऐसा ही किस्सा है। जब एक बार उनके पड़ोसी गांव में मेला लगा था। मेला देखने के लिए उस गांव तक पहुंचने के लिए कोई साधन न था और नदी पार कर जाना पड़ता था। शास्त्री भी अपने दोस्‍तों के साथ मेला देखने गए थे। इस दौरान मेला देखने में उन्होंने अपने दोस्तों के साथ सारे पैसे खर्च कर दिए। मेला देखकर घर वापसी के लिए जब वह नदी किनारे पहुंचे तो जेब खाली थी और नाव का किराया देने के लिए कुछ नहीं था। उस समय उन्होंने वह अपने दोस्‍तों से कहा था कि उन्‍हें कुछ काम लग गया है और वह बाद में घर जाएंगे। शास्‍त्री जी के सभी दोस्‍त नाव में बैठकर गांव चले गए थे। जबकि दोस्तों के जाने के बाद शास्‍त्री जी तैर कर नदी पार घर पहुंचे थे। बाद में उन्होंने बताया कि वो चाहते थे कि उनके दोस्‍त उनके किराये का बोझ उठाएं। बता दें कि शास्‍त्री जी को शादी में दहेज के तौर पर एक चरखा और कुछ गज कपड़े मिले थे।

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Published on:
02 Oct 2018 09:41 am
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